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Kafarat berhubungan pada saat puasa adalah membebaskan satu budak, berpuasa 2 bulan berturut-turut dan memberikan nafkah 60 fakir miskin
Imam Tirmidzi : 656حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ عَلِيٍّ الْجَهْضَمِيُّ وَأَبَو عَمَّارٍ وَالْمَعْنَى وَاحِدٌ وَاللَّفْظُ لَفْظُ أَبِي عَمَّارٍ قَالَا أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ بْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ الزُّهْرِيِّ عَنْ حُمَيْدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَأَتَاهُ رَجُلٌ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ هَلَكْتُ قَالَ وَمَا أَهْلَكَكَ قَالَ وَقَعْتُ عَلَى امْرَأَتِي فِي رَمَضَانَ قَالَ هَلْ تَسْتَطِيعُ أَنْ تُعْتِقَ رَقَبَةً قَالَ لَا قَالَ فَهَلْ تَسْتَطِيعُ أَنْ تَصُومَ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ قَالَ لَا قَالَ فَهَلْ تَسْتَطِيعُ أَنْ تُطْعِمَ سِتِّينَ مِسْكِينًا قَالَ لَا قَالَ اجْلِسْ فَجَلَسَ فَأُتِيَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِعَرَقٍ فِيهِ تَمْرٌ وَالْعَرَقُ الْمِكْتَلُ الضَّخْمُ قَالَ تَصَدَّقْ بِهِ فَقَالَ مَا بَيْنَ لَابَتَيْهَا أَحَدٌ أَفْقَرَ مِنَّا قَالَ فَضَحِكَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ حَتَّى بَدَتْ أَنْيَابُهُ قَالَ فَخُذْهُ فَأَطْعِمْهُ أَهْلَكَقَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ ابْنِ عُمَرَ وَعَائِشَةَ وَعَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ أَبِي هُرَيْرَةَ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَالْعَمَلُ عَلَى هَذَا الْحَدِيثِ عِنْدَ أَهْلِ الْعِلْمِ فِي مَنْ أَفْطَرَ فِي رَمَضَانَ مُتَعَمِّدًا مِنْ جِمَاعٍ وَأَمَّا مَنْ أَفْطَرَ مُتَعَمِّدًا مِنْ أَكْلٍ أَوْ شُرْبٍ فَإِنَّ أَهْلَ الْعِلْمِ قَدْ اخْتَلَفُوا فِي ذَلِكَ فَقَالَ بَعْضُهُمْ عَلَيْهِ الْقَضَاءُ وَالْكَفَّارَةُ وَشَبَّهُوا الْأَكْلَ وَالشُّرْبَ بِالْجِمَاعِ وَهُوَ قَوْلُ سُفْيَانَ الثَّوْرِيِّ وَابْنِ الْمُبَارَكِ وَإِسْحَقَ و قَالَ بَعْضُهُمْ عَلَيْهِ الْقَضَاءُ وَلَا كَفَّارَةَ عَلَيْهِ لِأَنَّهُ إِنَّمَا ذُكِرَ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْكَفَّارَةُ فِي الْجِمَاعِ وَلَمْ تُذْكَرْ عَنْهُ فِي الْأَكْلِ وَالشُّرْبِ وَقَالُوا لَا يُشْبِهُ الْأَكْلُ وَالشُّرْبُ الْجِمَاعَ وَهُوَ قَوْلُ الشَّافِعِيِّ وَأَحْمَدَ و قَالَ الشَّافِعِيُّ وَقَوْلُ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لِلرَّجُلِ الَّذِي أَفْطَرَ فَتَصَدَّقَ عَلَيْهِ خُذْهُ فَأَطْعِمْهُ أَهْلَكَ يَحْتَمِلُ هَذَا مَعَانِيَ يَحْتَمِلُ أَنْ تَكُونَ الْكَفَّارَةُ عَلَى مَنْ قَدَرَ عَلَيْهَا وَهَذَا رَجُلٌ لَمْ يَقْدِرْ عَلَى الْكَفَّارَةِ فَلَمَّا أَعْطَاهُ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ شَيْئًا وَمَلَكَهُ فَقَالَ الرَّجُلُ مَا أَحَدٌ أَفْقَرَ إِلَيْهِ مِنَّا فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خُذْهُ فَأَطْعِمْهُ أَهْلَكَ لِأَنَّ الْكَفَّارَةَ إِنَّمَا تَكُونُ بَعْدَ الْفَضْلِ عَنْ قُوتِهِ وَاخْتَارَ الشَّافِعِيُّ لِمَنْ كَانَ عَلَى مِثْلِ هَذَا الْحَالِ أَنْ يَأْكُلَهُ وَتَكُونَ الْكَفَّارَةُ عَلَيْهِ دَيْنًا فَمَتَى مَا مَلَكَ يَوْمًا مَا كَفَّرَ
हमका बताइन है [नशर बिन अली अल जहदलामी] अऊर [अबू अम्मर] - हदीस का अर्थ एकै है जबकि हदीस का उच्चारण अबू अम्मर से है - दुइनौ कहिन, हमका [सुफयान बिन उयैना] [अज जुहरी] से [हुमैद बिन अब्दुर्राह] अबुराह से [हुमैद बिन अब्दुर्राह] से हुराई से कहिन हैं, उ कहिन, पैगम्बर सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम अऊर कहिन, हे रसूलुल्लाह, मोर हाय। ऊ पूछिस: 'तुमका का नुकसान पहुँचावा?' उ जवाब दिहिन, हम रमदलान के महीना के दुपहरिया मा आपन पत्नी के साथे सेक्स किहेन, उ कहिन: 'का तुम एक गुलाम का आजाद कर पावत हौ?' उ जवाब दिहिन, नाहीं। उ कहिन: 'का तुम लगातार दुइ महीना उपवास रख पावत हौ?' उ जवाब दिहिन, नाहीं। ऊ आगे कहिन- 'का तुम साठ गरीबन का पेट भर पावत हौ?' उ जवाब दिहिन, नाहीं। ऊ कहिस: 'बैठौ'। फिर बैठ गए, फिर पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास एक बोरा खजूर लाया गया, फिर उन्होंने कहा: 'इनको दान दो'। कहिन, मदीना मा हमसे ज्यादा गरीब कोई नाहीं है। फिर पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तब तक हँसते रहे जब तक कि उनके दाढ़ दिखाई न दे। ऊ कहिस: 'लेवा अऊर अपने परिवार का दइ द्या'। -कथावाचक- कहिन, यहि अध्याय 9 मा इब्न उमर, ऐसियाह अऊर अब्दुल्लाह बिन अमरू से एक -पेंट- इतिहास भी है। अबू ईसा ने कहा, अबू हुरैरा का हदीस एक हसन प्रामाणिक हदीस है। विद्वान ई हदीस मा निहित कानून का पालन करत हैं, यानी रमदलान के महीना मा दिन मा अपनी पत्नी के साथे यौन संबंध बना के जानबूझ के रोजा तोड़ै वाला मनई। हालांकि, जानबूझ के खाना-पीना व्रत तोड़ै वाले मनई के बारे मा विद्वानन के अलग-अलग राय है। ओनमा से कुछ, जइसे कि सुफियान अत्स त्सौरी, अब्दुल्ला बिन अल मुबारक अऊर इशाक, के राय है कि जवन लोग जानबूझ के खाना अऊर पी के आपन व्रत तोड़त हैं, ओनका क़दला बनावै अऊर कफराह - एक जुर्माना - देय का बाध्यता है - उ खाना अऊर पीना का जिमा के बराबर मानत हैं - इ बीच, कुछ विद्वान जइसे कि सिया अऊर आफिया लोग - के राय हैं। जानबूझ के खाना अऊर पी के आपन व्रत तोड़त हैं - केवल क़दला बनावै के लिए बाध्य हैं अऊर कफराह देय के लिए बाध्य नाहीं हैं, काहे से कि पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवन बात बताई है कि कफराह का सीमित करब उ केवल जिमा के लिए है अऊर खाना अऊर पीना का जिक्र नाहीं करत है। उधर खाना-पीना जिमा एकै नाहीं है'। इमाम स्याफी कहिन, पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के भिक्षा देय के हुकुम ई संभावना का खारिज नाहीं करत है कि कफ़रह केवल ओन लोगन के लिए अनिवार्य है जे ईका खरीद सकत हैं, काहे से कि ई लोग कफ़रह देय के खर्चा नाहीं उठा सकत हैं। तब पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें खजूर का एक थैला दिया और उनसे भिक्षा देने को कहा। हालांकि, जब उ कहिन कि उनसे ज्यादा फकीर कौनो नाहीं है, तौ पैगम्बर सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम ने उनसे कहिन कि उ आपन परिवार का पेट भरौ, काहे से कि काफराह के जरूरत के शेष मुख्य भोजन से भुगतान कीन जात रहा। इमाम श्याफीई पसंद करत हैं कि जवन लोग ई आदमी के समान स्थिति मा हैं, उ खजूर खावैं, लेकिन फिर भी ओनके पास कफरा -जुर्माना- चुकावै का कर्ज है, अगर उ सक्षम नाहीं है, तौ उ कफरा -जुर्माना- चुकावै के लिए बाध्य नाहीं है।