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ISLAM AL-HAQ: QURAN & HADITH
(The True Islam)



"Bakarlah jasadku, debunya buang ke angin"

Imam Muslim : 4949

حَدَّثَنِي مُحَمَّدُ بْنُ مَرْزُوقِ بْنِ بِنْتِ مَهْدِيِّ بْنِ مَيْمُونٍ حَدَّثَنَا رَوْحٌ حَدَّثَنَا مَالِكٌ عَنْ أَبِي الزِّنَادِ عَنْ الْأَعْرَجِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ قَالَ رَجُلٌ لَمْ يَعْمَلْ حَسَنَةً قَطُّ لِأَهْلِهِ إِذَا مَاتَ فَحَرِّقُوهُ ثُمَّ اذْرُوا نِصْفَهُ فِي الْبَرِّ وَنِصْفَهُ فِي الْبَحْرِ فَوَاللَّهِ لَئِنْ قَدَرَ اللَّهُ عَلَيْهِ لَيُعَذِّبَنَّهُ عَذَابًا لَا يُعَذِّبُهُ أَحَدًا مِنْ الْعَالَمِينَ فَلَمَّا مَاتَ الرَّجُلُ فَعَلُوا مَا أَمَرَهُمْ فَأَمَرَ اللَّهُ الْبَرَّ فَجَمَعَ مَا فِيهِ وَأَمَرَ الْبَحْرَ فَجَمَعَ مَا فِيهِ ثُمَّ قَالَ لِمَ فَعَلْتَ هَذَا قَالَ مِنْ خَشْيَتِكَ يَا رَبِّ وَأَنْتَ أَعْلَمُ فَغَفَرَ اللَّهُ لَهُ

ई मोका बतावा गा है [मुहम्मद बिन मरजुक बिन बिनत महदी बिन मैमून] हमसे कहिन है [रौह] हमसे [मलिक] से [अबू अज़ जिनाद] से [अल अराज] से [अबू हुरैरा] से कहिन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम ने कहा है: 'एक बार एक अइसन मनई रहा जे कबो अच्छा नाहीं किहिस। फिर उ आपन पत्नी अऊर परिवार से कहिन; 'हे मोर परिवार, जब मैं मरब, तब मोर लाश जलावा! यहिके बाद, मोर शरीर के कुछ हिस्सा जमीन पर अऊर कुछ हिस्सा समुद्र मा फेंक द्या। अल्लाह के कसम, अगर अल्लाह आज्ञा देई तौ उ निश्चित रूप से मोका एक अइसन यातना से यातना देई जवन उ इ दुनिया मा कउनो अउर प्राणी का नाहीं दिहिस है'। जब उ मनई मर जात रहा, तौ ओकर परिवार ओकर संदेश का पूरा करत रहा, यानी ओकरे शरीर का जला के कुछ जमीन अऊर कुछ समुद्र मा फेंक देत रहा। तब अल्लाह सुभानाहु वा तआला ने भूमि को आदेश दिया कि व्यक्ति के शरीर को एकजुट करें और अल्लाह ने भी समुद्र को आदेश दिया कि व्यक्ति के शरीर को एकजुट करें। बरज़ख के दायरे मा लाशन का फिर से एक साथ इकट्ठा करै के बाद, अल्लाह ने उनसे पूछा: 'हे मोर सेवक, तुमने अपने परिवार का अइसन कार्रवाई करै का आदेश काहे दिहिन? ' आदमी जवाब दिहिस; 'हे अल्लाह, मोर प्रभु, हम अइसन एहसे किहेन काहे से कि हम तोहरे सजा से डरत रहेन, भले ही तू ही सबसे अच्छा जानत हौ'। आखिरकार अल्लाह ओका माफ कइ दिहिस'।

Hadith Corroboration :

Imam Ahmad : 15, 3597, 7327, 7697, 10674, 10704, 11237, 11312, 19160, 19161, 19171, 19184, 19189, 22169
Imam Bukhari : 3219, 3220, 3222, 5999, 6000, 6952, 6954
Imam Muslim : 4949, 4950, 4952
Imam Ibnu Majah : 4245
Imam Malik : 506