इस्लाम स्वीकार करें, यहाँ क्लिक करें
ISLAM AL-HAQ: QURAN & HADITH
(The True Islam)



Malaikat jibril tidak masuk ke rumah yang ada anjingnya dan ada gambarnya, dan juga patung

Imam Muslim : 3941

حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَحْيَى قَالَ قَرَأْتُ عَلَى مَالِكٍ عَنْ نَافِعٍ عَنْ الْقَاسِمِ بْنِ مُحَمَّدٍ عَنْ عَائِشَةَ أَنَّهَا اشْتَرَتْ نُمْرُقَةً فِيهَا تَصَاوِيرُ فَلَمَّا رَآهَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَامَ عَلَى الْبَابِ فَلَمْ يَدْخُلْ فَعَرَفْتُ أَوْ فَعُرِفَتْ فِي وَجْهِهِ الْكَرَاهِيَةُ فَقَالَتْ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَتُوبُ إِلَى اللَّهِ وَإِلَى رَسُولِهِ فَمَاذَا أَذْنَبْتُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مَا بَالُ هَذِهِ النُّمْرُقَةِ فَقَالَتْ اشْتَرَيْتُهَا لَكَ تَقْعُدُ عَلَيْهَا وَتَوَسَّدُهَا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِنَّ أَصْحَابَ هَذِهِ الصُّوَرِ يُعَذَّبُونَ وَيُقَالُ لَهُمْ أَحْيُوا مَا خَلَقْتُمْ ثُمَّ قَالَ إِنَّ الْبَيْتَ الَّذِي فِيهِ الصُّوَرُ لَا تَدْخُلُهُ الْمَلَائِكَةُ و حَدَّثَنَاه قُتَيْبَةُ وَابْنُ رُمْحٍ عَنْ اللَّيْثِ بْنِ سَعْدٍ ح و حَدَّثَنَا إِسْحَقُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ أَخْبَرَنَا الثَّقَفِيُّ حَدَّثَنَا أَيُّوبُ ح و حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ بْنُ عَبْدِ الصَّمَدِ حَدَّثَنَا أَبِي عَنْ جَدِّي عَنْ أَيُّوبَ ح و حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ سَعِيدٍ الْأَيْلِيُّ حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ أَخْبَرَنِي أُسَامَةُ بْنُ زَيْدٍ ح و حَدَّثَنِي أَبُو بَكْرِ بْنُ إِسْحَقَ حَدَّثَنَا أَبُو سَلَمَةَ الْخُزَاعِيُّ أَخْبَرَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ أَخِي الْمَاجِشُونِ عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ كُلُّهُمْ عَنْ نَافِعٍ عَنْ الْقَاسِمِ عَنْ عَائِشَةَ بِهَذَا الْحَدِيثِ وَبَعْضُهُمْ أَتَمُّ حَدِيثًا لَهُ مِنْ بَعْضٍ وَزَادَ فِي حَدِيثِ ابْنِ أَخِي الْمَاجِشُونِ قَالَتْ فَأَخَذْتُهُ فَجَعَلْتُهُ مِرْفَقَتَيْنِ فَكَانَ يَرْتَفِقُ بِهِمَا فِي الْبَيْتِ

हमका [यह्या बिन यह्या] बताइके उ कहिन; हम [नफी'] से [अल कासिम बिन मुहम्मद] से ['ऐस्या] से किताब [मलिक] पढ़ेन कि उ चित्रन के साथ छोट-छोट तकिया खरीदिन। जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तकिया देखिन तौ उ दरवाजा पर रुकि गें अऊर अंदर घुसब जारी नाहीं रखिन। मैं तुरंत ओकरे चेहरा से समझि पावा कि ऊ खुश नाहीं रहा। 'आइशा कहिन; 'हे अल्लाह के रसूल! मैं अल्लाह अऊर उनके रसूल से पश्चाताप करत हउँ। का ई हमार गलती है? ' रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फिर पूछा: 'ई तकिया का हैं? ' आयशा जवाब दिहिस; 'मैंने ई तोहार सीट या वहि जगह के लिए खरीदा है जहाँ तुम झुकत हौ'। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: 'इन चित्रन के चित्रकारन का कायामत के दिन यातना दीन जाई अऊर ओनसे कहा जाई: 'तुमने जवन चित्र बनावा है, ओनका जीवन मा लावा! ' फिर उ कहिन: स्वर्गदूत ओन घर मा घुसय नाहीं चाहत हैं जेहिमा चित्र हैं। हमका [कुतैबा] अऊर [इब्न रुम्ह] का [अल लैट्स बिन सद] से बतावा है; वइसने ई दूसर मार्ग से सुनावा गा है; अऊर हमका [इशाक बिन इब्राहिम] बताइस है; हमका [अत्स त्साकाफी] सूचित किहिन हैं; हमसे [अय्यूब] बताइस है; वइसने ई दूसर मार्ग से सुनावा गा है; अऊर हमका ['अब्दुल वारित्स बिन 'अब्दुश शमाद] बताइस है; हमका [मेरे पिता] से [मेरे दादा] से [अय्यूब] से बताइस है; वइसने ई दूसर मार्ग से सुनावा गा है; अऊर हमसे [हारून बिन सईद अल लैली] बताइस है; हमका [इब्न वाहब] बताइस है; मोका [उसामा बिन जैद] सूचित किहिन हैं; वइसने ई दूसर मार्ग से सुनावा गा है; अऊर मोका [अबू बकर बिन इशाक] बताइस है; हमसे [अबू सलामा अल हुजाई] बताइस है; हमका ['अब्दुल अजीज बिन अखी अल मजिस्यून] ['उबैदिल्लाह बिन 'उमर] से पूरी तरह से [नफी'] से [अल कासिम] से ['ऐस्या] से समान हदीस के साथ रिपोर्ट किहिन है। अऊर ओनमा से कुछ के पास दूसरन के तुलना मा अधिक पूरा हदीस है। इब्न अखी अल मजिस्यून के हदीस मा थोड़ा सा जोड़ है; 'आइशा कहिन; 'फिर हम ओका लिहेन अऊर हम ओका दुइ तकिया बनायेन। घर मा तकिया के रूप मा दुइनौ का बनाइन।

Hadith Corroboration :

Imam Ahmad : 1769, 2054, 2671, 3102, 3210, 3220, 3377, 3674, 3845, 4477, 4561, 4921, 5507, 5811, 5980, 6044, 6869, 7209, 8584, 8716, 8721, 9448, 10399, 22952, 23127, 23281, 23370, 23417, 23424, 24450, 24655, 24684, 24803, 24896, 24946
Imam Bukhari : 1963, 2073, 4783, 5494, 5495, 5496, 5497, 5498, 5504, 5506, 5644, 6520, 7002, 7003, 7004
Imam Muslim : 3936, 3937, 3941, 3942, 3943, 3944, 3945, 3946, 3947
Imam Abu Dawud : 3621, 4370
Imam Tirmidzi : 1673
Imam Nasa'i : 5261, 5262, 5263, 5264, 5265, 5266, 5267, 5268, 5269
Imam Ibnu Majah : 2142
Imam Malik : 1525