Rasulullah mengusap bagian atas khuff (sepatunya)
Imam Tirmidzi : 93
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ الْقَطَّانُ عَنْ سُلَيْمَانَ التَّيْمِيِّ عَنْ بَكْرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ الْمُزَنِيِّ عَنْ الْحَسَنِ عَنْ ابْنِ الْمُغِيرَةِ بْنِ شُعْبَةَ عَنْ أَبِيهِ قَالَتَوَضَّأَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَمَسَحَ عَلَى الْخُفَّيْنِ وَالْعِمَامَةِقَالَ بَكْرٌ وَقَدْ سَمِعْتُهُ مِنَ ابْنِ الْمُغِيرَةِ قَالَ وَذَكَرَ مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ فِي هَذَا الْحَدِيثِ فِي مَوْضِعٍ آخَرَ أَنَّهُ مَسَحَ عَلَى نَاصِيَتِهِ وَعِمَامَتِهِ وَقَدْ رُوِيَ هَذَا الْحَدِيثُ مِنْ غَيْرِ وَجْهٍ عَنْ الْمُغِيرَةِ بْنِ شُعْبَةَ ذَكَرَ بَعْضُهُمْ الْمَسْحَ عَلَى النَّاصِيَةِ وَالْعِمَامَةِ وَلَمْ يَذْكُرْ بَعْضُهُمْ النَّاصِيَةَ و سَمِعْت أَحْمَدَ بْنَ الْحَسَنِ يَقُولُ سَمِعْتُ أَحْمَدَ بْنَ حَنْبَلٍ يَقُولُ مَا رَأَيْتُ بِعَيْنِي مِثْلَ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ الْقَطَّانِ قَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ عَمْرِو بْنِ أُمَيَّةِ وَسَلْمَانَ وَثَوْبَانَ وَأَبِي أُمَامَةَ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ الْمُغِيرَةِ بْنِ شُعْبَةَ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَهُوَ قَوْلُ غَيْرِ وَاحِدٍ مِنْ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مِنْهُمْ أَبُو بَكْرٍ وَعُمَرُ وَأَنَسٌ وَبِهِ يَقُولُ الْأَوْزَاعِيُّ وَأَحْمَدُ وَإِسْحَقُ قَالُوا يَمْسَحُ عَلَى الْعِمَامَةِ و قَالَ غَيْرُ وَاحِدٍ مِنْ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَالتَّابِعِينَ لَا يَمْسَحُ عَلَى الْعِمَامَةِ إِلَّا بِرَأْسِهِ مَعَ الْعِمَامَةِ وَهُوَ قَوْلُ سُفْيَانَ الثَّوْرِيِّ وَمَالِكِ بْنِ أَنَسٍ وَابْنِ الْمُبَارَكِ وَالشَّافِعِيِّ قَالَ أَبُو عِيسَى و سَمِعْت الْجَارُودَ بْنَ مُعَاذٍ يَقُولُ سَمِعْتُ وَكِيعَ بْنَ الْجَرَّاحِ يَقُولُ إِنْ مَسَحَ عَلَى الْعِمَامَةِ يُجْزِئُهُ لِلْأَثَرِ
हमसे कहिन है [मुहम्मद बिन बसिस्यार] कहिन हैं, हमसे [यह्या बिन सईद अल कथथान] से [सुलेमान अत तैमी] से [बकर बिन अब्दुल्लाह अल मुजानी] से [अल हसन] से [इब्नुल मुघिराह बिन स्यू'बाह] से [उनके पिता] से कहिन हैं, उ कहिन; 'पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वजू लिया, अऊर उ खूफ अऊर इमामह का पोंछिन - एक तरह के पगड़ी जवन सिर से बंधी रही-'। [बकर] कहिन; 'मैंने [इब्नुल मुघिराह] से सुना है। कथावाचक कहिन; 'मुहम्मद बिन बसिसियार ने ई हदीस का कहीं अउर बतावा रहा, कि उ आपन अग्रभाग अऊर पगड़ी पोंछिन'। ई हदीस एक अउर मार्ग से भी सुनाई गै रही, अल मुघिराह बिन स्यूबाह से। ओनमा से कुछ लोग लाफाडज़ का जिक्र किहिन; 'अपने अग्रभाग अऊर पगड़ी का सहलावत', जबकि कुछ लोग एकर जिक्र नाहीं किहिन। अऊर हम अहमद इब्नुल हसन का कहत सुनेन; हमने अहमद बिन हंबल का कहते सुना; 'हम याह्या बिन सईद अल कथथन जइसन मनई का अपनी दुइ आँखिन से नाहीं देखेन'। कथावाचक कहिन, 'इ अध्याय मा अमरू बिन उमय्या, सलमान, त्सौबान अऊर अबू उमामा से भी एक इतिहास है'। अबू ईसा कहिन; 'अल मुघिराह बिन स्यूबाह के हदीस हसन प्रामाणिक है, ई राय पैगम्बर सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम के साथियन, जइसे कि अबू बकर, उमर अऊर अनस से कईयो विद्वानन द्वारा लीन जात है'। ई राय अल औजाई, अहमद अऊर इशाक के पास भी है। उइ कहिन; 'कोऊ आपन पगड़ी पोंछ सकत है'। और पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और तबीइन के साथियों से कई विद्वान ने कहा; 'एक मनई का आपन पगड़ी तब तक नाहीं पोंछै का चाही जब तक कि उ आपन माथा अऊर आपन पगड़ी न पोंछै'। ई सुफयान अत्स त्सौरी, मलिक बिन अनस, इब्नुल मुबारक अऊर स्याफरी के राय है। अबू ईसा कहिन; हम अल जारुद बिन मुआद्ज का कहत सुने रहेन; हमने वाकी इब्नुल जर्राह का कहते सुना; 'अगर उ खाली आपन पगड़ी पोंछत है तौ उहै ओकरे लिए काफी है, काहे से कि उ सुन्नत है'।
Hadith Corroboration :
Imam Ahmad : 83, 84, 123, 188, 211, 290, 325, 742, 923, 966, 1373, 1380, 1531, 2821, 3283, 15571, 15580, 15592, 16607, 16608, 16609, 16610, 16953, 16954, 16957, 17454, 17461, 17466, 17481, 17496, 17510, 17515, 17516, 17518, 17524, 17525, 18377, 18405, 18437, 18438, 18439, 18440, 20865, 21384, 21440, 21443, 21444, 21445, 21448, 21895, 21903, 22157, 22324, 22602, 22608, 22759, 22767, 22768, 22771, 22773, 22779, 22783, 22786, 22790, 22791, 22792, 22793, 25597
Imam Bukhari : 176, 195, 196, 197, 198, 350, 374, 375
Imam Muslim : 401, 402, 404, 405, 406, 407, 408, 409, 410, 411, 412, 413, 415
Imam Abu Dawud : 21, 132, 133, 134, 137, 138, 139
Imam Tirmidzi : 13, 86, 87, 90, 91, 92, 93, 94, 95, 556
Imam Nasa'i : 16, 17, 78, 103, 104, 105, 106, 107, 108, 117, 118, 119, 120, 121, 122, 123, 124, 125
Imam Ibnu Majah : 536, 537, 538, 539, 540, 541, 542, 543, 544, 546, 547, 548, 549, 550, 551, 552, 553, 554, 555
Imam Malik : 64, 65, 66, 67, 68
Imam Darimi : 704, 707, 709