Menuduh orang fasik, dan kufur, kembali kepadanya, jika tidak seperti itu
Imam Ahmad : 20590
حَدَّثَنَا عَبْدُ الصَّمَدِ حَدَّثَنِي أَبِي حَدَّثَنِي حُسَيْنٌ قَالَ قَالَ ابْنُ بُرَيْدَةَ حَدَّثَنِي يَحْيَى بْنُ يَعْمَرَ أَنَّ أَبَا الْأَسْوَدِ حَدَّثَهُ عَنْ أَبِي ذَرٍّ أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ لَا يَرْمِ رَجُلٌ رَجُلًا بِالْفِسْقِ وَلَا يَرْمِهِ بِالْكُفْرِ إِلَّا ارْتَدَّتْ عَلَيْهِ إِنْ لَمْ يَكُنْ صَاحِبُهُ كَذَلِكَ
हमसे कहिन [अब्दुशमद] हमसे कहिन हैं [मेरे पिता] ने हमसे कहिन हैं [हुसैन] उ कहिन; [इब्न बुरैदा] कहिन; ने मुझसे [यह्या बिन यामर] बतावा है कि [अबुल असवाद] ने [अबू ज़ार] से कहा है, कि उ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुनिन है: 'कोऊ दूसर मनई का बेभक्त या काफिर होवे का आरोप न लगावै, अगर आरोप लगावा गा व्यक्ति उ नाहीं है जवन उ आरोप लगाइस है, तौ शब्द उ व्यक्ति के पास वापस आ जइहैं जे आरोप लगाइस है'।