Keutamaan muadzin: mengeraskan suara ketika adzan, kesaksian makhluk terhadap suara muadzin pada hari kiamat
Imam Ahmad : 10607
حَدَّثَنَا سُفْيَانُ حَدَّثَنِي ابْنُ أَبِي صَعْصَعَةَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ أَبِيهِ قَالَ قَالَ لِي أَبُو سَعِيدٍ وَكَانَ فِي حُجْرَةٍ فَقَالَ لِي يَا بُنَيَّ إِذَا أَذَّنْتَ فَارْفَعْ صَوْتَكَ بِالْأَذَانِ فَإِنِّي سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ لَيْسَ شَيْءٌ يَسْمَعُهُ إِلَّا شَهِدَ لَهُ جِنٌّ وَلَا إِنْسٌ وَلَا حَجَرٌ و قَالَ مَرَّةً يَا بُنَيَّ إِذَا كُنْتَ فِي الْبَرَارِيِّ فَارْفَعْ صَوْتَكَ بِالْأَذَانِ فَإِنِّي سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ لَا يَسْمَعُهُ جِنٌّ وَلَا إِنْسٌ وَلَا حَجَرٌ وَلَا شَيْءٌ يَسْمَعُهُ إِلَّا شَهِدَ لَهُ قَالَ أَبِي وَسُفْيَانُ مُخْطِئٌ فِي اسْمِهِ وَالصَّوَابُ عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي صَعْصَعَةَ
हमसे कहिन है [सुफयान] कहिन; [इब्न अबू शशाअह अब्दुल्लाह बिन अब्दुर्रहमान] [अपने पिता] से बताइस है, उ कहिन; [अबू सईद] ने मुझसे कहा जब उ उ समय कमरा मा रहे, उ कहिन; 'हे मोर बेटवा, अगर तुम अज़ान करत हौ तौ आपन आवाज उठावा, सचमुच हम अल्लाह के रसूल सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम का कहत सुने रहेन: 'कोई भी ई बात का नाहीं सुनत है, चाहे ऊ जिन्न होय, इंसान होय या पत्थर होय, जब तक कि ऊ ई बात के गवाही न देई'। बीच-बीच मा ऊ कहत रहा; 'हे मोर बेटवा, अगर तुम रेगिस्तान मा हौ तौ अज़ान करत समय आपन आवाज उठावा, काहे से कि हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम का कहत सुने रहेन: 'तुम ई नाहीं सुन सकत हौ, चाहे ऊ जिन्न होय, इंसान होय, पत्थर होय या कुछौ जब तक कि ई बात के गवाही न देई'। मोर पिताजी कहिन; अऊर सुफयान आपन नाम बोलै मा गलत रहे, सही अब्दुर्रहमान बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुर्रहमान बिन अबू शशा' रहे।