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ISLAM AL-HAQ: QURAN & HADITH
(The True Islam)



Larangan menyewakan sawah akibat unsur ketidakpastian (gharar)

Imam Nasa'i : 3854

أَخْبَرَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ قَالَ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَمْزَةَ قَالَ حَدَّثَنَا الْأَوْزَاعِيُّ قَالَ حَدَّثَنِي حَفْصُ بْنُ عِنَانٍ عَنْ نَافِعٍ أَنَّهُ حَدَّثَهُ قَالَ كَانَ ابْنُ عُمَرَ يُكْرِي أَرْضَهُ بِبَعْضِ مَا يَخْرُجُ مِنْهَا فَبَلَغَهُ أَنَّ رَافِعَ بْنَ خَدِيجٍ يَزْجُرُ عَنْ ذَلِكَ وَقَالَ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَنْ ذَلِكَ قَالَ كُنَّا نُكْرِي الْأَرْضَ قَبْلَ أَنْ نَعْرِفَ رَافِعًا ثُمَّ وَجَدَ فِي نَفْسِهِ فَوَضَعَ يَدَهُ عَلَى مَنْكِبِي حَتَّى دُفِعْنَا إِلَى رَافِعٍ فَقَالَ لَهُ عَبْدُ اللَّهِ أَسَمِعْتَ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَهَى عَنْ كِرَاءِ الْأَرْضِ فَقَالَ رَافِعٌ سَمِعْتُ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ لَا تُكْرُوا الْأَرْضَ بِشَيْءٍ

हमका [हिस्याम बिन अम्मर] सूचित कइके, उ कहिन; हमसे कहिस है [यह्या बिन हमजाह] हमसे कहिस है [अल औजाई] ने [नाफी' से [हफ्श बिन 'इनान] से कहिस है कि उ ओसे कहिस है, उ कहिस है; 'अतीत मा, इब्न उमर आपन जमीन किराए पर देत रहें, जेकरे बदले मा ओसे आय के एक हिस्सा मिलत रहा। फिर उनके मन मा ई बात आई कि [रफी' बिन खदीज] उनका अइसन करै से मना किहिन अऊर उ कहिन; 'रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ई मना किहिन'। इब्न उमर कहिन; "रफी के बारे मा पता चले से पहिले हम जमीन किराया पर देत रहेन।" फिर उनका अपने दिल मा एक गांठ महसूस भै तौ उ आपन हाथ मोर कंधा पर रखिन जब तक कि हम रफी के तरफ नाहीं बढ़ेन। तब अब्दुल्ला ने उनसे कहा; 'का तुमने सुना है कि पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जमीन किराए पर लेने से मना किया है?' तौ रफी' कहिन; 'मैंने पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कहते सुना: 'किसी भी चीज के लिए जमीन किराए पर न दें'।

Hadith Corroboration :

Imam Ahmad : 4275, 5067, 13800, 14108, 14113, 14649, 14715, 15258, 15265, 16619, 16621, 16649, 18228
Imam Bukhari : 3710
Imam Muslim : 2860, 2861, 2872, 2873, 2874, 2880, 2881, 2882, 2883, 2884, 2887
Imam Abu Dawud : 2931, 2945, 2946, 2952
Imam Nasa'i : 3802, 3807, 3818, 3828, 3840, 3843, 3844, 3846, 3848, 3849, 3851, 3852, 3853, 3854, 3855, 3865, 4455, 4547, 4548
Imam Ibnu Majah : 2444, 2445, 2446
Imam Malik : 1199
Imam Darimi : 2503