Imam Ibnu Majah : 3052
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى عَنْ عُثْمَانَ بْنِ الْأَسْوَدِ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ قَالَكُنْتُ عِنْدَ ابْنِ عَبَّاسٍ جَالِسًا فَجَاءَهُ رَجُلٌ فَقَالَ مِنْ أَيْنَ جِئْتَ قَالَ مِنْ زَمْزَمَ قَالَ فَشَرِبْتَ مِنْهَا كَمَا يَنْبَغِي قَالَ وَكَيْفَ قَالَ إِذَا شَرِبْتَ مِنْهَا فَاسْتَقْبِلْ الْقِبْلَةَ وَاذْكُرْ اسْمَ اللَّهِ وَتَنَفَّسْ ثَلَاثًا وَتَضَلَّعْ مِنْهَا فَإِذَا فَرَغْتَ فَاحْمَدْ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ فَإِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِنَّ آيَةَ مَا بَيْنَنَا وَبَيْنَ الْمُنَافِقِينَ إِنَّهُمْ لَا يَتَضَلَّعُونَ مِنْ زَمْزَمَ
हमसे [अली बिन मुहम्मद] बताइस है; हमका [उबैदुल्लाह बिन मूसा] से [उथमान बिन अल असवाद] से [मुहम्मद बिन अब्दुर्रहमान बिन अबू बकर] से कहिन है, उ कहिन; 'मैं [इब्न अब्बास] के पास बैठा रहा, तब एक आदमी उनके पास आया, तब उन्होंने पूछा; 'तुम कहाँ रहेव? ' उ जवाब दिहिस; 'ज़मज़म से'। ऊ फिर से पूछिस; 'का तुम वहिसे वइसने पिया जइसे तुमका चाही? ' ऊ कहत है; 'कइसे? ' उ जवाब दिहिन: 'जब तुम ईका पीओ, तो किबला का सामना करौ, बिस्मिल्लाह पढ़ौ, तीन बार साँस लेव, अऊर तब तक संतुष्ट रहौ जब तक कि तुम महसूस न करौ कि तुम फिर से बाहर आवै वाले हौ, अऊर जब तुम खतम कइ लेव, तौ अल्लाह अज्जा वजल्ला के स्तुति करौ। दरअसल रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: 'वास्तव में हम और पाखंडियों के बीच अंतर का निशानी यह है कि वे ज़मज़म का पानी पीने से संतुष्ट नहीं हैं'।