Imam Tirmidzi : 1513
حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي عُمَرَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ عَنْ بَجَالَةَأَنَّ عُمَرَ كَانَ لَا يَأْخُذُ الْجِزْيَةَ مِنْ الْمَجُوسِ حَتَّى أَخْبَرَهُ عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ عَوْفٍ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخَذَ الْجِزْيَةَ مِنْ مَجُوسِ هَجَرَ وَفِي الْحَدِيثِ كَلَامٌ أَكْثَرُ مِنْ هَذَا وَهَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ
हमका बतावा गा है [इब्न अबू उमर] कहिन, हमका बतावा गा है [सुफयान] से [अमरू बिन दीनार] से [बजालाह] कहिन, 'उमर ने कभी भी मगी लोगन से जिज़ियाह नाहीं लीन जब तक कि ['अब्दुर्रहमान बिन औफ] ने ओनका ई खबर नाहीं दिहिन कि पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसलम ने मजियाह के लोगन से जिज़ियाह पर तज्जिया लिया रहा। दरअसल हदीस का संपादकीय यहिसे लंबा है, अऊर ई एक हसन शाहिह हदीस है।