Jika panas nampak menyengat maka tunggu sampai dingin untuk melaksanakan shalat, karena sesungguhnya panas yang menyengat itu dari hembusan neraka jahannam
Imam Tirmidzi : 145
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ وَأَبِي سَلَمَةَ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِذَا اشْتَدَّ الْحَرُّ فَأَبْرِدُوا عَنْ الصَّلَاةِ فَإِنَّ شِدَّةَ الْحَرِّ مِنْ فَيْحِ جَهَنَّمَقَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ أَبِي سَعِيدٍ وَأَبِي ذَرٍّ وَابْنِ عُمَرَ وَالْمُغِيرَةِ وَالْقَاسِمِ بْنِ صَفْوَانَ عَنْ أَبِيهِ وَأَبِي مُوسَى وَابْنِ عَبَّاسٍ وَأَنَسٍ قَالَ وَرُوِيَ عَنْ عُمَرَ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي هَذَا وَلَا يَصِحُّ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ أَبِي هُرَيْرَةَ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَقَدْ اخْتَارَ قَوْمٌ مِنْ أَهْلِ الْعِلْمِ تَأْخِيرَ صَلَاةِ الظُّهْرِ فِي شِدَّةِ الْحَرِّ وَهُوَ قَوْلُ ابْنِ الْمُبَارَكِ وَأَحْمَدَ وَإِسْحَقَ قَالَ الشَّافِعِيُّ إِنَّمَا الْإِبْرَادُ بِصَلَاةِ الظُّهْرِ إِذَا كَانَ مَسْجِدًا يَنْتَابُ أَهْلُهُ مِنْ الْبُعْدِ فَأَمَّا الْمُصَلِّي وَحْدَهُ وَالَّذِي يُصَلِّي فِي مَسْجِدِ قَوْمِهِ فَالَّذِي أُحِبُّ لَهُ أَنْ لَا يُؤَخِّرَ الصَّلَاةَ فِي شِدَّةِ الْحَرِّ قَالَ أَبُو عِيسَى وَمَعْنَى مَنْ ذَهَبَ إِلَى تَأْخِيرِ الظُّهْرِ فِي شِدَّةِ الْحَرِّ هُوَ أَوْلَى وَأَشْبَهُ بِالِاتِّبَاعِ وَأَمَّا مَا ذَهَبَ إِلَيْهِ الشَّافِعِيُّ أَنَّ الرُّخْصَةَ لِمَنْ يَنْتَابُ مِنْ الْبُعْدِ وَالْمَشَقَّةِ عَلَى النَّاسِ فَإِنَّ فِي حَدِيثِ أَبِي ذَرٍّ مَا يَدُلُّ عَلَى خِلَافِ مَا قَالَ الشَّافِعِيُّ قَالَ أَبُو ذَرٍّ كُنَّا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي سَفَرٍ فَأَذَّنَ بِلَالٌ بِصَلَاةِ الظُّهْرِ فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَا بِلَالُ أَبْرِدْ ثُمَّ أَبْرِدْ فَلَوْ كَانَ الْأَمْرُ عَلَى مَا ذَهَبَ إِلَيْهِ الشَّافِعِيُّ لَمْ يَكُنْ لِلْإِبْرَادِ فِي ذَلِكَ الْوَقْتِ مَعْنًى لِاجْتِمَاعِهِمْ فِي السَّفَرِ وَكَانُوا لَا يَحْتَاجُونَ أَنْ يَنْتَابُوا مِنْ الْبُعْدِ
हमसे कहिस है [कुतैबा] कहिन; हमका [अल लैट्स] [इब्न शिहाब] से [सैद बिन अल मुसैयब] से अऊर [अबू सलामा] से [अबू हुरैरा] से कहिन है, उ कहिन; 'रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: 'अगर दिन बहुत गर्म है तो नमाज पढ़ने के लिए ठंडा होए तक इंतजार करौ, काहे से कि गर्म गर्मी जहन्नाम के नरक के प्रहार से है'। उ कहिन; 'इ अध्याय मा अबू सैद, अबू ज़ार, इबनू उमर, अल मुघिराह, अल कासिम बिन शोफवान से उनके पिता, अबू मूसा, इब्नू अब्बास अऊर अनस से एक इतिहास भी है। उ कहिन; 'इ बारे मा उमर से पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से भी रिवायित कीन गा रहा, लेकिन ई रिवायत भी प्रामाणिक नाहीं है'। अबू ईसा कहिन; अबू हुरैरा का हदीस हसन प्रामाणिक है। अऊर वैज्ञानिकन के एक समूह ने दुपहरिया के प्रार्थना का समाप्त करै का विकल्प चुना जब सूरज बहुत गर्म रहा। ई राय बिन अल मुबारक, अहमद अऊर इशाक के पास है। शफी कहिन; 'जब तक वातावरण ठंडा न होइ जाय तब तक दुपहरिया के नमाज के इंतजार करै के अनुमति ई है कि अगर मस्जिद लोगन का गर्म करत है - मस्जिद जात समय - दूरी के कारण। जहाँ तक अकेले नमाज पढ़ै वाले या अपने लोगन के मस्जिद मा नमाज पढ़ै वाले के बात है, तौ मैं पसंद करब कि उ घाम बहुत गर्म होय के बावजूद भी नमाज पढ़त रहै'। अबू ईसा कहिन; 'जो लोग सूरज के तपते समय दोपहर के नमाज समाप्त करत हैं, तब उहै ज्यादा जरूरी है अऊर सुन्नत के अनुरूप है'। रही बात श्याफी द्वारा लीन गै राय के कि राहत ओन लोगन के लिए है जेकर निवास दूर अऊर कठिन है, तौ अबू ज़ार के हदीस मा एक तर्क है जवन श्याफी के कहे के उल्टा देखावत है। अबू धरर कहिन; 'हम एक बार पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ यात्रा पर रहे, फिर बिलाल ने नमाज के लिए दोपहर के नमाज को बुलाया, फिर पैगम्बर सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम ने कहा: 'हे बिलाल, जब तक ठंडा न हो जाय तब तक रुको'। अगर हम शफी के राय का पालन करित है, तौ इंतजार करै का कौनो फायदा नाहीं है काहे से कि उ रास्ता मा इकट्ठा होइ गए हैं अऊर ओनका परेशान करै के जरूरत नाहीं है काहे से कि उ दूर से आवत हैं'।
Hadith Corroboration :
Imam Ahmad : 6833, 6948, 6949, 7161, 7295, 7397, 7495, 7874, 8229, 8545, 8742, 8763, 8825, 8967, 9576, 9577, 10102, 10134, 10187, 10640, 11066, 11072, 11073, 11145, 17479, 17587, 17588, 20412, 20468, 20553, 20881, 22039, 23095, 23096, 23457, 25689
Imam Bukhari : 502, 503, 504, 505, 506, 593, 3019, 3020
Imam Muslim : 972, 973, 974, 975, 976, 977, 978, 979, 4094
Imam Abu Dawud : 340, 341
Imam Tirmidzi : 145, 146, 2517
Imam Nasa'i : 496, 497
Imam Ibnu Majah : 669, 670, 671, 672, 673, 3410, 3463
Imam Malik : 24, 25, 26, 1486, 1487
Imam Darimi : 1181, 2650, 2722