प्रतिनिधि हदीस
इमाम अबू दाऊद : 185
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مِهْرَانَ الْبَزَّازُ الرَّازِيُّ حَدَّثَنَا مُبَشِّرٌ الْحَلَبِيُّ عَنْ مُحَمَّدٍ أَبِي غَسَّانَ عَنْ أَبِي حَازِمٍ عَنْ سَهْلِ بْنِ سَعْدٍ حَدَّثَنِي أُبَيُّ بْنُ كَعْبٍأَنَّ الْفُتْيَا الَّتِي كَانُوا يَفْتُونَ أَنَّ الْمَاءَ مِنْ الْمَاءِ كَانَتْ رُخْصَةً رَخَّصَهَا رَسُولُ اللَّهِ فِي بَدْءِ الْإِسْلَامِ ثُمَّ أَمَرَ بِالِاغْتِسَالِ بَعْدُ
हमें बताया है [मुहम्मद बिन मेहरान अल-बज़ाज अर-रज़ी] ने हमें बताया है [मुबस्सिर अल हलबी] [मुहम्मद अबू ग़ासन] से [अबू हाज़िम] से [साहल बिन साद] ने मुझे बताया है [उबै बिन का'ब] कि वे जो फतवा देते हैं कि पानी (स्नान) पानी (वीर्य) की रिहाई के कारण होता है, वह एक रुख्शाह (राहत) है जिसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस्लाम की शुरुआत में दिया था, फिर उन्होंने उसके बाद स्नान करने का आदेश दिया।