प्रतिनिधि हदीस
इमाम बुखारी : 569
حَدَّثَنَا مَحْمُودُ بْنُ غَيْلَانَ قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ قَالَ أَخْبَرَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ قَالَ أَخْبَرَنِي نَافِعٌ أَنَّ ابْنَ عُمَرَ كَانَ يَقُولُكَانَ الْمُسْلِمُونَ حِينَ قَدِمُوا الْمَدِينَةَ يَجْتَمِعُونَ فَيَتَحَيَّنُونَ الصَّلَاةَ لَيْسَ يُنَادَى لَهَا فَتَكَلَّمُوا يَوْمًا فِي ذَلِكَ فَقَالَ بَعْضُهُمْ اتَّخِذُوا نَاقُوسًا مِثْلَ نَاقُوسِ النَّصَارَى وَقَالَ بَعْضُهُمْ بَلْ بُوقًا مِثْلَ قَرْنِ الْيَهُودِ فَقَالَ عُمَرُ أَوَلَا تَبْعَثُونَ رَجُلًا يُنَادِي بِالصَّلَاةِ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَا بِلَالُ قُمْ فَنَادِ بِالصَّلَاةِ
हमसे [महमूद बिन घैलन] ने कहा है, हमसे [अब्दुर्रज़ाक] ने कहा है, हमसे [इब्न जुरैज] ने कहा है, मुझसे [नफी] ने कहा है कि [इब्न उमर] ने कहा, “जब मुसलमान मदीना पहुँचे, तो वे समय का अंदाज़ा लगाकर नमाज़ के लिए जमा हुए, और नमाज़ के लिए कोई अज़ान नहीं हुई। एक दिन उन्होंने इस मामले पर चर्चा की, उनमें से कुछ ने ईसाइयों की घंटियों की तरह घंटी बजाने का सुझाव दिया और दूसरों ने यहूदियों की तरह तुरही बजाने का सुझाव दिया। तो उमर ने कहा, “आप किसी को नमाज़ के लिए अज़ान देने का आदेश क्यों नहीं देते?” तब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: “ऐ बिलाल, उठो और नमाज़ के लिए अज़ान दो।”