हदीस
Ketentuan zakat unta dan kambing
Imam Bukhari : 1362حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْمُثَنَّى الْأَنْصَارِيُّ قَالَ حَدَّثَنِي أَبِي قَالَ حَدَّثَنِي ثُمَامَةُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَنَسٍ أَنَّ أَنَسًا حَدَّثَهُأَنَّ أَبَا بَكْرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ كَتَبَ لَهُ هَذَا الْكِتَابَ لَمَّا وَجَّهَهُ إِلَى الْبَحْرَيْنِ بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ هَذِهِ فَرِيضَةُ الصَّدَقَةِ الَّتِي فَرَضَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَلَى الْمُسْلِمِينَ وَالَّتِي أَمَرَ اللَّهُ بِهَا رَسُولَهُ فَمَنْ سُئِلَهَا مِنْ الْمُسْلِمِينَ عَلَى وَجْهِهَا فَلْيُعْطِهَا وَمَنْ سُئِلَ فَوْقَهَا فَلَا يُعْطِ فِي أَرْبَعٍ وَعِشْرِينَ مِنْ الْإِبِلِ فَمَا دُونَهَا مِنْ الْغَنَمِ مِنْ كُلِّ خَمْسٍ شَاةٌ إِذَا بَلَغَتْ خَمْسًا وَعِشْرِينَ إِلَى خَمْسٍ وَثَلَاثِينَ فَفِيهَا بِنْتُ مَخَاضٍ أُنْثَى فَإِذَا بَلَغَتْ سِتًّا وَثَلَاثِينَ إِلَى خَمْسٍ وَأَرْبَعِينَ فَفِيهَا بِنْتُ لَبُونٍ أُنْثَى فَإِذَا بَلَغَتْ سِتًّا وَأَرْبَعِينَ إِلَى سِتِّينَ فَفِيهَا حِقَّةٌ طَرُوقَةُ الْجَمَلِ فَإِذَا بَلَغَتْ وَاحِدَةً وَسِتِّينَ إِلَى خَمْسٍ وَسَبْعِينَ فَفِيهَا جَذَعَةٌ فَإِذَا بَلَغَتْ يَعْنِي سِتًّا وَسَبْعِينَ إِلَى تِسْعِينَ فَفِيهَا بِنْتَا لَبُونٍ فَإِذَا بَلَغَتْ إِحْدَى وَتِسْعِينَ إِلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ فَفِيهَا حِقَّتَانِ طَرُوقَتَا الْجَمَلِ فَإِذَا زَادَتْ عَلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ فَفِي كُلِّ أَرْبَعِينَ بِنْتُ لَبُونٍ وَفِي كُلِّ خَمْسِينَ حِقَّةٌ وَمَنْ لَمْ يَكُنْ مَعَهُ إِلَّا أَرْبَعٌ مِنْ الْإِبِلِ فَلَيْسَ فِيهَا صَدَقَةٌ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ رَبُّهَا فَإِذَا بَلَغَتْ خَمْسًا مِنْ الْإِبِلِ فَفِيهَا شَاةٌ وَفِي صَدَقَةِ الْغَنَمِ فِي سَائِمَتِهَا إِذَا كَانَتْ أَرْبَعِينَ إِلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ شَاةٌ فَإِذَا زَادَتْ عَلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ إِلَى مِائَتَيْنِ شَاتَانِ فَإِذَا زَادَتْ عَلَى مِائَتَيْنِ إِلَى ثَلَاثِ مِائَةٍ فَفِيهَا ثَلَاثُ شِيَاهٍ فَإِذَا زَادَتْ عَلَى ثَلَاثِ مِائَةٍ فَفِي كُلِّ مِائَةٍ شَاةٌ فَإِذَا كَانَتْ سَائِمَةُ الرَّجُلِ نَاقِصَةً مِنْ أَرْبَعِينَ شَاةً وَاحِدَةً فَلَيْسَ فِيهَا صَدَقَةٌ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ رَبُّهَا وَفِي الرِّقَّةِ رُبْعُ الْعُشْرِ فَإِنْ لَمْ تَكُنْ إِلَّا تِسْعِينَ وَمِائَةً فَلَيْسَ فِيهَا شَيْءٌ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ رَبُّهَا
हमनी के बतवले बाड़े [मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अल मुत्सन्ना अल अंसारी] कहले बाड़े, हमरा के बतवले बाड़े [हमार पिता] उ कहले बाड़े, हमरा के बतवले बाड़े [त्सुमामा बिन अब्दुल्लाह बिन अनस] कि [अनास] उनुका के बतवले रहले कि अबू बकर रदलियाल्लाहु अनहू उनुका के इ चिट्ठी लिखले रहले -जकात के नियम के बारे में- जब उ उनुका के बहरीन के धरती प भेजले रहले: 'बिस्मिल्लाहिर रहमानीर रहीम।' इहे जकात के फर्ज ह जवन नबी सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम के ओर से मुसलमानन खातिर मांगल गईल बा अवुरी जईसे कि एकरा बारे में अल्लाह अवुरी उनुकर रसूलुल्लाह के आदेश बा, जेकरा से मुसलमान से प्रावधान के मुताबिक जकात मांगल जाए त ओकरा के देवे अवुरी जदी रूज से जादे मांगल जाए त ओकरा के ना देवे, यानी - ऊंट के जकात के प्रावधान में - हर चौबीस ऊंट प अवुरी ओकरा से कम बकरी के साथे जकात के। हर पांच ऊंट पर जकात बकरी होला। अगर पच्चीस से पैंतीस ऊंट तक पहुँच जाला त जकात एक मादा बिंटू मखाढ़ के होला। अगर छत्तीस से पैंतालीस ऊंट तक पहुँच जाला त जकात 1 मादा बिंतू लबून होला, अगर छियालीस से साठ ऊंट तक पहुँच जाला त जकात एगो हिक्का होला जवन नर ऊंट से निषेचित करे खातिर तइयार होला। अगर एकसठ से पचहत्तर ऊंट तक पहुँच गईल बानी त जकात एक जदजाआ बा। अगर छहत्तर से नब्बे ऊंट तक पहुँच गइल बानी त जकात दू बिंतू लबून ह। अगर रउरा एकनबे से एक सौ बीस ऊंट तक पहुँच गइल बानी त जकात दू गो हिक्का होखी जवन नर ऊंट से निषेचित होखे खातिर तइयार होखी. अगर एक सौ बीस से अधिका होखे त नियम बा कि चालीस सिर के हर गुणनफल खातिर जकात एक बिनतू लबुन पूंछ होला आ पचास पूंछ के हर गुणनफल खातिर जकात एक हिक्का पूंछ होला. आ जेकरा लगे चार ऊंट छोड़ के ऊंट ना होखे तबले ओकरा खातिर जकात के कवनो फर्ज ना होखे जबले मालिक जकात देबे के तइयार ना होखे काहे कि हर पाँच ऊंट पर ही जकात होला, माने कि एक बकरी. आ बकरी के जकात खातिर जवन ईआ रदलियाल्लाहु अनहु में चरावल जाला जवन पेन में ना राखल जाला, प्रावधान ई बा कि अगर ऊ चालीस से एक सौ बीस के संख्या तक पहुँच गइल होखे त जकात एक बकरी, अगर एक सौ से दू सौ से अधिका, जकात दू गो बकरी, अगर दू सौ से तीन सौ से अधिका, जकात तीन बकरी, अगर तीन सौ से अधिका, त एक के हर गुणनफल खातिर जकात सौ, जकात एक बकरी ह। आ अगर कवनो चरवाहा के लगे चालीस से कम बकरी होखे त ओकरा खातिर जकात के कवनो फर्ज तबले ना होखे जबले मालिक ओकरा के देबे के तइयार ना होखे. आ चाँदी के सिक्का - दिरहम - के जकात खातिर प्रावधान चालीसवाँ हिस्सा होला अगर - ऊ दू सौ दिरहम तक पहुँच गइल बा - आ अगर ऊ संख्या ना चहुँप जाव बाकिर महज एक सौ नब्बे तक ना चहुँप जाव त जबले मालिक ओकरा के देबे के तइयार ना होखे तबले जकात के कवनो बाध्यता ना होखे.