प्रतिनिधि हदीस
इमाम बुखारी : 4145
حَدَّثَنِي إِسْحَاقُ أَخْبَرَنَا رَوْحٌ حَدَّثَنَا زَكَرِيَّاءُ بْنُ إِسْحَاقَ حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ دِينَارٍ عَنْ عَطَاءٍ سَمِعَ ابْنَ عَبَّاسٍيَقْرَأُ وَعَلَى الَّذِينَ يُطَوَّقُونَهُ فَلَا يُطِيقُونَهُ{ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ }قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ لَيْسَتْ بِمَنْسُوخَةٍ هُوَ الشَّيْخُ الْكَبِيرُ وَالْمَرْأَةُ الْكَبِيرَةُ لَا يَسْتَطِيعَانِ أَنْ يَصُومَا فَيُطْعِمَانِ مَكَانَ كُلِّ يَوْمٍ مِسْكِينًا
मुझे बताया है [इस्हाक] ने हमें बताया है [रौह] ने हमें बताया है [ज़कारिया बिन इस्हाक] ने हमें बताया है [अमरू बिन दीनार] [अथा] से उसने [इब्न अब्बास] को आयत पढ़ते हुए सुना; "और जिन लोगों को इसे पूरा करने में कठिनाई होती है, उन पर फिद्या देना अनिवार्य है, अर्थात गरीबों को खाना खिलाना," (QS. अल्बक़रा 184), इब्न अब्बास ने कहा; यह आयत दिमानशुख नहीं है, बल्कि यह आयत केवल बहुत बूढ़े लोगों और बूढ़ी दादियों के लिए है, जो इसे पूरा करने में असमर्थ हैं, इसलिए उन्हें हर दिन गरीबों को खाना देना चाहिए।'