इमाम दरिमी : 161
أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّلْتِ حَدَّثَنَا زُهَيْرٌ عَنْ جَعْفَرِ بْنِ بُرْقَانَ حَدَّثَنَا مَيْمُونُ بْنُ مِهْرَانَ قَالَ كَانَ أَبُو بَكْرٍ إِذَا وَرَدَ عَلَيْهِ الْخَصْمُ نَظَرَ فِي كِتَابِ اللَّهِ فَإِنْ وَجَدَ فِيهِ مَا يَقْضِي بَيْنَهُمْ قَضَى بِهِ وَإِنْ لَمْ يَكُنْ فِي الْكِتَابِ وَعَلِمَ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي ذَلِكَ الْأَمْرِ سُنَّةً قَضَى بِهِ فَإِنْ أَعْيَاهُ خَرَجَ فَسَأَلَ الْمُسْلِمِينَ فَقَالَ أَتَانِي كَذَا وَكَذَا فَهَلْ عَلِمْتُمْ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَضَى فِي ذَلِكَ بِقَضَاءٍ فَرُبَّمَا اجْتَمَعَ إِلَيْهِ النَّفَرُ كُلُّهُمْ يَذْكُرُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِيهِ قَضَاءً فَيَقُولُ أَبُو بَكْرٍ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي جَعَلَ فِينَا مَنْ يَحْفَظُ عَلَى نَبِيِّنَا فَإِنْ أَعْيَاهُ أَنْ يَجِدَ فِيهِ سُنَّةً مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ جَمَعَ رُءُوسَ النَّاسِ وَخِيَارَهُمْ فَاسْتَشَارَهُمْ فَإِنْ أَجْمَعَ رَأْيُهُمْ عَلَى أَمْرٍ قَضَى بِهِ
हमें [मुहम्मद बिन अस शाल्ट] ने [ज़ुहैर] से [जाफ़र बिन बुरकान] ने हमें [मैमुन बिन मिहरान] से बताया है कि उन्होंने कहा: "पहले [अबू बक्र] रदलिअल्लाहु अन्हु को जब कोई समस्या (विवाद) होती थी, तो वह तुरंत उसे अल्लाह की किताब सुभानल्लाहु व ता'आला में ढूंढते थे, अगर उन्हें कोई स्पष्टीकरण मिल जाता था तो वह उसके साथ समस्या का फैसला करते थे, लेकिन अगर यह अल्लाह की किताब में नहीं मिलता था और वह उस मामले के बारे में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कोई सुन्नत जानते थे, तो वह उसके साथ फैसला करते थे, लेकिन अगर उन्हें यह नहीं मिलती, तो वह तुरंत बाहर जाते हैं और मुसलमानों से पूछते हैं, फिर कहते हैं: 'मुझे यह और यह समस्या है, क्या आप कभी जानते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार इस मामले पर कानूनी फैसले के साथ फैसला किया था?, आमतौर पर कई लोगों के इकट्ठा होने के बाद, उनमें से प्रत्येक रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का एक कानूनी फैसला बताता है वसल्लम, आम तौर पर अबू बकर (अल्लाह उन पर खुश हों) ने कहा: 'तारीफ़ अल्लाह की है जिसने हमारे लोगों को पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत याद करने लायक बनाया। अगर उन्हें यह पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत में नहीं मिलता था, तो वह सलाह के लिए अपने साथियों में से बड़े लोगों और चुने हुए लोगों को इकट्ठा करते थे, अगर वे सहमत होते थे तो उस एकमत फैसले के आधार पर वह एक कानूनी फैसला देते थे।'
इमाम दरिमी : 162
أَخْبَرَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ مُوسَى وَعَمْرُو بْنُ زُرَارَةَ عَنْ عَبْدِ الْعَزِيزِ بْنِ مُحَمَّدٍ عَنْ أَبِي سُهَيْلٍ قَالَ كَانَ عَلَى امْرَأَتِي اعْتِكَافُ ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ فِي الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ فَسَأَلْتُ عُمَرَ بْنَ عَبْدِ الْعَزِيزِ وَعِنْدَهُ ابْنُ شِهَابٍ قَالَ قُلْتُ عَلَيْهَا صِيَامٌ قَالَ ابْنُ شِهَابٍ لَا يَكُونُ اعْتِكَافٌ إِلَّا بِصِيَامٍ فَقَالَ لَهُ عُمَرُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ أَعَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ لَا قَالَ فَعَنْ أَبِي بَكْرٍ قَالَ لَا قَالَ فَعَنْ عُمَرَ قَالَ لَا قَالَ فَعَنْ عُثْمَانَ قَالَ لَا قَالَ عُمَرُ مَا أَرَى عَلَيْهَا صِيَامًا فَخَرَجْتُ فَوَجَدْتُ طَاوُسًا وَعَطَاءَ بْنَ أَبِي رَبَاحٍ فَسَأَلْتُهُمَا فَقَالَ طَاوُسٌ كَانَ ابْنُ عَبَّاسٍ لَا يَرَى عَلَيْهَا صِيَامًا إِلَّا أَنْ تَجْعَلَهُ عَلَى نَفْسِهَا قَالَ وَقَالَ عَطَاءٌ ذَلِكَ رَأْيِي
हमें [इब्राहिम बिन मूसा] और [अमरू बिन ज़ुरारा] को [अब्दुल अज़ीज़ बिन मुहम्मद] ने [अबू सुहैल] से बताया कि; "पहले, मेरी पत्नी ने ग्रैंड मस्जिद में तीन दिन तक एतिकाफ़ करने की मन्नत मानी थी। फिर, मैंने उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहिअल्लाहु से पूछा जो उस समय सैय्यब के साथ थे। मैंने पूछा: 'क्या वह भी रोज़ा रखने के लिए मजबूर है?' 'अलीही वसल्लम?' उन्होंने जवाब दिया: 'नहीं'। फिर, उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहिअल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा: 'क्या अबू बक्र रदलिअल्लाहु अन्हु से कोई जानकारी है? रहिमहुल्लाह ने कहा: 'मुझे नहीं लगता कि औरत के लिए रोज़ा रखना ज़रूरी है', फिर मैं बाहर गया और थौस और अथो बिन अबू रब्बा से मिला, मैंने उन दोनों से पूछा। [थौस] ने जवाब दिया: 'पहले [इब्न अब्बास] अल्लाह उन पर खुश हो (ने फतवा दिया था) कि एक औरत पर रोज़ा रखना ज़रूरी नहीं है, जब तक कि वह रोज़ा रखने की कसम न खा ले'। फिर अथा ने कहा: 'मेरी भी यही राय है'।
इमाम दरिमी : 163
حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ حَدَّثَنَا أَبُو عَقِيلٍ حَدَّثَنَا سَعِيدٌ الْجُرَيْرِيُّ عَنْ أَبِي نَضْرَةَ قَالَ لَمَّا قَدِمَ أَبُو سَلَمَةَ الْبَصْرَةَ أَتَيْتُهُ أَنَا وَالْحَسَنُ فَقَالَ لِلْحَسَنِ أَنْتَ الْحَسَنُ مَا كَانَ أَحَدٌ بِالْبَصْرَةِ أَحَبَّ إِلَيَّ لِقَاءً مِنْكَ وَذَلِكَ أَنَّهُ بَلَغَنِي أَنَّكَ تُفْتِي بِرَأْيِكَ فَلَا تُفْتِ بِرَأْيِكَ إِلَّا أَنْ تَكُونَ سُنَّةٌ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَوْ كِتَابٌ مُنْزَلٌ
हमें बताया है [मुस्लिम बिन इब्राहिम] ने हमें बताया है [अबू अकील] ने हमें बताया है [सईद अल जुरैरी] ने [अबू नदलरा] से कहा है कि: "जब [अबू सलामा] बसरा शहर में आया, मैं और अल हसन उससे मिले, फिर उसने अल हसन से कहा: 'क्या तुम अल हसन हो? "अपनी राय को फतवा न दें, जब तक कि यह पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत पर आधारित न हो, या उस किताब से जो प्रकट हुई है (कुरान)।"
इमाम दरिमी : 164
أَخْبَرَنَا عِصْمَةُ بْنُ الْفَضْلِ حَدَّثَنَا زَيْدُ بْنُ الْحُبَابِ عَنْ يَزِيدَ بْنِ عُقْبَةَ حَدَّثَنَا الضَّحَّاكُ عَنْ جَابِرِ بْنِ زَيْدٍ أَنَّ ابْنَ عُمَرَ لَقِيَهُ فِي الطَّوَافِ فَقَالَ لَهُ يَا أَبَا الشَّعْثَاءِ إِنَّكَ مِنْ فُقَهَاءِ الْبَصْرَةِ فَلَا تُفْتِ إِلَّا بِقُرْآنٍ نَاطِقٍ أَوْ سُنَّةٍ مَاضِيَةٍ فَإِنَّكَ إِنْ فَعَلْتَ غَيْرَ ذَلِكَ هَلَكْتَ وَأَهْلَكْتَ
हमसे कहा है ['इश्मा बिन अल फदलल] ने हमसे कहा है [ज़ैद बिन अल हुबाब] ने [यज़ीद बिन उक़बा] से, हमसे कहा है [अल दलहक] ने [जाबिर बिन ज़ैद] से: [इब्न उमर] उनसे तवाफ़ करते हुए मिले, फिर उन्होंने (इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हु) उनसे कहा: 'ऐ अबू शत्सा, तुम शहर बसरा के फ़क़वालों में से एक हो, तो फ़तवा न दो जब तक कि वह क़ुरआन और सुन्नत पर आधारित न हो, क्योंकि अगर तुम ऐसा नहीं करोगे तो बेशक तुम्हें नुकसान होगा और तुम दूसरे लोगों को भी नुकसान पहुँचाओगे।'
इमाम दरिमी : 165
أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يُوسُفَ عَنْ سُفْيَانَ عَنْ الْأَعْمَشِ عَنْ عُمَارَةَ بْنِ عُمَيْرٍ عَنْ حُرَيْثِ بْنِ ظُهَيْرٍ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ قَالَ أَتَى عَلَيْنَا زَمَانٌ لَسْنَا نَقْضِي وَلَسْنَا هُنَالِكَ وَإِنَّ اللَّهَ قَدْ قَدَّرَ مِنْ الْأَمْرِ أَنْ قَدْ بَلَغْنَا مَا تَرَوْنَ فَمَنْ عَرَضَ لَهُ قَضَاءٌ بَعْدَ الْيَوْمِ فَلْيَقْضِ فِيهِ بِمَا فِي كِتَابِ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ فَإِنْ جَاءَهُ مَا لَيْسَ فِي كِتَابِ اللَّهِ فَلْيَقْضِ بِمَا قَضَى بِهِ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَإِنْ جَاءَهُ مَا لَيْسَ فِي كِتَابِ اللَّهِ وَلَمْ يَقْضِ بِهِ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَلْيَقْضِ بِمَا قَضَى بِهِ الصَّالِحُونَ وَلَا يَقُلْ إِنِّي أَخَافُ وَإِنِّي أُرَى فَإِنَّ الْحَرَامَ بَيِّنٌ وَالْحَلَالَ بَيِّنٌ وَبَيْنَ ذَلِكَ أُمُورٌ مُشْتَبِهَةٌ فَدَعْ مَا يَرِيبُكَ إِلَى مَا لَا يَرِيبُكَ
हमें [मुहम्मद बिन यूसुफ] ने [सुफियान] से [अल अमासी] से [उमरह बिन उमैर] से [हुरैत्स बिन ज़ुहैर] से [अब्दुल्ला बिन मसऊद] से वर्णित किया है कि उन्होंने कहा: "हमारे पास एक समय आएगा, हम वे नहीं हैं जो निर्णय लेते हैं और हम उस समय वहां नहीं थे, और वास्तव में अल्लाह ने कुछ ऐसा पहले से निर्धारित कर दिया है जिसे आपने नहीं देखा है (अभी तक नहीं हुआ है)। इसलिए जिस किसी को इस दिन के बाद कोई समस्या हो, तो उसे अल्लाह की किताब सुभानल्लाहु व तआला के अनुसार निर्णय लेना चाहिए, अगर समस्या कुरान में नहीं है, तो उसे पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के निर्णय के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। लेकिन अगर कोई समस्या उसके पास आती है जो कुरान और पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के निर्णय में नहीं है, तो उसे पवित्र लोगों के निर्णय के अनुसार निर्णय लेना चाहिए, और यह न कहें: 'मुझे डर है', या कहें: राय'। असल में, जो हराम है वह साफ़ है और जो हलाल है वह साफ़ है और इन दोनों चीज़ों के बीच ऐसी चीज़ें हैं जो मुतस्याबिह (अस्पष्ट) हैं। इसलिए जिस पर आपको शक हो उसे छोड़ दें और उस चीज़ को मज़बूती से पकड़ें जिस पर आपको कोई शक न हो।"
इमाम दरिमी : 166
أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا ابْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي يَزِيدَ قَالَ كَانَ ابْنُ عَبَّاسٍ إِذَا سُئِلَ عَنْ الْأَمْرِ فَكَانَ فِي الْقُرْآنِ أَخْبَرَ بِهِ وَإِنْ لَمْ يَكُنْ فِي الْقُرْآنِ وَكَانَ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخْبَرَ بِهِ فَإِنْ لَمْ يَكُنْ فَعَنْ أَبِي بَكْرٍ وَعُمَرَ فَإِنْ لَمْ يَكُنْ قَالَ فِيهِ بِرَأْيِهِ
हमें [अब्दुल्ला बिन मुहम्मद] ने [इब्न उयैना] से [उबैदुल्ला बिन अबू यज़ीद] से बताया है कि उन्होंने कहा: "पहले [इब्न अब्बास] (अल्लाह उन पर प्रसन्न हो) से, अगर उनसे किसी चीज़ के बारे में पूछा जाता था और वह कुरान में होती थी, तो वह उसे बताते थे। अगर वह कुरान में नहीं होती थी, तो वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से स्पष्टीकरण देते थे। अगर वह सुन्नत में नहीं होती थी, तो वह अबू बक्र और उमर (अल्लाह उन पर प्रसन्न हो) से स्पष्टीकरण देते थे, लेकिन अगर उनमें से किसी से कोई स्पष्टीकरण नहीं होता था, तो वह अपनी राय से फैसला करते थे।"
इमाम दरिमी : 167
أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عُيَيْنَةَ عَنْ عَلِيِّ بْنِ مُسْهِرٍ عَنْ أَبِي إِسْحَقَ عَنْ الشَّعْبِيِّ عَنْ شُرَيْحٍ أَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ كَتَبَ إِلَيْهِ إِنْ جَاءَكَ شَيْءٌ فِي كِتَابِ اللَّهِ فَاقْضِ بِهِ وَلَا تَلْفِتْكَ عَنْهُ الرِّجَالُ فَإِنْ جَاءَكَ مَا لَيْسَ فِي كِتَابِ اللَّهِ فَانْظُرْ سُنَّةَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَاقْضِ بِهَا فَإِنْ جَاءَكَ مَا لَيْسَ فِي كِتَابِ اللَّهِ وَلَمْ يَكُنْ فِيهِ سُنَّةٌ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَانْظُرْ مَا اجْتَمَعَ عَلَيْهِ النَّاسُ فَخُذْ بِهِ فَإِنْ جَاءَكَ مَا لَيْسَ فِي كِتَابِ اللَّهِ وَلَمْ يَكُنْ فِي سُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَلَمْ يَتَكَلَّمْ فِيهِ أَحَدٌ قَبْلَكَ فَاخْتَرْ أَيَّ الْأَمْرَيْنِ شِئْتَ إِنْ شِئْتَ أَنْ تَجْتَهِدَ رَأْيَكَ ثُمَّ تَقَدَّمَ فَتَقَدَّمْ وَإِنْ شِئْتَ أَنْ تَأَخَّرَ فَتَأَخَّرْ وَلَا أَرَى التَّأَخُّرَ إِلَّا خَيْرًا لَكَ
हमें [मुहम्मद बिन उयैना] ने [अली बिन मुशीर] से [अबू इसहाक] से [अस शाबी] से [स्यूरैह] तक बताया है: "[उमर बिन खत्ताब] रदिअल्लाहु अन्हु ने एक बार उन्हें एक पत्र लिखा,: 'यदि कोई समस्या आपके पास आती है और यह अल्लाह सुभानल्लाहु व ताआला की किताब में है, तो इसके साथ फैसला करें, और ज्यादातर लोगों की राय पर न जाएं, और यदि कोई समस्या आपके पास आती है और आप इसे कुरान में नहीं पाते हैं, तो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत को देखें, और उसके अनुसार फैसला करें। और यदि कोई समस्या आपके पास आती है जो कुरान और पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत में नहीं है, तो लोगों (उलेमा) के इज्मा को देखें, और यदि कोई समस्या आपके पास आती है जो आपको कुरान में नहीं मिलती है, तो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत अलैहि वसल्लम, और आपसे पहले किसी ने कुछ नहीं कहा। तो, दो चीज़ों में से चुन लो: अगर तुम अपनी राय से इज्तिहाद करना चाहते हो, तो फैसला करो; और अगर तुम देर करना चाहते हो, तो देर करो। और मुझे कोई देरी नहीं दिखती सिवाय इसके कि यह तुम्हारे लिए बेहतर हो।
इमाम दरिमी : 168
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَمَّادٍ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ الثَّقَفِيِّ عَنْ عَمْرِو بْنِ الْحَارِثِ ابْنِ أَخِي الْمُغِيرَةِ بْنِ شُعْبَةَ عَنْ نَاسٍ مِنْ أَهْلِ حِمْصٍ مِنْ أَصْحَابِ مُعَاذٍ عَنْ مُعَاذٍ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَمَّا بَعَثَهُ إِلَى الْيَمَنِ قَالَ أَرَأَيْتَ إِنْ عَرَضَ لَكَ قَضَاءٌ كَيْفَ تَقْضِي قَالَ أَقْضِي بِكِتَابِ اللَّهِ قَالَ فَإِنْ لَمْ يَكُنْ فِي كِتَابِ اللَّهِ قَالَ فَبِسُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ فَإِنْ لَمْ يَكُنْ فِي سُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ قَالَ أَجْتَهِدُ رَأْيِي وَلَا آلُو قَالَ فَضَرَبَ صَدْرَهُ ثُمَّ قَالَ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي وَفَّقَ رَسُولَ رَسُولِ اللَّهِ لِمَا يُرْضِي رَسُولَ اللَّهِ
हमें [याह्या बिन हम्माद] ने [स्यूबा] को [मुहम्मद बिन उबैदिल्लाह अल त्सकाफी] से [अम्र बिन अल हारिथ] -अल मुगीरा बिन स्यूबा के चचेरे भाई- से, [हिमश के लोगों में से मुअज़्ज़ के कुछ दोस्तों] से, [मुअज़्ज़] से बताया है; कि जब पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें यमन देश भेजा, तो उन्होंने कहा: 'अगर आपके सामने कोई समस्या पेश की जाए, तो आप उसका फैसला कैसे करेंगे?', उन्होंने जवाब दिया: 'मैंने अल्लाह सुब्हानल्लाह व तआला की किताब से फैसला किया', उन्होंने पूछा: 'तो क्या हुआ अगर यह अल्लाह सुब्हानल्लाह व तआला की किताब में नहीं है? ', उन्होंने जवाब दिया: 'मैंने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के साथ फैसला किया', उन्होंने पूछा: 'क्या होगा अगर यह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत में नहीं है?', उन्होंने जवाब दिया: 'मैं अपनी राय से इज्तिहाद करूंगा और इससे ज़्यादा कुछ नहीं'। उन्होंने कहा: 'उस समय उन्होंने अपनी छाती थपथपाई, फिर कहा: 'अल्लाह की तारीफ़ हो जिसने अपने रसूल के रसूल को उस चीज़ से तौफीक दिया जो उनके रसूल को पसंद थी'।
इमाम दरिमी : 169
أَخْبَرَنَا يَحْيَى بْنُ حَمَّادٍ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ عَنْ سُلَيْمَانَ عَنْ عُمَارَةَ بْنِ عُمَيْرٍ عَنْ حُرَيْثِ بْنِ ظُهَيْرٍ قَالَ أَحْسَبُهُ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ قَالَ قَدْ أَتَى عَلَيْنَا زَمَانٌ وَمَا نُسْأَلُ وَمَا نَحْنُ هُنَاكَ وَإِنَّ اللَّهَ قَدَّرَ أَنْ بَلَغْتُ مَا تَرَوْنَ فَإِذَا سُئِلْتُمْ عَنْ شَيْءٍ فَانْظُرُوا فِي كِتَابِ اللَّهِ فَإِنْ لَمْ تَجِدُوهُ فِي كِتَابِ اللَّهِ فَفِي سُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ فَإِنْ لَمْ تَجِدُوهُ فِي سُنَّةِ رَسُولِ اللَّهِ فَمَا أَجْمَعَ عَلَيْهِ الْمُسْلِمُونَ فَإِنْ لَمْ يَكُنْ فِيمَا أَجْمَعَ عَلَيْهِ الْمُسْلِمُونَ فَاجْتَهِدْ رَأْيَكَ وَلَا تَقُلْ إِنِّي أَخَافُ وَأَخْشَى فَإِنَّ الْحَلَالَ بَيِّنٌ وَالْحَرَامَ بَيِّنٌ وَبَيْنَ ذَلِكَ أُمُورٌ مُشْتَبِهَةٌ فَدَعْ مَا يَرِيبُكَ إِلَى مَا لَا يَرِيبُكَ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ حَمَّادٍ عَنْ أَبِي عَوَانَةَ عَنْ سُلَيْمَانَ عَنْ عُمَارَةَ بْنِ عُمَيْرٍ عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ يَزِيدَ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ نَحْوَهُ أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا جَرِيرٌ عَنْ الْأَعْمَشِ عَنْ الْقَاسِمِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بِنَحْوِهِ
हमें बताया है [याह्या बिन हम्माद] ने हमें बताया है [स्यूबा] ने [सुलेमान] से [उमरह बिन उमैर] से [हुरैतस बिन ज़ुहैर] से उन्होंने कहा: "मुझे यकीन है, [अब्दुल्ला] ने एक बार कहा था: 'सच में हमारे पास एक ऐसा दौर आ गया है जिसके बारे में हमसे कभी पूछा नहीं गया, और हमने कभी उसका अनुभव नहीं किया। और अल्लाह ने आदेश दिया है कि मैं बताता हूँ कि तुम्हें कैसे देखना चाहिए। देखो, अगर तुमसे कुछ पूछा जाता है, तो अल्लाह की किताब में देखो, लेकिन अगर तुम्हें वह अल्लाह की किताब में नहीं मिलता है तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत में देखो, फिर अगर तुम्हें वह सुन्नत में नहीं मिलता है, तो मुसलमानों द्वारा सहमत की गई बातों का उपयोग करो, और अगर तुम्हें वह इज्मा में नहीं मिलता है', तो अपनी राय के साथ इज्तिहाद करो, और यह मत कहो: 'मैं वास्तव में डरता हूँ क्योंकि हलाल चीजें स्पष्ट हैं और हराम बातें स्पष्ट हैं, और उनके बीच की जो भी चीज़ है वह अस्पष्ट है, तो जिस पर तुम्हें संदेह है उसे छोड़ दो उसके लिए जिस पर तुम्हें कोई संदेह नहीं है। [याह्या बिन हम्माद] ने हमें [अबू अवाना] से [सुलेमान] से [उमरह बिन उमैर] से [अब्दुर रहमान बिन यज़ीद] से [अब्दुल्ला] से वर्णित किया है और इसी प्रकार शब्द भी हैं। [अब्दुल्ला बिन मुहम्मद] ने हमें [अल अमाश] से [अल कासिम बिन अब्दुर रहमान] से [अपने पिता] से [अब्दुल्ला] से वर्णित किया है और इसी प्रकार शब्द भी हैं।
इमाम दरिमी : 170
حَدَّثَنَا هَارُونُ بْنُ مُعَاوِيَةَ عَنْ حَفْصِ بْنِ غِيَاثٍ حَدَّثَنَا الْأَعْمَشُ قَالَ قَالَ عَبْدُ اللَّهِ أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّكُمْ سَتُحْدِثُونَ وَيُحْدَثُ لَكُمْ فَإِذَا رَأَيْتُمْ مُحْدَثَةً فَعَلَيْكُمْ بِالْأَمْرِ الْأَوَّلِ قَالَ حَفْصٌ كُنْتُ أُسْنِدُ عَنْ حَبِيبٍ عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ ثُمَّ دَخَلَنِي مِنْهُ شَكٌّ
हारुन बिन मुअविया ने हमें हफ़्श बिन ग़ियात्स से बताया है, अल अमासी ने कहा: अब्दुल्ला ने कहा: 'ऐ लोगों, तुम नई चीज़ें बनाओगे, और ऐसे लोग हैं जो तुम्हारे लिए नई चीज़ें बनाते हैं, इसलिए अगर तुम (धर्म में) कुछ नया देखते हो, तो तुम्हें पिछली पीढ़ी की किसी चीज़ को पकड़ लेना चाहिए।' हफ़्श ने कहा: "मैंने हबीब से अबू अब्दुर रहमान से रिवायत की, फिर उसके बाद मुझे शक हुआ।"
इमाम दरिमी : 171
أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّلْتِ حَدَّثَنَا ابْنُ الْمُبَارَكِ عَنْ ابْنِ عَوْنٍ عَنْ مُحَمَّدٍ قَالَ قَالَ عُمَرُ لِأَبِي مَسْعُودٍ أَلَمْ أُنْبَأْ أَوْ أُنْبِئْتُ أَنَّكَ تُفْتِي وَلَسْتَ بِأَمِيرٍ وَلِّ حَارَّهَا مَنْ تَوَلَّى قَارَّهَا
हमें बताया है [मुहम्मद बिन अस शाल्ट] ने हमें [इब्न 'औन] से [मुहम्मद] से बताया है उन्होंने कहा: "[उमर] रदलिल्लाहु अन्हु ने इब्न मसऊद रदलिल्लाहु अन्हु से कहा: 'क्या मैंने नहीं बताया या मुझे नहीं बताया गया - कथावाचक संपादक के बताने या बताए जाने की निश्चितता पर संदेह करता है - कि आपने एक फतवा दिया, हालांकि आप (उस समय) एक नेता नहीं थे?, हेह,,, उन लोगों को बुराई का जोखिम दें जिन्होंने इसकी मिठास का आनंद लिया है।
इमाम दरिमी : 172
أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يُوسُفَ عَنْ سُفْيَانَ عَنْ الْأَعْمَشِ عَنْ أَبِي وَائِلٍ عَنْ ابْنِ مَسْعُودٍ قَالَ إِنَّ الَّذِي يُفْتِي النَّاسَ فِي كُلِّ مَا يُسْتَفْتَى لَمَجْنُونٌ
हमें [मुहम्मद बिन यूसुफ] ने [सुफयान] से [अल अमासी] से [अबू वाइल] से [इब्न मसऊद] से वर्णित किया है कि उन्होंने कहा: "जो व्यक्ति हर समस्या में हमेशा फतवा देता है (उससे) वह पागल है।"
इमाम दरिमी : 173
أَخْبَرَنَا سَعِيدُ بْنُ عَامِرٍ عَنْ هِشَامٍ عَنْ مُحَمَّدٍ عَنْ حُذَيْفَةَ قَالَ إِنَّمَا يُفْتِي النَّاسَ ثَلَاثَةٌ رَجُلٌ إِمَامٌ أَوْ وَالٍ وَرَجُلٌ يَعْلَمُ نَاسِخَ الْقُرْآنِ مِنْ الْمَنْسُوخِ قَالُوا يَا حُذَيْفَةُ وَمَنْ ذَاكَ قَالَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ أَوْ أَحْمَقُ مُتَكَلِّفٌ
हमें [सैयद बिन आमिर] ने [हिशाम] से [मुहम्मद] से [हुदज़ैफ़ा] तक बताया है, उन्होंने कहा: "फतवा देने वाले लोगों के तीन ग्रुप हैं: एक इमाम, या एक वफ़ादार (जो मुसलमानों के मामलों को कंट्रोल करता है) या कोई जो कुरान में नासिख और मनसुख को जानता है, वे पूछते हैं: 'ऐ हुदज़ैफ़ा, तो वह कौन है?', वह उमर बिन खत्ताब रदिअल्लाहु अन्हु है, या एक खुद को बेवकूफ़ बनाने वाला'"।
इमाम दरिमी : 174
أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَعِيدٍ أَخْبَرَنَا أَبُو أُسَامَةَ عَنْ هِشَامِ بْنِ حَسَّانَ عَنْ مُحَمَّدٍ عَنْ أَبِي عُبَيْدَةَ بْنِ حُذَيْفَةَ قَالَ قَالَ حُذَيْفَةُ إِنَّمَا يُفْتِي النَّاسَ أَحَدُ ثَلَاثَةٍ رَجُلٌ عَلِمَ نَاسِخَ الْقُرْآنِ مِنْ مَنْسُوخِهِ قَالُوا وَمَنْ ذَاكَ قَالَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ قَالَ وَأَمِيرٌ لَا يَجِدُ بُدًّا أَوْ أَحْمَقُ مُتَكَلِّفٌ ثُمَّ قَالَ مُحَمَّدٌ فَلَسْتُ بِوَاحِدٍ مِنْ هَذَيْنِ وَأَرْجُو أَنْ لَا أَكُونَ الثَّالِثَ
हमें [अब्दुल्ला बिन सईद] ने [अबू उसामा] को [हिस्याम बिन हसन] से [मुहम्मद] से [अबू उबैदा बिन हुदज़ैफ़ा] से बताया है कि उन्होंने कहा: "[हुदज़ैफ़ा] ने कहा: 'जो व्यक्ति दूसरों को फतवा देता है वह तीन समूहों में से एक है: वह जो कुरान में नासिख और मनसुख को जानता है', उन्होंने पूछा: 'वह कौन है?', "उमर बिन खत्ताब, अल्लाह उनसे खुश हो, ने आगे कहा: 'या एक नेता जो डरता नहीं है, या एक मूर्ख जो खुद को मजबूर करता है'।" तब मुहम्मद ने कहा: "मैं दो मानदंडों (पहले) में से एक नहीं हूं और मुझे उम्मीद है कि मैं तीसरे का हिस्सा नहीं बनूंगा।"
इमाम दरिमी : 175
أَخْبَرَنَا جَعْفَرُ بْنُ عَوْنٍ عَنْ الْأَعْمَشِ عَنْ مُسْلِمٍ عَنْ مَسْرُوقٍ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ قَالَ مَنْ عَلِمَ مِنْكُمْ عِلْمًا فَلْيَقُلْ بِهِ وَمَنْ لَمْ يَعْلَمْ فَلْيَقُلْ لِمَا لَا يَعْلَمُ اللَّهُ أَعْلَمُ فَإِنَّ الْعَالِمَ إِذَا سُئِلَ عَمَّا لَا يَعْلَمُ قَالَ اللَّهُ أَعْلَمُ وَقَدْ قَالَ اللَّهُ لِرَسُولِهِ { قُلْ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ وَمَا أَنَا مِنْ الْمُتَكَلِّفِينَ }
हमें [जाफर बिन औन] ने [अल अमासी] से [मुस्लिम] से [मसरूक] से [अब्दुल्ला] से बताया है कि उन्होंने कहा: "तुममें से जिसे कुछ ज्ञान हो, वह उसे कहे, और जिसे ज्ञान न हो, वह उन मामलों में कहे जिनके बारे में वह नहीं जानता: 'अल्लाहु अलम' (अल्लाह सबसे अच्छा जानता है), क्योंकि विद्वान वह है, जिससे अगर किसी ऐसी चीज़ के बारे में पूछा जाए जिसके बारे में वह नहीं जानता, तो वह कहेगा: 'अल्लाहु अलम' और वास्तव में अल्लाह ने अपने रसूल से कहा है: "क़ुल माआ असालुकुम `'लैही मिन ``अजरीन वा माआ अना मिनल मुतकल्लिफ़िन" (कहो, हे मुहम्मद: 'मैं अपने उपदेश के लिए आपसे कोई इनाम नहीं मांगता, और मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो खुद को मजबूर करते हैं') -Qs: 86-".
इमाम दरिमी : 176
أَخْبَرَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ حَدَّثَنَا حُمَيْدٌ عَنْ أَبِي رَجَاءٍ عَنْ أَبِي الْمُهَلَّبِ أَنَّ أَبَا مُوسَى قَالَ فِي خُطْبَتِهِ مَنْ عَلِمَ عِلْمًا فَلْيُعَلِّمْهُ النَّاسَ وَإِيَّاهُ أَنْ يَقُولَ مَا لَا عِلْمَ لَهُ بِهِ فَيَمْرُقَ مِنْ الدِّينِ وَيَكُونَ مِنْ الْمُتَكَلِّفِينَ
यज़ीद बिन हारून ने हमें बताया है कि हुमैद ने अबू रजा से अबू अल-मुहल्लब तक यह रिवायत बयान की है: "अबू मूसा ने अपने खुतबे में कहा: जो कोई इल्म जानता हो, उसे लोगों को सिखाना चाहिए और ऐसे इंसान से बचो जो कुछ ऐसा कहे जिसके बारे में उसे इल्म न हो, वह दीन से भटक जाएगा और ज़बरदस्ती करने वालों में से बन जाएगा।"
इमाम दरिमी : 177
أَخْبَرَنَا عَمْرُو بْنُ عَوْنٍ عَنْ خَالِدِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ عَنْ عَطَاءِ بْنِ السَّائِبِ عَنْ أَبِي الْبَخْتَرِيِّ وَزَاذَانَ قَالَا قَالَ عَلِيٌّ وَا بَرْدَهَا عَلَى الْكَبِدِ إِذَا سُئِلْتُ عَمَّا لَا أَعْلَمُ أَنْ أَقُولَ اللَّهُ أَعْلَمُ
['अम्र बिन 'औन] ने हमें [खालिद बिन अब्दुल्लाह] से ['अथो` बिन आस सईद] से [अबू अल बख्तरी] और [ज़ादज़ान] से वर्णित किया है दोनों ने कहा: "['अली] ने कहा: 'यह दिल कितना ठंडा है, अगर मुझसे किसी ऐसी चीज के बारे में पूछा जाता है जिसे मैं नहीं जानता, तो मैं कहता हूं: अल्लाहु अ'लम'"।
इमाम दरिमी : 178
أَخْبَرَنَا أَبُو نُعَيْمٍ حَدَّثَنَا شَرِيكٌ عَنْ عَطَاءِ بْنِ السَّائِبِ عَنْ أَبِي الْبَخْتَرِيِّ عَنْ عَلِيٍّ قَالَ يَا بَرْدَهَا عَلَى الْكَبِدِ أَنْ تَقُولَ لِمَا لَا تَعْلَمُ اللَّهُ أَعْلَمُ
हमें बताया है [अबू नुआईम] ने हमें बताया है [शरीक] [अथो` बिन अस सईद] से [अबू अल बख्तरी] से [अली] से उन्होंने कहा: "ओह इस दिल की ठंडक, जब आप उन चीज़ों में कहते हैं जिन्हें आप नहीं जानते: 'अल्लाहु अ'लम'"।
इमाम दरिमी : 179
أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يُوسُفَ حَدَّثَنَا عُمَيْرُ بْنُ عَرْفَجَةَ حَدَّثَنَا رَزِينٌ أَبُو النُّعْمَانِ عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ قَالَ إِذَا سُئِلْتُمْ عَمَّا لَا تَعْلَمُونَ فَاهْرُبُوا قَالُوا وَكَيْفَ الْهَرَبُ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ قَالَ تَقُولُونَ اللَّهُ أَعْلَمُ
हमें बताया है [मुहम्मद बिन यूसुफ] ने हमें बताया है ['उमैर बिन' अरफजाह] ने हमें बताया है [रज़ीन अबू अन नुमान] ['अली बिन अबू तालिब] रदलिल्लाहु अन्हु ने कहा: "जब आपसे किसी ऐसी चीज़ के बारे में पूछा जाए जिसे आप नहीं जानते, तो उससे बचें"। उन्होंने पूछा: 'आप इससे कैसे बच सकते हैं, हे अमीरुल मोमिनीन?', उन्होंने उत्तर दिया: 'आपके यह कहने से: अल्लाहु अ'लम'।
इमाम दरिमी : 180
أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ حُمَيْدٍ حَدَّثَنَا جَرِيرٌ عَنْ مَنْصُورٍ عَنْ مُسْلِمٍ الْبَطِينِ عَنْ عَزْرَةَ التَّمِيمِيِّ قَالَ قَالَ عَلِيٌّ وَا بَرْدَهَا عَلَى الْكَبِدِ ثَلَاثَ مَرَّاتٍ قَالُوا وَمَا ذَلِكَ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ قَالَ أَنْ يُسْأَلَ الرَّجُلُ عَمَّا لَا يَعْلَمُ فَيَقُولُ اللَّهُ أَعْلَمُ
हमें बताया है [मुहम्मद बिन हुमैद] ने हमें बताया है [जरीर] [मंसूर] से [मुस्लिम अल बतीन] से ['अज़राह अत तमिम] से उन्होंने कहा: "[अली] रदलिल्लाहु अन्हु ने कहा: 'यह दिल कितना ठंडा है', --उन्होंने अपने शब्दों को तीन बार दोहराया--, उन्होंने पूछा: 'यह क्या है, हे अमीरुल मोमिनीन?', उन्होंने उत्तर दिया: '(जब) किसी व्यक्ति से किसी ऐसी चीज़ के बारे में पूछा जाता है जिसे वह नहीं जानता तो वह कहता है: अल्लाहु अ'लम'"।