Imam Ahmad : 26334
حَدَّثَنَا أَبُو عَامِرٍ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ يَعْنِي ابْنَ أَبِي الْمَوَالِي عَنْ أَيُّوبَ بْنِ حَسَنِ بْنِ عَلِيِّ بْنِ أَبِي رَافِعٍ عَنْ جَدَّتِهِ سَلْمَى خَادِمِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَتْ مَا سَمِعْتُ أَحَدًا قَطُّ يَشْكُو إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَجَعًا فِي رَأْسِهِ إِلَّا قَالَ احْتَجِمْ وَلَا وَجَعًا فِي رِجْلَيْهِ إِلَّا قَالَ اخْضِبْهُمَا بِالْحِنَّاءِ
हमसे कहिन है [अबू अमीर] हमसे कहिन है [अब्दुर्रहमान] - अर्थात् इब्न अबू अल मावली - [अय्यूब बिन हसन बिन अली बिन अबू रफी'] से अपनी दादी [सलमा] से रसूलुल्लाह सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम के नौकर, उ कहिन, 'मैंने कभी केहू का रसूलुल्लाह सल्लल्लाह अलैह अलैह के बारे मा शिकायत नाहीं सुना वसल्लम, जब तक कि ऊ ओसे कप करै का नाहीं कहिस, अऊर दुइनौ गोड़न मा दर्द नाहीं रहा जब तक कि ऊ दुइनौ गोड़न का मेहंदी के पत्तन से रंगै का नाहीं कहिस।