Larangan menumpahkan darah di tanah haram, memotong tumbuhan ataupun memburu hewan
Imam Ahmad : 25907
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ قَالَ حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي ذِئْبٍ قَالَ حَدَّثَنَا سَعِيدٌ يَعْنِي الْمَقْبُرِيَّ قَالَ سَمِعْتُ أَبَا شُرَيْحٍ الْكَعْبِيَّ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَوْمَ فَتْحِ مَكَّةَ إِنَّ اللَّهَ عَزَّ وَجَلَّ حَرَّمَ مَكَّةَ وَلَمْ يُحَرِّمْهَا النَّاسُ فَمَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَلَا يَسْفِكَنَّ فِيهَا دَمًا وَلَا يَعْضِدَنَّ فِيهَا شَجَرًا فَإِنْ تَرَخَّصَ مُتَرَخِّصٌ فَقَالَ أُحِلَّتْ لِرَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَإِنَّ اللَّهَ أَحَلَّهَا لِي وَلَمْ يُحِلَّهَا لِلنَّاسِ وَهِيَ سَاعَتِي هَذِهِ حَرَامٌ إِلَى أَنْ تَقُومَ السَّاعَةُ إِنَّكُمْ مَعْشَرَ خُزَاعَةَ قَتَلْتُمْ هَذَا الْقَتِيلَ وَإِنِّي عَاقِلُهُ فَمَنْ قُتِلَ لَهُ قَتِيلٌ بَعْدَ مَقَالَتِي هَذِهِ فَأَهْلُهُ بَيْنَ خِيرَتَيْنِ إِمَّا أَنْ يَقْتُلُوا أَوْ يَأْخُذُوا الْعَقْلَ
हमसे कहिस है [यह्या बिन सईद] कहिन, हमसे कहिन है [इब्न अबू दज़ीब] कहिन, हमसे कहिन है [कहा] - अर्थात् अल मकबरी ने कहा, हमने [अबू सूरैह अल काबी] का कहना सुना है, 'रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का शहर के विजय के समय कहा: मक्का अऊर मानव जाति ने ईका मना नाहीं किहिन है, तौ जे अल्लाह अऊर आखिरी दिन मा विश्वास करत है, ओका ओमा खून न बहावै का चाही, अऊर ओमा पेड़ न काटै का चाही, इहाँ तक कि तिरस्कार करै वाले लोगन से भी। अबू सूरैह ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए इसे हलाल किया गया है। 'सचमुच अल्लाह ने मेरे लिए हलल किया है और किसी और के लिए भी हलाल नहीं किया है, अब से क़यामत तक हराम है।' बेशक, तुम हे बानी खुज़ाह, ई व्यक्ति का मार डारे हौ, अऊर बेशक मैं ही ओकरे मृत्यु का प्रायश्चित किहे हौं, तौ जे मोर बात के बाद केहू का मारत है, तौ ओकरे परिवार का दुइ विकल्पन मा से एक का चुनै का अधिकार है; ओका मारौ या ओकर दियात लइ जा'।