Imam Ahmad : 18136
حَدَّثَنَا صَفْوَانُ بْنُ عِيسَى أَخْبَرَنَا ابْنُ عَجْلَانَ عَنْ سَعِيدٍ الْمَقْبُرِيِّ عَنْ عُمَرَ بْنِ الْحَكَمِ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَنَمَةَ قَالَ رَأَيْتُ عَمَّارَ بْنَ يَاسِرٍ دَخَلَ الْمَسْجِدَ فَصَلَّى فَأَخَفَّ الصَّلَاةَ قَالَ فَلَمَّا خَرَجَ قُمْتُ إِلَيْهِ فَقُلْتُ يَا أَبَا الْيَقْظَانِ لَقَدْ خَفَّفْتَ قَالَ فَهَلْ رَأَيْتَنِي انْتَقَصْتُ مِنْ حُدُودِهَا شَيْئًا قُلْتُ لَا قَالَ فَإِنِّي بَادَرْتُ بِهَا سَهْوَةَ الشَّيْطَانِ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ إِنَّ الْعَبْدَ لَيُصَلِّي الصَّلَاةَ مَا يُكْتَبُ لَهُ مِنْهَا إِلَّا عُشْرُهَا تُسْعُهَا ثُمُنُهَا سُبُعُهَا سُدُسُهَا خُمُسُهَا رُبُعُهَا ثُلُثُهَا نِصْفُهَا
हमसे कहिन है [शफवान बिन ईसा] हमसे [इब्नू अजलान] से [सैद अल मकबुरी] से [उमर बिन अल हकाम] से [अब्दुल्ला बिन अनामा] कहिन हैं; हम [अम्मर बिन यासिर] का मस्जिद मा घुसे अऊर नमाज पढ़त देखेन फिर उ ओका हल्का किहिन। जब उ बाहर आवा, तौ मैं ओकरे पास गय अऊर कहिन, 'हे अबुल यक्ज़ान, सचमुच, तुमने नमाज आसान कइ दिहिस है'। अम्मार बोले, 'तुमने देखा कि हमने सीमाओं को थोड़ा भी कम करते हुए देखा?' हम जवाब दिहेन, 'नहीं'। अम्मर बोले, 'सचमुच मैं शैतान के हस्तक्षेप से आगे निकले के कोशिश करत हउँ। हमने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कहते सुना: 'वास्तव में सेवक सचमुच नमाज पढ़त है, लेकिन ओकर इनाम एक दसवां, एक नौवां, एक आठवां, एक सातवां, एक छठवां, एक पांचवां, एक चौथाई, एक तिहाई या आधा के अलावा नाहीं लिखा जात है।'