Imam Ahmad : 7754
حَدَّثَنَا هَاشِمٌ أَبُو النَّضْرِ قَالَ حَدَّثَنَا الْفَرَجُ يَعْنِي ابْنَ فَضَالَةَ حَدَّثَنَا أَبُو سَعْدٍ الْحِمْصِيُّ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ دَعَوَاتٌ سَمِعْتُهَا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَا أَتْرُكُهَا مَا عِشْتُ حَيًّا سَمِعْتُهُ يَقُولُ اللَّهُمَّ اجْعَلْنِي أُعْظِمُ شُكْرَكَ وَأُكْثِرُ ذِكْرَكَ وَأَتْبَعُ نَصِيحَتَكَ وَأَحْفَظُ وَصِيَّتَكَ
हमसे कहिन है [हसीम अबू अन नाधर] कहिन; हमसे [अल फराज] - अर्थात् इब्न फधलाह - कहिन हैं; हमका [अबू सद अल हिमशी] [अबू हुरैरा] से बताइस है, उ कहिन; एक प्रार्थना जवन हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुनेन, जब तक हम जिंदा रहेन तब तक हम ओका कभी नाहीं छोड़ेन, हम ओनका कहत सुने रहेन: 'हे अल्लाह, हमका एक अइसन सेवक बनावा जवन आभारी होइ अऊर आपके ज़िकर बढ़ा सके, आपके सलाह का पालन करा अऊर आपके इच्छा का रखवाला'।