Imam Ahmad : 4897
حَدَّثَنَا عَبْدُ الْمَلِكِ بْنُ عَمْرٍو حَدَّثَنَا ابْنُ أَبِي ذِئْبٍ عَنِ الْحَارِثِ عَنْ حَمْزَةَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ عَنْ أَبِيهِ قَالَ كَانَتْ تَحْتِي امْرَأَةٌ أُحِبُّهَا وَكَانَ أَبِي يَكْرَهُهَا فَأَمَرَنِي أَنْ أُطَلِّقَهَا فَأَبَيْتُ فَأَتَى النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَذَكَرَ ذَلِكَ لَهُ فَأَرْسَلَ إِلَيَّ فَقَالَ يَا عَبْدَ اللَّهِ طَلِّقْ امْرَأَتَكَ فَطَلَّقْتُهَا
हमसे कहिन है [अब्दुल मलिक बिन अमरू] हमसे कहिन है [इब्न अबू दज़ी`ब] से [अल हरिथ] से [हमजाह बिन अब्दुल्ला बिन उमर] से [उनके पिता] से उ कहिन, 'मेरे पास एक पत्नी रही जेसे हम प्यार करत रहेन लेकिन हमार पिता ओसे नफरत करत रहे, फिर हमार पिताजी हमसे तलाक देय का कहिन अऊर हम मना कइ दिहेन। फिर हम पैगम्बर सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम से मिलेन अऊर ओनसे ई बात बतायेन, तौ उइ एक दूत भेजिन कि हे अब्दुल्ला, आपन मेहरारू का तलाक दे। हमहूँ ओसे तलाक दइ दिहे रहेन'।