Imam Ahmad : 1436
حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ أَنْبَأَنَا سُفْيَانُ عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ عُمَيْرٍ عَنْ جَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ قَالَ شَكَا أَهْلُ الْكُوفَةِ سَعْدًا إِلَى عُمَرَ فَقَالُوا لَا يُحْسِنُ يُصَلِّي قَالَ فَسَأَلَهُ عُمَرُ فَقَالَ إِنِّي أُصَلِّي بِهِمْ صَلَاةَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَرْكُدُ فِي الْأُولَيَيْنِ وَأَحْذِفُ فِي الْأُخْرَيَيْنِ قَالَ ذَلِكَ الظَّنُّ بِكَ يَا أَبَا إِسْحَاقَ
हमसे कहिन है [अब्दुर्राज्जाक] हमसे [सुफयान] [अब्दुल मलिक बिन उमैर] से [जाबिर बिन समुराह] से कहिन हैं, कहत हैं; कुफा के लोग उमर से सद के बारे मा शिकायत किहिन, उ कहिन; 'वह अपनी प्रार्थना मा अच्छा नाहीं है'। तब उमर ने उनसे पूछा, तो [सद] ने जवाब दिया; 'मैं रसूलुल्लाह शल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नमाज के रूप मा ओनके नेतृत्व करत हउँ, मैं पहिले दुई -रकात- का लंबा करत हउँ अऊर आखिरी दुई -रकात- का हल्का करत हउँ'। उमर कहिन; 'हम यही सोचे रहेन। हे अबू इशाक'