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ISLAM AL-HAQ: QURAN & HADITH
(The True Islam)



Imam Bukhari : 462

حَدَّثَنَا إِبْرَاهِيمُ بْنُ الْمُنْذِرِ الْحِزَامِيُّ قَالَ حَدَّثَنَا أَنَسُ بْنُ عِيَاضٍ قَالَ حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ عُقْبَةَ عَنْ نَافِعٍ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ أَخْبَرَهُأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَنْزِلُ بِذِي الْحُلَيْفَةِ حِينَ يَعْتَمِرُ وَفِي حَجَّتِهِ حِينَ حَجَّ تَحْتَ سَمُرَةٍ فِي مَوْضِعِ الْمَسْجِدِ الَّذِي بِذِي الْحُلَيْفَةِ وَكَانَ إِذَا رَجَعَ مِنْ غَزْوٍ كَانَ فِي تِلْكَ الطَّرِيقِ أَوْ حَجٍّ أَوْ عُمْرَةٍ هَبَطَ مِنْ بَطْنِ وَادٍ فَإِذَا ظَهَرَ مِنْ بَطْنِ وَادٍ أَنَاخَ بِالْبَطْحَاءِ الَّتِي عَلَى شَفِيرِ الْوَادِي الشَّرْقِيَّةِ فَعَرَّسَ ثَمَّ حَتَّى يُصْبِحَ لَيْسَ عِنْدَ الْمَسْجِدِ الَّذِي بِحِجَارَةٍ وَلَا عَلَى الْأَكَمَةِ الَّتِي عَلَيْهَا الْمَسْجِدُ كَانَ ثَمَّ خَلِيجٌ يُصَلِّي عَبْدُ اللَّهِ عِنْدَهُ فِي بَطْنِهِ كُثُبٌ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثَمَّ يُصَلِّي فَدَحَا السَّيْلُ فِيهِ بِالْبَطْحَاءِ حَتَّى دَفَنَ ذَلِكَ الْمَكَانَ الَّذِي كَانَ عَبْدُ اللَّهِ يُصَلِّي فِيهِ وَأَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ حَدَّثَهُ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَلَّى حَيْثُ الْمَسْجِدُ الصَّغِيرُ الَّذِي دُونَ الْمَسْجِدِ الَّذِي بِشَرَفِ الرَّوْحَاءِ وَقَدْ كَانَ عَبْدُ اللَّهِ يَعْلَمُ الْمَكَانَ الَّذِي كَانَ صَلَّى فِيهِ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ ثَمَّ عَنْ يَمِينِكَ حِينَ تَقُومُ فِي الْمَسْجِدِ تُصَلِّي وَذَلِكَ الْمَسْجِدُ عَلَى حَافَةِ الطَّرِيقِ الْيُمْنَى وَأَنْتَ ذَاهِبٌ إِلَى مَكَّةَ بَيْنَهُ وَبَيْنَ الْمَسْجِدِ الْأَكْبَرِ رَمْيَةٌ بِحَجَرٍ أَوْ نَحْوُ ذَلِكَ وَأَنَّ ابْنَ عُمَرَ كَانَ يُصَلِّي إِلَى الْعِرْقِ الَّذِي عِنْدَ مُنْصَرَفِ الرَّوْحَاءِ وَذَلِكَ الْعِرْقُ انْتِهَاءُ طَرَفِهِ عَلَى حَافَةِ الطَّرِيقِ دُونَ الْمَسْجِدِ الَّذِي بَيْنَهُ وَبَيْنَ الْمُنْصَرَفِ وَأَنْتَ ذَاهِبٌ إِلَى مَكَّةَ وَقَدْ ابْتُنِيَ ثَمَّ مَسْجِدٌ فَلَمْ يَكُنْ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ يُصَلِّي فِي ذَلِكَ الْمَسْجِدِ كَانَ يَتْرُكُهُ عَنْ يَسَارِهِ وَوَرَاءَهُ وَيُصَلِّي أَمَامَهُ إِلَى الْعِرْقِ نَفْسِهِ وَكَانَ عَبْدُ اللَّهِ يَرُوحُ مِنْ الرَّوْحَاءِ فَلَا يُصَلِّي الظُّهْرَ حَتَّى يَأْتِيَ ذَلِكَ الْمَكَانَ فَيُصَلِّي فِيهِ الظُّهْرَ وَإِذَا أَقْبَلَ مِنْ مَكَّةَ فَإِنْ مَرَّ بِهِ قَبْلَ الصُّبْحِ بِسَاعَةٍ أَوْ مِنْ آخِرِ السَّحَرِ عَرَّسَ حَتَّى يُصَلِّيَ بِهَا الصُّبْحَ وَأَنَّ عَبْدَ اللَّهِ حَدَّثَهُ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَنْزِلُ تَحْتَ سَرْحَةٍ ضَخْمَةٍ دُونَ الرُّوَيْثَةِ عَنْ يَمِينِ الطَّرِيقِ وَوِجَاهَ الطَّرِيقِ فِي مَكَانٍ بَطْحٍ سَهْلٍ حَتَّى يُفْضِيَ مِنْ أَكَمَةٍ دُوَيْنَ بَرِيدِ الرُّوَيْثَةِ بِمِيلَيْنِ وَقَدْ انْكَسَرَ أَعْلَاهَا فَانْثَنَى فِي جَوْفِهَا وَهِيَ قَائِمَةٌ عَلَى سَاقٍ وَفِي سَاقِهَا كُثُبٌ كَثِيرَةٌ وَأَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ حَدَّثَهُ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَلَّى فِي طَرَفِ تَلْعَةٍ مِنْ وَرَاءِ الْعَرْجِ وَأَنْتَ ذَاهِبٌ إِلَى هَضْبَةٍ عِنْدَ ذَلِكَ الْمَسْجِدِ قَبْرَانِ أَوْ ثَلَاثَةٌ عَلَى الْقُبُورِ رَضَمٌ مِنْ حِجَارَةٍ عَنْ يَمِينِ الطَّرِيقِ عِنْدَ سَلَمَاتِ الطَّرِيقِ بَيْنَ أُولَئِكَ السَّلَمَاتِ كَانَ عَبْدُ اللَّهِ يَرُوحُ مِنْ الْعَرْجِ بَعْدَ أَنْ تَمِيلَ الشَّمْسُ بِالْهَاجِرَةِ فَيُصَلِّي الظُّهْرَ فِي ذَلِكَ الْمَسْجِدِ وَأَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ حَدَّثَهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَزَلَ عِنْدَ سَرَحَاتٍ عَنْ يَسَارِ الطَّرِيقِ فِي مَسِيلٍ دُونَ هَرْشَى ذَلِكَ الْمَسِيلُ لَاصِقٌ بِكُرَاعِ هَرْشَى بَيْنَهُ وَبَيْنَ الطَّرِيقِ قَرِيبٌ مِنْ غَلْوَةٍ وَكَانَ عَبْدُ اللَّهِ يُصَلِّي إِلَى سَرْحَةٍ هِيَ أَقْرَبُ السَّرَحَاتِ إِلَى الطَّرِيقِ وَهِيَ أَطْوَلُهُنَّ وَأَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ حَدَّثَهُ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَنْزِلُ فِي الْمَسِيلِ الَّذِي فِي أَدْنَى مَرِّ الظَّهْرَانِ قِبَلَ الْمَدِينَةِ حِينَ يَهْبِطُ مِنْ الصَّفْرَاوَاتِ يَنْزِلُ فِي بَطْنِ ذَلِكَ الْمَسِيلِ عَنْ يَسَارِ الطَّرِيقِ وَأَنْتَ ذَاهِبٌ إِلَى مَكَّةَ لَيْسَ بَيْنَ مَنْزِلِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَبَيْنَ الطَّرِيقِ إِلَّا رَمْيَةٌ بِحَجَرٍ وَأَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ حَدَّثَهُ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَنْزِلُ بِذِي طُوًى وَيَبِيتُ حَتَّى يُصْبِحَ يُصَلِّي الصُّبْحَ حِينَ يَقْدَمُ مَكَّةَ وَمُصَلَّى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ذَلِكَ عَلَى أَكَمَةٍ غَلِيظَةٍ لَيْسَ فِي الْمَسْجِدِ الَّذِي بُنِيَ ثَمَّ وَلَكِنْ أَسْفَلَ مِنْ ذَلِكَ عَلَى أَكَمَةٍ غَلِيظَةٍ وَأَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ حَدَّثَهُ أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ اسْتَقْبَلَ فُرْضَتَيْ الْجَبَلِ الَّذِي بَيْنَهُ وَبَيْنَ الْجَبَلِ الطَّوِيلِ نَحْوَ الْكَعْبَةِ فَجَعَلَ الْمَسْجِدَ الَّذِي بُنِيَ ثَمَّ يَسَارَ الْمَسْجِدِ بِطَرَفِ الْأَكَمَةِ وَمُصَلَّى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَسْفَلَ مِنْهُ عَلَى الْأَكَمَةِ السَّوْدَاءِ تَدَعُ مِنْ الْأَكَمَةِ عَشَرَةَ أَذْرُعٍ أَوْ نَحْوَهَا ثُمَّ تُصَلِّي مُسْتَقْبِلَ الْفُرْضَتَيْنِ مِنْ الْجَبَلِ الَّذِي بَيْنَكَ وَبَيْنَ الْكَعْبَةِ

हमका बतावा गा है [इब्राहिम बिन अल मुंडज़िर अल हिजामी] कहिन, हमसे बतावा गा है [अनस बिन इयादल] कहिन, हमसे [मूसा बिन उकबा] [नाफी] से बतावा गा है कि [अब्दुल्लाह बिन उमर] ने ओनका रिपोर्ट किहिन, कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि का सल्लाहु अलैहि का दमुलाह के नीचे गिरावा गा रहा। आपन उमरा अऊर हज करत अहै, अर्थात् उ जगह जवन अब धुल हुलैफा क्षेत्र मा मस्जिद के रूप मा उपयोग कीन जात है। जब ऊ युद्ध, या हज, या उमरा से लौटत रहा, अऊर ई सड़क से गुजरत रहा, तौ ऊ घाटी के तल से उतरत रहा, अऊर जब ऊ घाटी के तल तक पहुँचत रहा तौ ऊ बथहा' - उ नाली जहाँ से पानी बहत है - पर रुकत रहा, जवन घाटी के पूरब मा चट्टान पर स्थित है। वहिमा रात बिताइस अउर भोर तक विश्राम किहिस। ऊ कउनो चट्टानी मस्जिद या पहाड़ी पर जहाँ मस्जिद रही, नाहीं रुका। घाटी मा एक खाई है जेहिका अब्दुल्ला एक बार नमाज पढ़ै के लिए इस्तेमाल करत रहें। घाटी के नीचे एक रेत का टीला है जहाँ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार वहाँ नमाज पढ़त रहें। एक दिन बथहा मा पानी के बहाव बालू के टीला का इतना घसीट लिहिस कि अब्दुल्ला नमाज के लिए इस्तेमाल कीन गा खाई का बंद कइ दिहिस। अब्दुल्ला बिन उमर ने उनसे -नफी- बतावा कि पैगम्बर सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम स्यारफुल रौहा के मस्जिद मा नाहीं, बल्कि एक छोट मस्जिद मा नमाज पढ़िन। अब्दुल्ला उ जगह का जानत रहें जेहिका पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नमाज के लिए इस्तेमाल किहिन रहैं। ऊ कहिस, 'वहाँ, दाईं ओर अगर तुम मस्जिद मा नमाज पढ़त खड़ा हो। अगर आप मक्का के ओर जात हैं तौ मस्जिद सड़क के दाहिने ओर स्थित है। मस्जिद अऊर बड़ी मस्जिद के बीच के दूरी पत्थर के फेंक या कुछ अइसने है'। एअब्दुल्लाह बिन उमर 'इरकी घाटी जवन रौहा सीमा पर स्थित है' मा भी नमाज पढ़िन। ई घाटी मस्जिद के नीचे सड़क के किनारे खतम होत है जवन कि अगर आप मक्का के ओर जात हैं तौ दाईं ओर स्थित है। वहिमा एक मस्जिद बनाई गै रही लेकिन अब्दुल्ला बिन उमर कबो मस्जिद मा नमाज नाहीं पढ़िन। उ मस्जिद के बाईं ओर से अऊर ओकरे पीछे से गुजरिन, फिर उ इरक घाटी मा ही ओकरे सामने नमाज पढ़िन। एक बार जब उ रौहा' से लौटे, तब तक उ झुहुर नमाज नाहीं पढ़िन - दूसर जगह - जब तक उ उ स्थान पर नाहीं पहुँचे, फिर उ उ जगह पर झुहुर के नमाज पढ़िन। अगर उ मक्का से लौटत है अऊर फजर से एक घंटा पहिले या सहर समय के अंत मा - भोर से पहिले - उ जगह से गुजरत है, तौ उ उ जगह पर फजर के नमाज तक आराम करत है। अब्दुल्ला ने उनसे इ भी बतावा कि पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार सड़क के दाहिने ओर सड़क के सामने अर-रुवैत्साह गाँव मा एक बड़े पेड़ के नीचे रुके रहे, यानी एक नीच अऊर समतल जगह पर। यहिसे उ समतल चट्टान का पार कइ सकत रहा जवन समतल सड़क के अंत से दुइ मील दूर रहा, अर-रुवैत्साह गाँव। चट्टान के ऊपरी हिस्सा मा से कईयो गिर गए हैं अऊर नीचे के तरफ गिर गए हैं, लेकिन चट्टान अबहियों अपने आधार पर सीधा खड़ा है भले ही किनारे पर कईयो अंतराल हैं। अब्दुल्ला बिन उमर ने उनसे इ भी बतावा कि पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार झरना के पास नमाज पढ़िन जवन अल अर्ज गांव के पीछे स्थित है अगर आप हदलबाह गांव जात हैं। मस्जिद मा सड़क के दाईं ओर, एक समतल सड़क पर, पत्थर से चिन्हित दु या तीन कब्र हैं। ई समतल सड़क के दाहिने तरफ रहा जहाँ से अब्दुल्ला एक बार दुपहरिया मा सूरज ढल जाय के बाद अल इर्ज गाँव से लौटत समय गुजरे रहे, फिर उ मस्जिद मा दुपहरिया के नमाज पढ़िन। अब्दुल्ला बिन उमर ने इ भी कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम एक बार हरस्या गांव के पास पानी के चैनल पर सड़क के बाईं ओर बड़े पेड़न पर रुके रहे। जल चैनल हरस्या गाँव के सड़क के अंत मा स्थित है जवन एक तीर के फेंक के दूरी - लगभग एक मील के दु तिहाई - है। अब्दुल्ला एक बार इन बड़े पेड़न मा सबसे बड़े और ऊँचे पेड़ के पास नमाज पढ़िन। अब्दुल्ला ने भी कहानी सुनाई n कि पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार शफरावत घाटी से उतरत समय मरुल झहरान नामक घाटी के पास स्थित एक जल चैनल पर रुके रहे, अर्थात् मदीना से पहिले। ऊ रुका अऊर नीचे उतरा जवन सड़क के बाईं ओर है अगर आप मक्का के ओर जात हैं। पानी के चैनल जहाँ ऊ रुका रहा अऊर सड़क के बीच के दूरी पत्थर के फेंक से ज्यादा दूरी से ज्यादा नाहीं रही। अब्दुल्ला बिन उमर ने उनसे इ भी बतावा कि पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार ज़ू थुवा मा रुके रहे अऊर भोर तक वहिके रात बिताइन, फिर जब उ मक्का के दौरा करै गें तौ उहाँ सुबह के नमाज पढ़िन। रसूलुल्लाह शल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए नमाज स्थल एक बड़ी पहाड़ी पर स्थित रहा, न कि उ स्थिति मा जहां अब मस्जिद बनाई गई है, जवन पहाड़ी के आधार पर है। अब्दुल्ला बिन उमर ने उनसे इ भी बतावा कि पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार एक पहाड़ के दुई प्रवेश द्वारन का सामना करत रहें जवन पहाड़ के चोटी से काबा के आकार के बारे मा दूरी पर रहा, एकर वर्तमान स्थिति मस्जिद के बाईं ओर है जवन खड़ी कीन गै रही। अऊर पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए प्रार्थना स्थल काली चट्टान से नीचे स्थित है। वहि जगह से चट्टान तक के दूरी दस हाथ या कुछ अइसने रही। अऊर अगर आप पहाड़ के दुइनौ रास्ता के ओर मुँह कइके नमाज पढ़त हई तौ उ जगह बीच मा है जहाँ आप खड़ा हई अऊर काबा'।