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इस्लाम अल-हक: कुरआन आ हदीस
(सच्चा इस्लाम)



Al Alim

Imam Ahmad : 49

حَدَّثَنَا بَهْزٌ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ حَدَّثَنَا يَعْلَى بْنُ عَطَاءٍ قَالَ سَمِعْتُ عَمْرَو بْنَ عَاصِمٍ يَقُولُ سَمِعْتُ أَبَا هُرَيْرَةَ يَقُولُ قَالَ أَبُو بَكْرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ يَا رَسُولَ اللَّهِ عَلِّمْنِي شَيْئًا أَقُولُهُ إِذَا أَصْبَحْتُ وَإِذَا أَمْسَيْتُ وَإِذَا أَخَذْتُ مَضْجَعِي قَالَ قُلْ اللَّهُمَّ فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ أَوْ قَالَ اللَّهُمَّ عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي وَشَرِّ الشَّيْطَانِ وَشِرْكِهِ حَدَّثَنَا عَفَّانُ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ عَنْ يَعْلَى بْنِ عَطَاءٍ قَالَ سَمِعْتُ عَمْرَو بْنَ عَاصِمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ فَذَكَرَ مَعْنَاهُ

हमनी के बतवले बाड़े [बहज] बता देले बाड़े [या'ला बिन 'अथो'] उ कहले बाड़े; सुनले रहनी कि ['अमरू बिन 'अशिम] कहत बाड़े; हम [अबू हुरैरा] के कहत सुनले बानी; अबू बकर कहले कि; 'हे अल्लाह के रसूलुल्लाह, हमरा के एगो नमाज सिखाईं जवना के हम रोज सबेरे, शाम अवुरी सुते से पहिले पढ़ सकीले'। उ जवाब दिहले; 'पढ़ल; 'अल्लाहुम्मा फअथिरस समवाती वाल 'अर्दल 'आलिमल गैबी वसी श्याहादाह' -हे अल्लाह, आकाश आ धरती के रचयिता, जे अदृश्य आ दृश्य के सर्वज्ञ हवें-' या उ कहले कि: 'अल्लाहम्मा 'आलीमल गैबी वसी श्याहादह फतिरास समावती वाल'अर्द रब्बा कुल्ला स्याई'इन वामलीकाहु, अस्यहादु अनला इलाहा इल्ला अनता 'अ'उद्जुबिका मिन सियरी नफसी वा स्यारिस स्याहोन वसीरकिही -हे अल्लाह, आकाश आ धरती के रचयिता जे सब कुछ अनदेखल आ लउके वाला चीजन के जानत बानी, सब चीजन के रब्ब आ ओकर मालिकन के, हम गवाही देत बानी कि कवनो भगवान के लायक नइखे तोहरा के छोड़ के पूजा के, हम अपना बुराई आ शैतान आ ओकर सहयोगी के बुराई से तोहरा से शरण लेत बानी-'। हमनी के ['अफ्फान] के बता के उ कहले; [या'ला बिन अथो'] से हमनी के [स्यू'बाह] के संबंध बना के उ कहले; सुनले बानी [‘अमरू बिन अशिम बिन अब्दुल्लाह], फेर ओह हदीस के जिक्र कइले बानी जवन सार्थक बा.

हदीस :

Imam Ahmad : 49, 60, 77, 418, 444, 497, 2024, 2183, 2437, 2775, 3477, 3561, 3572, 3584, 3721, 3954, 4032, 4536, 4887, 4975, 5770, 5902, 6309, 6555, 7620, 8040, 8042, 8472, 9137, 9301, 11047, 14180, 15617, 16541, 16851, 19585, 20261, 20354, 20479, 20678, 21908, 22046, 22756, 24444
Imam Bukhari : 981, 4261, 4405, 4477, 6831, 6876
Imam Abu Dawud : 4405, 4420, 4425
Imam Tirmidzi : 3314, 3452
Imam Darimi : 2573