इमाम मुस्लिम : 901
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بِشْرٍ حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ عَنْ نَافِعٍ عَنْ ابْنِ عُمَرَ قَالَ رُبَّمَا قَرَأَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْقُرْآنَ فَيَمُرُّ بِالسَّجْدَةِ فَيَسْجُدُ بِنَا حَتَّى ازْدَحَمْنَا عِنْدَهُ حَتَّى مَا يَجِدُ أَحَدُنَا مَكَانًا لِيَسْجُدَ فِيهِ فِي غَيْرِ صَلَاةٍ
हमें बताया गया है [अबू बकर बिन अबू सय्यबा] ने हमें बताया है [मुहम्मद बिन बिसीर] ने हमें बताया है ['उबैदुल्लाह बिन उमर] [नफी' से] [इब्न उमर] ने कहा, उन्होंने कहा, कभी-कभी रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सजदा आयत के ज़रिए कुरान पढ़ते हुए सजदा करते थे, फिर वह हमारे साथ सजदा करते थे जब तक कि हम उनके साथ होने पर तंग महसूस नहीं करते थे, जब तक कि हममें से किसी को सजदा करने की जगह नहीं मिलती थी, और यह नमाज़ के समय के बाहर होता था।