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इस्लाम अल-हक़: क़ुरआन और हदीस
(सच्चा इस्लाम)



इमाम बुखारी : 4248

حَدَّثَنَا أَحْمَدُ ابْنُ أَبِي رَجَاءٍ حَدَّثَنَا النَّضْرُ عَنْ هِشَامٍ قَالَ أَخْبَرَنِي أَبِي عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا أَنَّأَبَاهَا كَانَ لَا يَحْنَثُ فِي يَمِينٍ حَتَّى أَنْزَلَ اللَّهُ كَفَّارَةَ الْيَمِينِ قَالَ أَبُو بَكْرٍ لَا أَرَى يَمِينًا أُرَى غَيْرَهَا خَيْرًا مِنْهَا إِلَّا قَبِلْتُ رُخْصَةَ اللَّهِ وَفَعَلْتُ الَّذِي هُوَ خَيْرٌ

हमें [अहमद बिन अबू राजा] ने बताया है कि हमें [अन नदलर] ने [हिशाम] से बताया है कि मुझे [मेरे पिता] को ['ऐस्याह रदिअल्लाहु अन्हा] से बताया गया है कि उनके पिता ने कभी कसम लेकर झूठ नहीं बोला जब तक कि अल्लाह ने गुनाहों के लिए कसम नहीं उतारी। [अबू बकर] ने कहा; 'मैं कसम को नहीं देखता, फिर मैं दूसरी कसम देखता हूँ जो बेहतर है जब तक कि मैं अल्लाह की दी हुई रुखसाह (राहत) को स्वीकार न कर लूँ (कसम रद्द कर दूँ) और मैं अपनी पूरी कोशिश करता हूँ।'