Imam Malik : 1321
حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ السَّائِبِ بْنِ يَزِيدَأَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عَمْرِو بْنِ الْحَضْرَمِيِّ جَاءَ بِغُلَامٍ لَهُ إِلَى عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ فَقَالَ لَهُ اقْطَعْ يَدَ غُلَامِي هَذَا فَإِنَّهُ سَرَقَ فَقَالَ لَهُ عُمَرُ مَاذَا سَرَقَ فَقَالَ سَرَقَ مِرْآةً لِامْرَأَتِي ثَمَنُهَا سِتُّونَ دِرْهَمًا فَقَالَ عُمَرُ أَرْسِلْهُ فَلَيْسَ عَلَيْهِ قَطْعٌ خَادِمُكُمْ سَرَقَ مَتَاعَكُمْ
[अस साहिब बिन यजीद] से [इब्नू शिहाब] से मलिक से मोका बतावा गा है कि अब्दुल्ला बिन अमरू बिन अल हदलरामी अपने नौकर के साथे उमर बिन खत्ताब के पास आए रहे, अऊर कहिन; 'मोर नौकरानी का हाथ काटौ, चोरी कइ लिहिस है! ' उमर ने पूछा; 'का चोरी किहिस?' उ जवाब दिहिस; 'उ मोर मेहरारू के आईना चुरा लिहिस जेकर कीमत साठ दिरहम रही'। [उमर] कहिन; 'ओका आजाद करा, काहे से कि तोहार सेवक के हाथ नाहीं काट सकत हैं, जे तोहार संपत्ति चोरी करत है'।