Imam Malik : 79
حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ أَنَّهُ سَمِعَهُ وَرَجُلٌ يَسْأَلُهُ فَقَالَ إِنِّي لَأَجِدُ الْبَلَلَ وَأَنَا أُصَلِّي أَفَأَنْصَرِفُ فَقَالَ لَهُ سَعِيدٌلَوْ سَالَ عَلَى فَخِذِي مَا انْصَرَفْتُ حَتَّى أَقْضِيَ صَلَاتِي
मोका बतावा है याह्या से मलिक से [यह्या बिन सईद] से [सईद बिन मुसैयब] ऊ सुनिस; कि एक मनई रहा जे ओसे पूछिस, तब ऊ कहिस; 'जब हम प्रार्थना करत रहेन तौ हमका अपने ऊपर कुछ गीला मिला, का हमका ओका रद्द करै का चाही?' सईद कहिन; 'भले ही ई मोर जांघन से नीचे बह जाय, जब तक मैं आपन प्रार्थना खतम नाहीं करब तब तक मैं एकरा रद्द नाहीं करब'।