Jangan mencampur adukkan iman dengan kezaliman (syirik)
Imam Bukhari : 3174
حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ عَنْ الْأَعْمَشِ عَنْ إِبْرَاهِيمَ عَنْ عَلْقَمَةَ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ قَالَلَمَّا نَزَلَتْ{ الَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُمْ بِظُلْمٍ }قَالَ أَصْحَابُ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَيُّنَا لَمْ يَلْبِسْ إِيمَانَهُ بِظُلْمٍ فَنَزَلَتْ{ لَا تُشْرِكْ بِاللَّهِ إِنَّ الشِّرْكَ لَظُلْمٌ عَظِيمٌ }
हमसे कहिन है [अबू अल वालिद] हमसे कहिन है [स्युबाह] से [अल अमासी] से [इब्राहिम] से ['अलकामा] से [अब्दुल्ला] कहिन; 'जब अल्लाह तआला का वचन उतरा जिसका अर्थ है:-'जो इमान रखते हैं और अपने ईमान को अन्याय में नहीं मिलाते...'। - -QS अल-अन'म आयत 82-, पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथियों ने कहा; 'हममें से कौन अपने आस्था को अन्याय से भ्रमित नहीं करत है?'। त फिर अल्लाह तआला ने अपने वचनन का प्रकट किहिन: -'शर्क न करौ -अल्लाह के साथ साथी बनाओ-, काहे से कि वाकई शर्क सचमुच बहुत बड़ा अन्याय है'-। -क्यू एस लुकमान पद 13-।