Imam Bukhari : 2146
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ عَنْ عَمْرٍو قَالَفِي صَدَقَةِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ لَيْسَ عَلَى الْوَلِيِّ جُنَاحٌ أَنْ يَأْكُلَ وَيُؤْكِلَ صَدِيقًا لَهُ غَيْرَ مُتَأَثِّلٍ مَالًافَكَانَ ابْنُ عُمَرَ هُوَ يَلِي صَدَقَةَ عُمَرَ يُهْدِي لِنَاسٍ مِنْ أَهْلِ مَكَّةَ كَانَ يَنْزِلُ عَلَيْهِمْ
हमसे कहिन है [कुतैबा बिन सईद] हमसे कहिन है [सुफयान] [अमरू] से उमर रदलियाअल्लाहु अन्हू के शदका के बारे मा कहिन: 'एक अभिभावक के लिए ई खाए अऊर अपने दोस्तन का खिलावे के लिए कौनो पाप नाहीं है सिवाय उ के जे एक अनाथ के संपत्ति का अपनी संपत्ति मा लेत है। फिर [इब्न उमर] उमर के सदाका जारी रखिन, अर्थात् मक्का के लोगन के लोगन का दिहिन जे ओनके पास रुके रहे।