Imam Abu Dawud : 3153
حَدَّثَنَا أَبُو الْوَلِيدِ الطَّيَالِسِيُّ حَدَّثَنَا اللَّيْثِ عَنْ الزُّهْرِيِّ عَنْ عُرْوَةَ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ الزُّبَيْرِ حَدَّثَهُأَنَّ رَجُلًا خَاصَمَ الزُّبَيْرَ فِي شِرَاجِ الْحَرَّةِ الَّتِي يَسْقُونَ بِهَا فَقَالَ الْأَنْصَارِيُّ سَرِّحْ الْمَاءَ يَمُرُّ فَأَبَى عَلَيْهِ الزُّبَيْرُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لِلزُّبَيْرِ اسْقِ يَا زُبَيْرُ ثُمَّ أَرْسِلْ إِلَى جَارِكَ قَالَ فَغَضِبَ الْأَنْصَارِيُّ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَنْ كَانَ ابْنَ عَمَّتِكَ فَتَلَوَّنَ وَجْهُ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثُمَّ قَالَ اسْقِ ثُمَّ احْبِسْ الْمَاءَ حَتَّى يَرْجِعَ إِلَى الْجَدْرِفَقَالَ الزُّبَيْرُ فَوَاللَّهِ إِنِّي لَأَحْسَبُ هَذِهِ الْآيَةَ نَزَلَتْ فِي ذَلِكَ{ فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّى يُحَكِّمُوكَ }الْآيَةَ
हमसे कहिन है [अबू अल वालिद अथ थायालिसी] हमसे [अज जुहरी] से ['उर्वाह] से [अल लैट्स] बताइन हैं कि [अब्दुल्ला बिन अज़ जुबैर] ने उनसे कहा है, कि एक आदमी रहा जे अज़ जुबैर के साथ कठोर काली चट्टानी जमीन पर पानी के चैनलन के बारे मा दुश्मनी करत रहा जेका उ फसलन के सिंचाई करै के लिए उपयोग करत रहें। तभी अंसार ने कहा कि पानी बीत जाय ! लेकिन अज जुबैर मना कइ दिहिन। तब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अज़ जुबैर से कहा: 'हे अज़ जुबैर अपने पौधों को पानी दो, फिर अपने पड़ोसियों को बांट दो!' तो अंसार गुस्सा हो गया, फिर बोले, 'हे रसूल अल्लाह, क्या ई वजह से है कि ये तुम्हारी मौसी का लड़का है!' फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का चेहरा बदल गवा, उ कहिन: 'अपने पौधन का पानी पिलावा, फिर पानी का तब तक पकड़े रहा जब तक कि उ अपने मूल स्थान पर न लौट जाय'। अज़ जुबैर ने कहा, 'अल्लाह के कसम, हम सचमुच सोचा कि ई आयत उ मामला के बारे मा प्रकट कीन गै रही; '-तो आपके प्रभु के द्वारा, वे -सार रूप से- तब तक विश्वास नहीं करत हैं जब तक कि वे आपका न्यायाधीश नहीं बनावत हैं...- ' -प्रश्न। एक निसा: 65-।