प्रतिनिधि हदीस
इमाम नसाई : 2677
أَخْبَرَنَا عَمْرُو بْنُ عَلِيٍّ قَالَ حَدَّثَنَا خَالِدٌ قَالَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ عَنْ قَتَادَةَ عَنْ مُطَرِّفٍ عَنْ عِمْرَانَأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ جَمَعَ بَيْنَ حَجٍّ وَعُمْرَةٍ ثُمَّ لَمْ يَنْزِلْ فِيهَا كِتَابٌ وَلَمْ يَنْهَ عَنْهُمَا النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ فِيهِمَا رَجُلٌ بِرَأْيِهِ مَا شَاءَ
उन्होंने कहा, हमें [अम्र बिन अली] ने बताया है; उन्होंने कहा, हमें [खालिद] ने बताया है; उन्होंने कहा, हमें [स्यूबा] ने [क़तादा] से [मुतर्रिफ़] से [इमरान] से बताया है कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज और उमराह को मिला दिया था, फिर उसकी व्याख्या करते हुए कोई आयत नहीं आई, और पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दोनों को मना नहीं किया, ताकि कोई व्यक्ति अपनी राय के अनुसार दोनों के बारे में जो चाहे कह सके।