प्रतिनिधि हदीस
इमाम बुखारी : 1737
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ عَنْ الْأَعْمَشِ عَنْ إِبْرَاهِيمَ التَّيْمِيِّ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَلِيٍّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَمَا عِنْدَنَا شَيْءٌ إِلَّا كِتَابُ اللَّهِ وَهَذِهِ الصَّحِيفَةُ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمَدِينَةُ حَرَمٌ مَا بَيْنَ عَائِرٍ إِلَى كَذَا مَنْ أَحْدَثَ فِيهَا حَدَثًا أَوْ آوَى مُحْدِثًا فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ لَا يُقْبَلُ مِنْهُ صَرْفٌ وَلَا عَدْلٌ وَقَالَ ذِمَّةُ الْمُسْلِمِينَ وَاحِدَةٌ فَمَنْ أَخْفَرَ مُسْلِمًا فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ لَا يُقْبَلُ مِنْهُ صَرْفٌ وَلَا عَدْلٌ وَمَنْ تَوَلَّى قَوْمًا بِغَيْرِ إِذْنِ مَوَالِيهِ فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ لَا يُقْبَلُ مِنْهُ صَرْفٌ وَلَا عَدْلٌقَالَ أَبُو عَبْد اللَّهِ عَدْلٌ فِدَاءٌ
हमें वर्णित किया गया है [मुहम्मद बिन बसिस्यार] ने हमें वर्णित किया है ['अब्दुर्रहमान] ने हमें [सुफियान] ने [अल अमाश] से [इब्राहिम एट-तैमिया] से [उनके पिता] से ['अली रदलिल्लाहु अन्हु] ने कहा: "हमारे पास अल्लाह की किताब और इन अश-सहिफ़ा (हदीस के पृष्ठों) के अलावा कुछ भी नहीं है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "मदीना एक पवित्र भूमि है जिसका क्षेत्र सहारा रेगिस्तान और इसके बीच में है। अतः जो कोई भी इसमें बुराई (बिद'अत) करता है जो धर्म द्वारा निषिद्ध है या लोगों को विधर्म करने में सहायता करता है, वह व्यक्ति अल्लाह, स्वर्गदूतों और सभी मनुष्यों द्वारा शापित होगा और उसकी 'अनिवार्य पूजा और सुन्नत' (या पश्चाताप और मुक्ति) के लिए उससे स्वीकार नहीं किया जाएगा। उससे ज़रूरी इबादत और सुन्नत कबूल की जाए और जो कोई अपने वली की इजाज़त के बिना किसी कौम की वली बन जाए, उस पर अल्लाह, फ़रिश्ते और सारी इंसानियत की लानत होगी और उससे ज़रूरी इबादत और सुन्नत कबूल नहीं की जाएगी।" अबू अब्दुल्ला अल बुखारी ने कहा: अल'अज़ शब्द का मतलब है: "फिरौती"।