हदीस
Rasulullah saw melaksanakan puasa pada tanggal sembilan dzul hijah, hari asyura, tiga hari pada tiap bulan dan hari senin dan kamis tiap awal bulan
Imam Muslim : 1976و حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَحْيَى التَّمِيمِيُّ وَقُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ جَمِيعًا عَنْ حَمَّادٍ قَالَ يَحْيَى أَخْبَرَنَا حَمَّادُ بْنُ زَيْدٍ عَنْ غَيْلَانَ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَعْبَدٍ الزِّمَّانِيِّ عَنْ أَبِي قَتَادَةَ رَجُلٌ أَتَى النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ كَيْفَ تَصُومُ فَغَضِبَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَلَمَّا رَأَى عُمَرُ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ غَضَبَهُ قَالَ رَضِينَا بِاللَّهِ رَبًّا وَبِالْإِسْلَامِ دِينًا وَبِمُحَمَّدٍ نَبِيًّا نَعُوذُ بِاللَّهِ مِنْ غَضَبِ اللَّهِ وَغَضَبِ رَسُولِهِ فَجَعَلَ عُمَرُ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ يُرَدِّدُ هَذَا الْكَلَامَ حَتَّى سَكَنَ غَضَبُهُ فَقَالَ عُمَرُ يَا رَسُولَ اللَّهِ كَيْفَ بِمَنْ يَصُومُ الدَّهْرَ كُلَّهُ قَالَ لَا صَامَ وَلَا أَفْطَرَ أَوْ قَالَ لَمْ يَصُمْ وَلَمْ يُفْطِرْ قَالَ كَيْفَ مَنْ يَصُومُ يَوْمَيْنِ وَيُفْطِرُ يَوْمًا قَالَ وَيُطِيقُ ذَلِكَ أَحَدٌ قَالَ كَيْفَ مَنْ يَصُومُ يَوْمًا وَيُفْطِرُ يَوْمًا قَالَ ذَاكَ صَوْمُ دَاوُدَ عَلَيْهِ السَّلَام قَالَ كَيْفَ مَنْ يَصُومُ يَوْمًا وَيُفْطِرُ يَوْمَيْنِ قَالَ وَدِدْتُ أَنِّي طُوِّقْتُ ذَلِكَ ثُمَّ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثَلَاثٌ مِنْ كُلِّ شَهْرٍ وَرَمَضَانُ إِلَى رَمَضَانَ فَهَذَا صِيَامُ الدَّهْرِ كُلِّهِ صِيَامُ يَوْمِ عَرَفَةَ أَحْتَسِبُ عَلَى اللَّهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ وَالسَّنَةَ الَّتِي بَعْدَهُ وَصِيَامُ يَوْمِ عَاشُورَاءَ أَحْتَسِبُ عَلَى اللَّهِ أَنْ يُكَفِّرَ السَّنَةَ الَّتِي قَبْلَهُ
आ हमनी के [याह्या बिन यह्या अत तमीमी] आ [कुतैबा बिन सईद] सभे [हम्मद] से बतवले बाड़न - [याह्या] कहले बाड़न- हमनी के [हम्मद बिन जैद] [गैलान] से [अब्दुल्लाह बिन मा’बाद अज जिमानी] से [अबू कतादा] से बतवले बाड़न कि एगो आदमी नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लगे आके पूछले बा कि ‘तू कइसे करीं तेज?' उ सवाल सुन के रसुलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खिसिया गईले। आ जब उमर देखलन कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नाराज बाड़े त कहले कि हमनी का अल्लाह के भगवान, इस्लाम के धर्म आ मुहम्मद के रसूलुल्लाह मानत बानी जा. हमनी के अल्लाह के शरण लेवेनी जा, अल्लाह अवुरी उनुका रसूलुल्लाह के कोप से'। उमर इ बात तब तक दोहरावत रहले जब तक कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के गुस्सा कम ना हो गईल। फेर पूछले कि हे अल्लाह के रसूलुल्लाह, साल भर रोजा राखे वाला लोग के का हाल बा? उ जवाब देले- 'उ ना त रोजा करेला ना रोजा तोड़ेला'। -या ऊ संपादकीय के साथे कहले रहले 'हमेशा खातिर उनुका के रोजा ना मानल जाला ना रोजा तोड़े वाला मानल जाला-- उमर फेरु पूछले कि एक दिन रोजा करे वाला लोग के का होई अवुरी एक दिन रोजा तोड़े वाला लोग के का होई?' उ जवाब देले: 'उहे दाऊद के रोजा 'अलैहिस सलाम' ह। उमर फेर पूछले कि एक दिन रोजा राखे वाला लोग के का होई अवुरी दु दिन तक रोजा तोड़े वाला लोग के का होई? उ जवाब देले कि, 'अगर अयीसन करे के ताकत दिहल जाए त हमरा खुशी होई'। तब रसुलुल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम कहले कि हर महीना तीन दिन के रोजा, रमजान से रमजान तक रोजा रखल उहे बा जवन पूरा साल के रोजा बा। अराफा के दिन रोजा करत घरी हम अल्लाह से भी निहोरा करतानी, ताकि रोजा से पहिले के साल अवुरी ओकरा बाद के साल भर के पाप मिटा सके। रहल बात 'आशुरा' के दिन रोजा के त हम अल्लाह से निहोरा करतानी कि इ रोजा पिछला साल के पाप मिटा सके'।