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Allah membenci kesombongan dan orang yang isbal
Imam Ibnu Majah : 3564حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ أَنْبَأَنَا شَرِيكٌ عَنْ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ عُمَيْرٍ عَنْ حُصَيْنِ بْنِ قَبِيصَةَ عَنْ الْمُغِيرَةِ بْنِ شُعْبَةَ قَالَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَا سُفْيَانَ بْنَ سَهْلٍ لَا تُسْبِلْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُسْبِلِينَ
हमरा सब के कहलक अछि [अबू बकर बिन अबू स्याइबा] हमरा सब के कहने अछि [यजीद बिन हारून] हमरा सब के [शरीक] के [अब्दुल मलिक बिन उमैर] स [हुशैन बिन काबीशाह] स [अल मुगिराह बिन शुअबाह] स कहलक अछि, ओ कहलनि, 'अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रसूलुल्लाह कहलनि: 'हे सुफियन बिन सहल, अपन लंबा नहि करू टखने स आगू सरोंग या पतलून, कियाकि अल्लाह ओहि लोक स घृणा करैत छथि जे अपन सरोंग या पतलून टखने स आगू बढ़ाबैत छथि'।