प्रतिनिधि हदीस
इमाम मलिक : 1305
حَدَّثَنِي مَالِك عَنْ زُرَيْقِ بْنِ حَكِيمٍ الْأَيْلِيِّأَنَّ رَجُلًا يُقَالُ لَهُ مِصْبَاحٌ اسْتَعَانَ ابْنًا لَهُ فَكَأَنَّهُ اسْتَبْطَأَهُ فَلَمَّا جَاءَهُ قَالَ لَهُ يَا زَانٍ قَالَ زُرَيْقٌ فَاسْتَعْدَانِي عَلَيْهِ فَلَمَّا أَرَدْتُ أَنْ أَجْلِدَهُ قَالَ ابْنُهُ وَاللَّهِ لَئِنْ جَلَدْتَهُ لَأَبُوءَنَّ عَلَى نَفْسِي بِالزِّنَا فَلَمَّا قَالَ ذَلِكَ أَشْكَلَ عَلَيَّ أَمْرُهُ فَكَتَبْتُ فِيهِ إِلَى عُمَرَ بْنِ عَبْدِ الْعَزِيزِ وَهُوَ الْوَالِي يَوْمَئِذٍ أَذْكُرُ لَهُ ذَلِكَ فَكَتَبَ إِلَيَّ عُمَرُ أَنْ أَجِزْ عَفْوَهُقَالَ زُرَيْقٌ وَكَتَبْتُ إِلَى عُمَرَ بْنِ عَبْدِ الْعَزِيزِ أَيْضًا أَرَأَيْتَ رَجُلًا افْتُرِيَ عَلَيْهِ أَوْ عَلَى أَبَوَيْهِ وَقَدْ هَلَكَا أَوْ أَحَدُهُمَا قَالَ فَكَتَبَ إِلَيَّ عُمَرُ إِنْ عَفَا فَأَجِزْ عَفْوَهُ فِي نَفْسِهِ وَإِنْ افْتُرِيَ عَلَى أَبَوَيْهِ وَقَدْ هَلَكَا أَوْ أَحَدُهُمَا فَخُذْ لَهُ بِكِتَابِ اللَّهِ إِلَّا أَنْ يُرِيدَ سِتْرًا
मलिक ने मुझे [ज़ुरीक बिन हकीम अल आइली] से बताया कि मिस्बाह नाम के एक आदमी ने अपने बेटे से मदद मांगी, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे उसका बेटा देर कर रहा हो। जब उसका बेटा आया तो उसने कहा, "तुम व्यभिचारी हो!" ज़ुरैक (कथावाचक) ने कहा; "उसके बेटे ने मुझसे (अपने पिता द्वारा उस पर लगाए गए आरोप के संबंध में) मदद मांगी। जब मैं उसके पिता को कोड़े मारने वाला था, तो उसके बेटे ने कहा: "अल्लाह की कसम, अगर आप उसे कोड़े मारेंगे, तो मैं व्यभिचार करना कबूल कर लूंगा।" जब उसने ऐसा कहा, तो मामला मेरे लिए और मुश्किल हो गया। तब मैंने उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ को एक पत्र लिखा जो उस समय खलीफ़ा थे। [उमर बिन अब्दुल अज़ीज़] ने फिर मुझे अपने बेटे की माफी उसके पिता को देने के लिए वापस लिखा।" ज़ुरैक ने कहा; "मैंने फिर उन्हें लिखा, 'आप क्या सोचते हैं कि एक आदमी या उसके दोनों माता-पिता पर व्यभिचार का आरोप लगाया जाए, जबकि उसके माता-पिता दोनों या उनमें से एक मर चुके हों? "अगर वह आदमी (आरोपी) आरोप लगाने वाले को माफ़ कर दे, तो वह जो माफ़ी दे, उसे स्वीकार कर लो। और अगर आरोपी उसके माता-पिता हैं, और दोनों या उनमें से एक की मौत हो गई है, तो अल्लाह की किताब के अनुसार फ़ैसला करो, जब तक कि वह इसे राज़ रखना न चाहे।"