प्रतिनिधि हदीस
इमाम अबू दाऊद : 3552
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ أَخْبَرَنَا هَمَّامٌ عَنْ قَتَادَةَ عَنْ مُطَرِّفٍ عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْصَنَعْتُ لِرَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بُرْدَةً سَوْدَاءَ فَلَبِسَهَا فَلَمَّا عَرَقَ فِيهَا وَجَدَ رِيحَ الصُّوفِ فَقَذَفَهَا قَالَ وَأَحْسِبُهُ قَالَ وَكَانَ تُعْجِبُهُ الرِّيحُ الطَّيِّبَةُ
हमें बताया है [मुहम्मद बिन कसीर] ने कहा, हमें बताया है [हम्माम] [क़तादा] से [मुतहरिफ़] से ['ऐस्याह रदलिल्लाहु अन्हा] ने कहा, "मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को एक काला शॉल बनाया, फिर उन्होंने इसे पहना। जब उन्हें पसीना आया, तो उन्हें ऊन (बकरी के बाल) की गंध महसूस हुई, इसलिए उन्होंने इसे फेंक दिया।" कथावाचक ने कहा, "मैंने सोचा कि उन्होंने (मुतर्रिफ़) कहा, "अल्लाह के रसूल को इत्र की गंध पसंद थी।"