प्रतिनिधि हदीस
इमाम बुखारी : 1005
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ قَالَ حَدَّثَنَا غُنْدَرٌ قَالَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ قَالَ سَمِعْتُ الْأَسْوَدَ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَقَرَأَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ النَّجْمَ بِمَكَّةَ فَسَجَدَ فِيهَا وَسَجَدَ مَنْ مَعَهُ غَيْرَ شَيْخٍ أَخَذَ كَفًّا مِنْ حَصًى أَوْ تُرَابٍ فَرَفَعَهُ إِلَى جَبْهَتِهِ وَقَالَ يَكْفِينِي هَذَا فَرَأَيْتُهُ بَعْدَ ذَلِكَ قُتِلَ كَافِرًا
मुहम्मद बिन बसिस्यार ने हमसे कहा, घुंदर ने हमसे कहा, स्यूबा ने हमसे कहा, अबू इसहाक ने कहा; मैंने अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु से अल-असवद को यह कहते सुना: "पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का में सूरह अन-नज्म पढ़ी। तो उन्होंने सजदा किया और उनके साथ जो लोग थे उन्होंने भी। जब तक कोई बूढ़ा आदमी न हो, वह बस मुट्ठी भर कंकड़ या मिट्टी लेकर अपने चेहरे पर लगाते थे, और कहते थे: "मेरे लिए यह काफी है"। बाद में मैंने उस व्यक्ति को अविश्वास में मारा हुआ देखा।"