प्रतिनिधि हदीस
इमाम बुखारी : 376
أَخْبَرَنَا الصَّلْتُ بْنُ مُحَمَّدٍ أَخْبَرَنَا مَهْدِيٌّ عَنْ وَاصِلٍ عَنْ أَبِي وَائِلٍ عَنْ حُذَيْفَةَرَأَى رَجُلًا لَا يُتِمُّ رُكُوعَهُ وَلَا سُجُودَهُ فَلَمَّا قَضَى صَلَاتَهُ قَالَ لَهُ حُذَيْفَةُ مَا صَلَّيْتَ قَالَ وَأَحْسِبُهُ قَالَ لَوْ مُتَّ مُتَّ عَلَى غَيْرِ سُنَّةِ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ
हमें [अश शाल्तू बिन मुहम्मद] ने [महदी] को [वशील] से [अबू वाइल] से [हुदज़ैफ़ा] से बताया है कि उन्होंने एक आदमी को देखा जो रुकू और सजदे में ठीक नहीं था। जब वह आदमी नमाज़ पढ़ चुका, तो हुदज़ैफ़ा ने उससे कहा, "तुमने अभी तक नमाज़ नहीं पढ़ी!" उस आदमी ने कहा, "मुझे लगता है कि इतना काफ़ी है।" हुदज़ैफ़ा ने फिर कहा, "अगर तुम मर भी गए, तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के मुताबिक नहीं मरोगे।"