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इस्लाम अल-हक़: क़ुरआन और हदीस
(सच्चा इस्लाम)



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कुल हदीस : 1
प्रतिनिधि हदीस
इमाम अबू दाऊद : 882

حَدَّثَنَا الْقَعْنَبِيُّ عَنْ مَالِكٍ عَنْ يَزِيدَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْهَادِ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِبْرَاهِيمَ عَنْ أَبِي سَلَمَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَيْرُ يَوْمٍ طَلَعَتْ فِيهِ الشَّمْسُ يَوْمُ الْجُمُعَةِ فِيهِ خُلِقَ آدَمُ وَفِيهِ أُهْبِطَ وَفِيهِ تِيبَ عَلَيْهِ وَفِيهِ مَاتَ وَفِيهِ تَقُومُ السَّاعَةُ وَمَا مِنْ دَابَّةٍ إِلَّا وَهِيَ مُسِيخَةٌ يَوْمَ الْجُمُعَةِ مِنْ حِينَ تُصْبِحُ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ شَفَقًا مِنْ السَّاعَةِ إِلَّا الْجِنَّ وَالْإِنْسَ وَفِيهِ سَاعَةٌ لَا يُصَادِفُهَا عَبْدٌ مُسْلِمٌ وَهُوَ يُصَلِّي يَسْأَلُ اللَّهَ حَاجَةً إِلَّا أَعْطَاهُ إِيَّاهَا قَالَ كَعْبٌ ذَلِكَ فِي كُلِّ سَنَةٍ يَوْمٌ فَقُلْتُ بَلْ فِي كُلِّ جُمُعَةٍ قَالَ فَقَرَأَ كَعْبٌ التَّوْرَاةَ فَقَالَ صَدَقَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَقَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ ثُمَّ لَقِيتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ سَلَامٍ فَحَدَّثْتُهُ بِمَجْلِسِي مَعَ كَعْبٍ فَقَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَلَامٍ قَدْ عَلِمْتُ أَيَّةَ سَاعَةٍ هِيَ قَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ فَقُلْتُ لَهُ فَأَخْبِرْنِي بِهَا فَقَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَلَامٍ هِيَ آخِرُ سَاعَةٍ مِنْ يَوْمِ الْجُمُعَةِ فَقُلْتُ كَيْفَ هِيَ آخِرُ سَاعَةٍ مِنْ يَوْمِ الْجُمُعَةِ وَقَدْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَا يُصَادِفُهَا عَبْدٌ مُسْلِمٌ وَهُوَ يُصَلِّي وَتِلْكَ السَّاعَةُ لَا يُصَلِّي فِيهَا فَقَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَلَامٍ أَلَمْ يَقُلْ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مَنْ جَلَسَ مَجْلِسًا يَنْتَظِرُ الصَّلَاةَ فَهُوَ فِي صَلَاةٍ حَتَّى يُصَلِّيَ قَالَ فَقُلْتُ بَلَى قَالَ هُوَ ذَاكَ

हमें [अल का'नबी] ने [मलिक] से [यज़ीद बिन अब्दुल्लाह बिन अल हद] से [मुहम्मद बिन इब्राहीम] से [अबू सलामा बिन अब्दुर्रहमान] से [अबू हुरैरा] से बताया है उन्होंने कहा; रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "सबसे अच्छा दिन जब सूरज उगता है वह शुक्रवार है, उस दिन आदम को बनाया गया था, उस दिन आदम को स्वर्ग से भेजा गया था, उस दिन उनकी पश्चाताप स्वीकार की गई थी, उस दिन उनकी मृत्यु हुई, उस दिन प्रलय आएगी और कोई भी रेंगने वाला जानवर नहीं है सिवाय जिन्न और इंसानों के, वे शुक्रवार को भोर से लेकर सूरज निकलने तक प्रलय के आने के डर से इंतजार करते हैं, शुक्रवार के दिन एक ऐसा समय होता है जब कोई भी मोमिन नमाज़ नहीं पढ़ता और अल्लाह से कुछ ऐसा नहीं मांगता जो उस समय के साथ मेल खाता हो, लेकिन अल्लाह उसे प्रदान करेगा।" तब का'ब ने कहा; 'क्या वर्ष का केवल एक दिन होता है?'। मैंने उत्तर दिया; 'वह समय भी हर शुक्रवार को होता है'। फिर का'ब ने तौरात पढ़ा। फिर कहा; रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सही थे, वह दिन हर शुक्रवार होता है। अबू हुरैरा ने कहा; "फिर मैं अब्दुल्लाह बिन सलाम से मिला, फिर मैंने उन्हें अपनी मजलिस में कअब के साथ हुई घटना के बारे में बताया।" तो [अब्दुल्ला बिन सलाम] ने कहा; "सच में मुझे तब पता चला।" अबू हुरैरा ने कहा; "तो मुझे बताओ।" अब्दुल्लाह बिन सलाम ने जवाब दिया; "यह आखिरी बार शुक्रवार को था।" मैंने कहा; "यह शुक्रवार के आखिर में कैसे हो सकता है? भले ही रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "और यह कोई मुस्लिम बंदा नहीं है जो उस समय नमाज़ पढ़ता है, और वह नमाज़ नहीं पढ़ता..." तो अब्दुल्लाह बिन सलाम ने कहा; "क्या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह नहीं कहा: "जो कोई नमाज़ के लिए इंतज़ार करने के लिए जमा होता है, तो वह तब तक नमाज़ में गिना जाता है जब तक वह असल में नमाज़ नहीं पढ़ लेता।" अबू हुरैरा ने कहा; मैंने जवाब दिया; "सही।" अब्दुल्लाह बिन सलाम ने कहा; "यही समय है।"

समर्थक हदीस :

इमाम अहमद : 8840, 9041, 9912, 10141, 10233, 10305, 10547, 15575
इमाम मुस्लिम : 1410, 1411
इमाम अबू दाऊद : 882, 883, 1308
इमाम तिर्मिदज़ी : 450, 453
इमाम नसाई : 1356, 1357, 1413
इमाम इब्नु माजा : 1075, 1626
इमाम मलिक : 222
इमाम दरिमी : 1526