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Shalat wajib maghrib tiga rakaat, diampuni dosanya diantara maghrib dan ashar
Imam Ahmad : 483حَدَّثَنَا أَبُو عَبْدِ الرَّحْمَنِ الْمُقْرِئُ حَدَّثَنَا حَيْوَةُ أَنْبَأَنَا أَبُو عَقِيلٍ أَنَّهُ سَمِعَ الْحَارِثَ مَوْلَى عُثْمَانَ يَقُولُ جَلَسَ عُثْمَانُ يَوْمًا وَجَلَسْنَا مَعَهُ فَجَاءَهُ الْمُؤَذِّنُ فَدَعَا بِمَاءٍ فِي إِنَاءٍ أَظُنُّهُ سَيَكُونُ فِيهِ مُدٌّ فَتَوَضَّأَ ثُمَّ قَالَ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَتَوَضَّأُ وُضُوئِي هَذَا ثُمَّ قَالَ وَمَنْ تَوَضَّأَ وُضُوئِي ثُمَّ قَامَ فَصَلَّى صَلَاةَ الظُّهْرِ غُفِرَ لَهُ مَا كَانَ بَيْنَهَا وَبَيْنَ الصُّبْحِ ثُمَّ صَلَّى الْعَصْرَ غُفِرَ لَهُ مَا بَيْنَهَا وَبَيْنَ صَلَاةِ الظُّهْرِ ثُمَّ صَلَّى الْمَغْرِبَ غُفِرَ لَهُ مَا بَيْنَهَا وَبَيْنَ صَلَاةِ الْعَصْرِ ثُمَّ صَلَّى الْعِشَاءَ غُفِرَ لَهُ مَا بَيْنَهَا وَبَيْنَ صَلَاةِ الْمَغْرِبِ ثُمَّ لَعَلَّهُ أَنْ يَبِيتَ يَتَمَرَّغُ لَيْلَتَهُ ثُمَّ إِنْ قَامَ فَتَوَضَّأَ وَصَلَّى الصُّبْحَ غُفِرَ لَهُ مَا بَيْنَهَا وَبَيْنَ صَلَاةِ الْعِشَاءِ وَهُنَّ الْحَسَنَاتُ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ قَالُوا هَذِهِ الْحَسَنَاتُ فَمَا الْبَاقِيَاتُ يَا عُثْمَانُ قَالَ هُنَّ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَالْحَمْدُ لِلَّهِ وَاللَّهُ أَكْبَرُ وَلَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ
हमरा सब के कहलक अछि [अबू अब्दुररहमान अल मुकरी'] हमरा सब के कहलक अछि [हैवा] हमरा सब के [अबू अकील] के कहने अछि जे ओ [अल हरिथ] के उस्मान के पूर्व दास के कहैत सुनने छल; एक दिन [उस्मान] बैसलाह आ हम सब हुनका संग बैसल रही, तखन एकटा मुअजीन आबि एकटा बर्तन मे वज़ूदक पानि अनलनि, हमरा लागल जे ई एकटा थाल अछि, तखन ओ वजूद केलनि आ कहलनि; 'हम अल्लाह के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के एहि वज़ूद के तरह वज़ूद करैत देखलहुं आ ओ कहलनि जे, जे कियो हमर वज़ूद जेकां वज़ूद करत, फेर मध्याह्न के नमाज करय लेल ठाढ़ भ जायत, ओकर पाप - जे कयल गेल अछि - मध्याह्न आ फजर के बीच माफ भ जायत, फेर असर के नमाज करब, ओकर पाप असर आ मध्याह्न के नमाज के बीच माफ भ जायत, फेर मगरीब करत नमाज, बेशक मगरीब आ अस्र नमाज के बीच ओकर पाप माफ भ जायत, तखन ईशा नमाज करब, ईशा आ मगरीब के बीच ओकर पाप अवश्य माफ भ जायत, आ शायद राति में जागल रहत, जौं ओ जागि क वजूद करी आ फेर फजर नमाज करी त फजर आ ईशा नमाज के बीच ओकर पाप निश्चित रूप स माफ भ जायत, यानी अल हसनात अछि - बहुत रास नीक काज - जे मेटा देत As sayyi'at - बहुत पाप -, ' मित्र लोकनि पुछलनि; 'जँ ई अल हसनत अछि तखन अल बकियात हे उस्मान की अछि ?' ओ उत्तर देलथिन; 'ओ सब वाक्य अछि ला इलाहा इल्लाह -अल्लाह के अलावा कोनो देवता नै छै-, सुब्हानल्लाह -अल्लाह के महिमा-, अल हमदुलिल्लाह -सब स्तुति अल्लाह के हो-, अल्लाह अकबर -अल्लाह सबस पैघ छैथ- आ वाला हौला वाला कुव्वाता इल्ला बिल्लाह -अल्लाह के सिवाय कोनो शक्ति आ प्रयास नै छै-।'