इमाम मलिक : 1
قَالَ حَدَّثَنِي اللَّيْثِيّ عَنْ مَالِك بْن أَنَس عَنْ ابْنِ شِهَابٍ أَنَّ عُمَرَ بْنَ عَبْدِ الْعَزِيزِ أَخَّرَ الصَّلَاةَ يَوْمًا فَدَخَلَ عَلَيْهِ عُرْوَةُ بْنُ الزُّبَيْرِ فَأَخْبَرَهُ أَنَّ الْمُغِيرَةَ بْنَ شُعْبَةَ أَخَّرَ الصَّلَاةَ يَوْمًا وَهُوَ بِالْكُوفَةِ فَدَخَلَ عَلَيْهِ أَبُو مَسْعُودٍ الْأَنْصَارِيُّ فَقَالَمَا هَذَا يَا مُغِيرَةُ أَلَيْسَ قَدْ عَلِمْتَ أَنَّ جِبْرِيلَ نَزَلَ فَصَلَّى فَصَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثُمَّ صَلَّى فَصَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثُمَّ صَلَّى فَصَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثُمَّ صَلَّى فَصَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثُمَّ صَلَّى فَصَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثُمَّ قَالَ بِهَذَا أُمِرْتُ فَقَالَ عُمَرُ بْنُ عَبْدِ الْعَزِيزِ اعْلَمْ مَا تُحَدِّثُ بِهِ يَا عُرْوَةُ أَوَ إِنَّ جِبْرِيلَ هُوَ الَّذِي أَقَامَ لِرَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَقْتَ الصَّلَاةِقَالَ عُرْوَةُ كَذَلِكَ كَانَ بَشِيرُ بْنُ أَبِي مَسْعُودٍ الْأَنْصَارِيُّ يُحَدِّثُ عَنْ أَبِيهِ قَالَ عُرْوَةُ وَلَقَدْ حَدَّثَتْنِي عَائِشَةُ زَوْجُ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يُصَلِّي الْعَصْرَ وَالشَّمْسُ فِي حُجْرَتِهَا قَبْلَ أَنْ تَظْهَرَ
कथावाचक ने कहा; मुझे मलिक बिन अनस से [इब्न शिहाब] से अल लैत्सी सुनाई है; एक दिन उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने अपनी नमाज़ समाप्त की, उरवाह बिन अज़ ज़ुबैर उनसे मिले और उन्हें बताया कि एक दिन मुगीरा बिन स्यूबा ने अपनी नमाज़ समाप्त की जब वह कूफ़ा में थे, तो इब्नु मसूद उनसे मिले और उन्हें फटकार लगाई; "तुम्हारा क्या मतलब है, ऐ मुगीरा? क्या तुम्हें नहीं पता, जिब्रील नीचे आए और नमाज़ पढ़ी और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ में शामिल हुए, फिर उन्होंने नमाज़ पढ़ी और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ में शामिल हुए, फिर उन्होंने नमाज़ पढ़ी और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी नमाज़ में शामिल हुए, फिर उन्होंने नमाज़ पढ़ी और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ में शामिल हुए। तब जिब्रील ने कहा; "मुझे भी ऐसा ही आदेश दिया गया था," फिर उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने पूछा, "जो तुम बताते हो, उस पर ध्यान दो, ऐ उरवाह! क्या यह जिब्रील थे जिन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को नमाज़ का समय सिखाया था?" [उरवाह] ने उत्तर दिया; "[बसीर बिन मसूद अल अंसारी] ने [अपने पिता] से यही बात बताई।" फिर [उरवाह] ने पुष्टि की; और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पत्नी [आयशा] ने मुझे बताया कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अस्र की नमाज़ तब पढ़ी जब सूरज अभी भी अपनी जगह पर था और अभी तक निकला नहीं था।
इमाम मलिक : 2
و حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍأَنَّهُ قَالَ جَاءَ رَجُلٌ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَسَأَلَهُ عَنْ وَقْتِ صَلَاةِ الصُّبْحِ قَالَ فَسَكَتَ عَنْهُ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ حَتَّى إِذَا كَانَ مِنْ الْغَدِ صَلَّى الصُّبْحَ حِينَ طَلَعَ الْفَجْرُ ثُمَّ صَلَّى الصُّبْحَ مِنْ الْغَدِ بَعْدَ أَنْ أَسْفَرَ ثُمَّ قَالَ أَيْنَ السَّائِلُ عَنْ وَقْتِ الصَّلَاةِ قَالَ هَأَنَذَا يَا رَسُولَ اللَّهِ فَقَالَ مَا بَيْنَ هَذَيْنِ وَقْتٌ
मुझे याह्या ने मालिक से [ज़ैद बिन असलम] से ['अथो` बिन यासर] से बताया है, उन्होंने कहा; एक आदमी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आया और सुबह की नमाज़ का समय पूछा। ('अथो` बिन यासर) ने कहा; तब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम चुप रहे, अगले दिन जब सुबह हुई तो उन्होंने सुबह की नमाज़ पढ़ी, अगले दिन उन्होंने तब नमाज़ पढ़ी जब आसमान पीला हो गया था। फिर (रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पूछा: "वह आदमी कहाँ है जिसने मुझसे सुबह की नमाज़ का समय पूछा था?" (उस आदमी ने) जवाब दिया; "मैं, अल्लाह के रसूल," उन्होंने कहा: "सुबह की नमाज़ का समय इन दो समयों के बीच है।"
इमाम मलिक : 3
و حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ عَنْ عَمْرَةَ بِنْتِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ عَائِشَةَ زَوْجِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهَا قَالَتْإِنْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَيُصَلِّي الصُّبْحَ فَيَنْصَرِفُ النِّسَاءُ مُتَلَفِّعَاتٍ بِمُرُوطِهِنَّ مَا يُعْرَفْنَ مِنْ الْغَلَسِ
मुझे याह्या ने मलिक से [याह्या बिन सईद] से [अमरा बिन्त अब्दुर्रहमान] से [ऐस्या] पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पत्नी से बताया है; "जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सुबह की नमाज़ खत्म की, तो औरतें अपने कपड़ों से ढकी हुई बाहर आईं, और अंधेरा होने के कारण उनकी पहचान अभी भी नहीं हो पा रही थी।"
इमाम मलिक : 4
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ وَعَنْ بُسْرِ بْنِ سَعِيدٍ وَعَنْ الْأَعْرَجِ كُلُّهُمْ يُحَدِّثُونَهُ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ مَنْ أَدْرَكَ رَكْعَةً مِنْ الصُّبْحِ قَبْلَ أَنْ تَطْلُعَ الشَّمْسُ فَقَدْ أَدْرَكَ الصُّبْحَ وَمَنْ أَدْرَكَ رَكْعَةً مِنْ الْعَصْرِ قَبْلَ أَنْ تَغْرُبَ الشَّمْسُ فَقَدْ أَدْرَكَ الْعَصْرَ
मालिक से मुझे बताकर [ज़ैद बिन असलम] से [अथो बिन यासर], [बुसर बिन सईद] और [अल अरज], उन सभी ने इसे [अबू हुरैरा] से बताया, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "जिसने सूरज उगने से पहले सुबह की नमाज़ की एक रकाअत पढ़ी, उसने सुबह की नमाज़ पढ़ ली। जिसने सूरज डूबने से पहले अस्र की नमाज़ की एक रकाअत पढ़ी, उसने अस्र की नमाज़ पढ़ ली।"
इमाम मलिक : 5
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ مَوْلَى عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَأَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ كَتَبَ إِلَى عُمَّالِهِ إِنَّ أَهَمَّ أَمْرِكُمْ عِنْدِي الصَّلَاةُ فَمَنْ حَفِظَهَا وَحَافَظَ عَلَيْهَا حَفِظَ دِينَهُ وَمَنْ ضَيَّعَهَا فَهُوَ لِمَا سِوَاهَا أَضْيَعُ ثُمَّ كَتَبَ أَنْ صَلُّوا الظُّهْرَ إِذَا كَانَ الْفَيْءُ ذِرَاعًا إِلَى أَنْ يَكُونَ ظِلُّ أَحَدِكُمْ مِثْلَهُ وَالْعَصْرَ وَالشَّمْسُ مُرْتَفِعَةٌ بَيْضَاءُ نَقِيَّةٌ قَدْرَ مَا يَسِيرُ الرَّاكِبُ فَرْسَخَيْنِ أَوْ ثَلَاثَةً قَبْلَ غُرُوبِ الشَّمْسِ وَالْمَغْرِبَ إِذَا غَرَبَتْ الشَّمْسُ وَالْعِشَاءَ إِذَا غَابَ الشَّفَقُ إِلَى ثُلُثِ اللَّيْلِ فَمَنْ نَامَ فَلَا نَامَتْ عَيْنُهُ فَمَنْ نَامَ فَلَا نَامَتْ عَيْنُهُ فَمَنْ نَامَ فَلَا نَامَتْ عَيْنُهُ وَالصُّبْحَ وَالنُّجُومُ بَادِيَةٌ مُشْتَبِكَةٌ
मलिक ने मुझे अब्दुल्लाह बिन उमर के पुराने गुलाम नफी से बताया है; उमर बिन खत्ताब ने एक बार अपने नौकरों को एक चिट्ठी लिखी, "मेरी राय में तुम्हारे कामों में सबसे ज़रूरी नमाज़ है। जो कोई इसकी हिफ़ाज़त करता है और इसे बनाए रखता है, उसने अपने दीन की हिफ़ाज़त की है। जो कोई इसे नज़रअंदाज़ करता है, तो दूसरे काम और भी ज़्यादा नज़रअंदाज़ हो जाएँगे," फिर उन्होंने लिखा; "तुम ज़ुहर की नमाज़ तब पढ़ो जब तुम्हारी परछाई एक हाथ की हो, यहाँ तक कि तुम्हारी परछाई ठीक तुम्हारे शरीर के बराबर हो जाए। तुम्हें अस्र की नमाज़ तब पढ़नी चाहिए जब सूरज डूब रहा हो और सूरज डूबने से लगभग दो या तीन फरसख पहले सूरज की रोशनी साफ़ और सफ़ेद हो। मग़रिब की नमाज़ सूरज डूबने पर पढ़ो, और इशा की नमाज़ तब पढ़ो जब सूरज डूबने के बाद आसमान में लाल रोशनी (शाम का सूरज डूबने के बाद) गायब हो जाए, रात के एक तिहाई हिस्से तक। जो सोता है, उसकी आँखें नहीं सोतीं, और जो सोता है, उसकी आँखें नहीं सोतीं। और सुबह की नमाज़ तब पढ़ो जब तारे आपस में मिले हुए लगें।"
इमाम मलिक : 6
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ عَمِّهِ أَبِي سُهَيْلٍ عَنْ أَبِيهِأَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ كَتَبَ إِلَى أَبِي مُوسَى أَنْ صَلِّ الظُّهْرَ إِذَا زَاغَتْ الشَّمْسُ وَالْعَصْرَ وَالشَّمْسُ بَيْضَاءُ نَقِيَّةٌ قَبْلَ أَنْ يَدْخُلَهَا صُفْرَةٌ وَالْمَغْرِبَ إِذَا غَرَبَتْ الشَّمْسُ وَأَخِّرْ الْعِشَاءَ مَا لَمْ تَنَمْ وَصَلِّ الصُّبْحَ وَالنُّجُومُ بَادِيَةٌ مُشْتَبِكَةٌ وَاقْرَأْ فِيهَا بِسُورَتَيْنِ طَوِيلَتَيْنِ مِنْ الْمُفَصَّلِ
मलिक ने मुझे उनके चाचा - [अबू सुहैल] - [उनके पिता] से बताया कि [उमर बिन अल खत्ताब] ने अबू मूसा अल असियारी को लिखा: ज़ुहर की नमाज़ तब पढ़ो जब सूरज डूब जाए और अस्र की नमाज़ तब पढ़ो जब सूरज पीला होने से पहले साफ़ सफ़ेद दिखे। मग़रिब की नमाज़ तब पढ़ो जब सूरज डूब जाए, और जब तुम जाग रहे हो तो इशा की नमाज़ पूरी करो, और फ़ज्र की नमाज़ तब पढ़ो जब तारे एक लाइन में लगें, और उसमें दो लंबी सूरह पढ़ो जो अल मुफ़स्सल की सूरह की कैटेगरी में आती हैं (वो सूरह जो सूरह अल हुजुरात से शुरू होकर आखिर तक जाती हैं)।
इमाम मलिक : 7
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ عَنْ أَبِيهِأَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ كَتَبَ إِلَى أَبِي مُوسَى الْأَشْعَرِيِّ أَنْ صَلِّ الْعَصْرَ وَالشَّمْسُ بَيْضَاءُ نَقِيَّةٌ قَدْرَ مَا يَسِيرُ الرَّاكِبُ ثَلَاثَةَ فَرَاسِخَ وَأَنْ صَلِّ الْعِشَاءَ مَا بَيْنَكَ وَبَيْنَ ثُلُثِ اللَّيْلِ فَإِنْ أَخَّرْتَ فَإِلَى شَطْرِ اللَّيْلِ وَلَا تَكُنْ مِنْ الْغَافِلِينَ
मुझे मालिक [हिस्याम बिन उरवाह] ने [अपने पिता] से बताया था; [उमर बिन अल खत्ताब] ने एक बार अबू मूसा अल असीरी को लिखा था, कि अस्र की नमाज़ तब पढ़ो जब सूरज तीन फरसख की दूरी पर साफ़ सफ़ेद दिखे, और इशा की नमाज़ आपस में रात के एक तिहाई हिस्से में पढ़ो, अगर तुम इसे खत्म करना चाहते हो तो आधी रात में पढ़ो और लापरवाही करने वालों में से मत बनो।
इमाम मलिक : 8
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ يَزِيدَ بْنِ زِيَادٍ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ رَافِعٍ مَوْلَى أُمِّ سَلَمَةَ زَوْجِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَأَنَّهُ سَأَلَ أَبَا هُرَيْرَةَ عَنْ وَقْتِ الصَّلَاةِ فَقَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ أَنَا أُخْبِرُكَ صَلِّ الظُّهْرَ إِذَا كَانَ ظِلُّكَ مِثْلَكَ وَالْعَصْرَ إِذَا كَانَ ظِلُّكَ مِثْلَيْكَ وَالْمَغْرِبَ إِذَا غَرَبَتْ الشَّمْسُ وَالْعِشَاءَ مَا بَيْنَكَ وَبَيْنَ ثُلُثِ اللَّيْلِ وَصَلِّ الصُّبْحَ بِغَبَشٍ يَعْنِي الْغَلَسَ
मलिक [यज़ीद बिन ज़ियाद] ने मुझे बताया था कि [अब्दुल्ला बिन रफ़ी] के पुराने गुलाम उम्म सलमा, जो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पत्नी थीं, ने अबू हुरैरा से नमाज़ के समय के बारे में पूछा। तो [अबू हुरैरा] ने कहा; मैं तुम्हें समझाता हूँ, (यानी;) दोपहर की नमाज़ तब पढ़ो जब तुम्हारी परछाई तुम्हारी ऊँचाई के बराबर हो, और अस्र की नमाज़ तब पढ़ो जब तुम्हारी परछाई दोगुनी हो, मग़रिब की नमाज़ तब पढ़ो जब सूरज डूब जाए और इशा की नमाज़ तुम्हारे और रात के एक तिहाई हिस्से के बीच हो। और सुबह की नमाज़ रात के आखिर में तब पढ़ो जब अंधेरा हो।
इमाम मलिक : 9
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ إِسْحَقَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ أَنَّهُ قَالَ كُنَّا نُصَلِّي الْعَصْرَ ثُمَّ يَخْرُجُ الْإِنْسَانُ إِلَى بَنِي عَمْرِو بْنِ عَوْفٍ فَيَجِدُهُمْ يُصَلُّونَ الْعَصْرَ
मुझे मलिक [इस्हाक बिन अब्दुल्लाह बिन अबू तलहा] से [अनस बिन मलिक] ने बताया कि उन्होंने कहा, "हम अस्र की नमाज़ पढ़ रहे थे, फिर एक आदमी बनी अम्र बिन औफ़ के पास गया, और उसने उन्हें अभी भी अस्र की नमाज़ पढ़ते हुए पाया।"
इमाम मलिक : 10
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ أَنَّهُ قَالَكُنَّا نُصَلِّي الْعَصْرَ ثُمَّ يَذْهَبُ الذَّاهِبُ إِلَى قُبَاءٍ فَيَأْتِيهِمْ وَالشَّمْسُ مُرْتَفِعَةٌ
मुझे मलिक [इब्न सैय्यब] से [अनस बिन मलिक] ने बताया कि उन्होंने कहा; "हमने दोपहर की नमाज़ पढ़ी, फिर हम में से एक कुबा गया, और जब हम वहाँ पहुँचे तो सूरज अभी भी ऊँचा था।"
इमाम मलिक : 11
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ رَبِيعَةَ بْنِ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ الْقَاسِمِ بْنِ مُحَمَّدٍ أَنَّهُ قَالَمَا أَدْرَكْتُ النَّاسَ إِلَّا وَهُمْ يُصَلُّونَ الظُّهْرَ بِعَشِيٍّ
मुझे मलिक (रबीअह बिन अबू अब्दुर्रहमान) से (अल कासिम बिन मुहम्मद) रिवायत है, उन्होंने कहा; "मैंने लोगों को ऐसा नहीं पाया जो असी के समय ज़ुहर की नमाज़ पढ़ रहे हों।"
इमाम मलिक : 12
حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ عَمِّهِ أَبِي سُهَيْلِ بْنِ مَالِكٍ عَنْ أَبِيهِ أَنَّهُ قَالَكُنْتُ أَرَى طِنْفِسَةً لِعَقِيلِ بْنِ أَبِي طَالِبٍ يَوْمَ الْجُمُعَةِ تُطْرَحُ إِلَى جِدَارِ الْمَسْجِدِ الْغَرْبِيِّ فَإِذَا غَشِيَ الطِّنْفِسَةَ كُلَّهَا ظِلُّ الْجِدَارِ خَرَجَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ وَصَلَّى الْجُمُعَةَقَالَ مَالِكٌ ثُمَّ نَرْجِعُ بَعْدَ صَلَاةِ الْجُمُعَةِ فَنَقِيلُ قَائِلَةَ الضَّحَاءِ
मलिक ने मुझे अपने चाचा - [अबू सुहैल बिन मलिक] - [अपने पिता] से याह्या के बारे में बताया था, उन्होंने कहा; "मैंने शुक्रवार को मस्जिद की पश्चिमी दीवार पर उकैल बिन अबू तालिब का एक कालीन रखा देखा, तो जब कालीन की छाया ने पूरे कालीन को ढक लिया, तो [उमर बिन अल खत्ताब] बाहर आए और शुक्रवार की नमाज़ पढ़ी।" मलिक ने कहा; "फिर हम शुक्रवार की नमाज़ के बाद घर चले गए और दोपहर में क़ैलुलाह सो गए।"
इमाम मलिक : 13
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ عَمْرِو بْنِ يَحْيَى الْمَازِنِيِّ عَنْ ابْنِ أَبِي سَلِيطٍ أَنَّ عُثْمَانَ بْنَ عَفَّانَصَلَّى الْجُمُعَةَ بِالْمَدِينَةِ وَصَلَّى الْعَصْرَ بِمَلَلٍقَالَ مَالِك وَذَلِكَ لِلتَّهْجِيرِ وَسُرْعَةِ السَّيْرِ
मुझे मालिक [अमरू बिन यह्या अल मजीनी] से [इब्न अबू सलीथ] से रिवायत है कि [उथमान बिन अफ्फान] ने मदीना में जुमे की नमाज़ और मलाल में अस्र की नमाज़ पढ़ी, ताकि जुमे की नमाज़ जल्दी हो सके और सफ़र भी तेज़ हो सके।
इमाम मलिक : 14
حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ أَبِي سَلَمَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ مَنْ أَدْرَكَ رَكْعَةً مِنْ الصَّلَاةِ فَقَدْ أَدْرَكَ الصَّلَاةَ
याह्या ने मुझे मलिक से [इब्न शिहाब] से [अबू सलामा बिन अब्दुर्रहमान] से [अबू हुरैरा] से बताया है कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "जिसने एक रकअत नमाज़ पढ़ी, तो उसने वह नमाज़ पा ली।"
इमाम मलिक : 15
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ كَانَ يَقُولُإِذَا فَاتَتْكَ الرَّكْعَةُ فَقَدْ فَاتَتْكَ السَّجْدَةُ
मुझे मालिक (नफी) से [अब्दुल्ला बिन उमर बिन खताब] ने बताया है कि अगर तुम रुकू करना भूल गए तो तुमने एक रकअत छोड़ दी।
इमाम मलिक : 16
حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ كَانَ يَقُولُدُلُوكُ الشَّمْسِ مَيْلُهَا
याह्या ने मुझे मलिक (नफी) से बताया, (अब्दुल्ला बिन उमर) ने कहा; "'दुलुकुस स्यामसी' (सूरज का खिसकना) का मतलब है उसका खिसकना।"
इमाम मलिक : 17
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ دَاوُدَ بْنِ الْحُصَيْنِ قَالَ أَخْبَرَنِي مُخْبِرٌ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عَبَّاسٍ كَانَ يَقُولُدُلُوكُ الشَّمْسِ إِذَا فَاءَ الْفَيْءُ وَغَسَقُ اللَّيْلِ اجْتِمَاعُ اللَّيْلِ وَظُلْمَتُهُ
मलिक ने मुझे बताया कि [दाऊद बिन अल हुसैन] ने कहा कि किसी ने मुझे बताया कि [अब्दुल्ला बिन अब्बास] ने कहा; "'दुलुकुस स्यामसी (सूरज का बदलना)' का मतलब है जब परछाईं आ गई हो। 'ग़ासकुल लैल (रात का अंधेरा)' वह रात है जो शांत और अंधेरी हो गई हो।"
इमाम मलिक : 18
حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ الَّذِي تَفُوتُهُ صَلَاةُ الْعَصْرِ كَأَنَّمَا وُتِرَ أَهْلَهُ وَمَالَهُ
मुझे बताया गया है कि याह्या (मालिक) से (नफी) से (अब्दुल्ला बिन उमर) रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कहा: "जो व्यक्ति अस्र की प्रार्थना को छोड़ देता है वह उस व्यक्ति की तरह है जो अपने परिवार और संपत्ति को खो देता है।"
इमाम मलिक : 19
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍأَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ انْصَرَفَ مِنْ صَلَاةِ الْعَصْرِ فَلَقِيَ رَجُلًا لَمْ يَشْهَدْ الْعَصْرَ فَقَالَ عُمَرُ مَا حَبَسَكَ عَنْ صَلَاةِ الْعَصْرِ فَذَكَرَ لَهُ الرَّجُلُ عُذْرًا فَقَالَ عُمَرُ طَفَّفْتَقَالَ يَحْيَى قَالَ مَالِك وَيُقَالُ لِكُلِّ شَيْءٍ وَفَاءٌ وَتَطْفِيفٌ
मलिक ने मुझे बताया कि [याह्या बिन सईद], [उमर बिन अल खत्ताब] के अस्र की नमाज़ खत्म करने के बाद, उन्हें एक आदमी मिला जो अस्र की नमाज़ में शामिल नहीं हुआ था, और उन्होंने उससे पूछा: "तुम्हें अस्र की नमाज़ में शामिल होने से किस बात ने रोका?" तब उस आदमी ने उन्हें वजह बताई, तो उमर ने कहा: "तुमने अपना इनाम कम कर दिया है।" मलिक ने कहा: "सब कुछ पूरा और अधूरा है।"
इमाम मलिक : 20
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ أَنَّهُ كَانَ يَقُولُإِنَّ الْمُصَلِّيَ لَيُصَلِّي الصَّلَاةَ وَمَا فَاتَهُ وَقْتُهَا وَلَمَا فَاتَهُ مِنْ وَقْتِهَا أَعْظَمُ أَوْ أَفْضَلُ مِنْ أَهْلِهِ وَمَالِهِ
मलिक ने मुझे बताया कि [याह्या बिन सईद] ने कहा: "जो व्यक्ति नमाज़ पढ़ता है वह अपना समय बर्बाद नहीं करता है। अगर उसका समय नमाज़ की वजह से बर्बाद होता है, तो यह उसके परिवार और धन को खोने से बेहतर है।"