इमाम मलिक : 1581
حَدَّثَنِي مَالِك عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ عَنْ أَبِي الْحُبَابِ سَعِيدِ بْنِ يَسَارٍأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ مَنْ تَصَدَّقَ بِصَدَقَةٍ مِنْ كَسْبٍ طَيِّبٍ وَلَا يَقْبَلُ اللَّهُ إِلَّا طَيِّبًا كَانَ إِنَّمَا يَضَعُهَا فِي كَفِّ الرَّحْمَنِ يُرَبِّيهَا كَمَا يُرَبِّي أَحَدُكُمْ فَلُوَّهُ أَوْ فَصِيلَهُ حَتَّى تَكُونَ مِثْلَ الْجَبَلِ
मलिक ने मुझे [याह्या बिन सईद] से [अबू अल हुबाब सईद बिन यासर] से बताया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "जो कोई अच्छी कोशिशों से दान देता है, और अल्लाह केवल अच्छी चीज़ों को स्वीकार करता है। निश्चित रूप से, उसने इसे सबसे दयालु की हथेलियों में रखा है। अल्लाह उसका ख्याल रखेगा जैसे तुम में से कोई अपने बच्चे या ऊँट के बछड़े का ख्याल रखता है, जब तक कि (दान) एक पहाड़ जैसा न हो जाए।"
इमाम मलिक : 1582
و حَدَّثَنِي مَالِك عَنْ إِسْحَقَ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي طَلْحَةَ أَنَّهُ سَمِعَ أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ يَقُولُكَانَ أَبُو طَلْحَةَ أَكْثَرَ أَنْصَارِيٍّ بِالْمَدِينَةِ مَالًا مِنْ نَخْلٍ وَكَانَ أَحَبَّ أَمْوَالِهِ إِلَيْهِ بَيْرُحَاءَ وَكَانَتْ مُسْتَقْبِلَةَ الْمَسْجِدِ وَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَدْخُلُهَا وَيَشْرَبُ مِنْ مَاءٍ فِيهَا طَيِّبٍ قَالَ أَنَسٌ فَلَمَّا أُنْزِلَتْ هَذِهِ الْآيَةُ{ لَنْ تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّى تُنْفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ }قَامَ أَبُو طَلْحَةَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ تَبَارَكَ وَتَعَالَى يَقُولُ{ لَنْ تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّى تُنْفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ }وَإِنَّ أَحَبَّ أَمْوَالِي إِلَيَّ بَيْرُحَاءَ وَإِنَّهَا صَدَقَةٌ لِلَّهِ أَرْجُو بِرَّهَا وَذُخْرَهَا عِنْدَ اللَّهِ فَضَعْهَا يَا رَسُولَ اللَّهِ حَيْثُ شِئْتَ قَالَ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بَخْ ذَلِكَ مَالٌ رَابِحٌ ذَلِكَ مَالٌ رَابِحٌ وَقَدْ سَمِعْتُ مَا قُلْتَ فِيهِ وَإِنِّي أَرَى أَنْ تَجْعَلَهَا فِي الْأَقْرَبِينَ فَقَالَ أَبُو طَلْحَةَ أَفْعَلُ يَا رَسُولَ اللَّهِ فَقَسَمَهَا أَبُو طَلْحَةَ فِي أَقَارِبِهِ وَبَنِي عَمِّهِ
मलिक ने मुझे [इस्हाक बिन अब्दुल्लाह बिन अबू तल्हा] से बताया कि उन्होंने [अनस बिन मलिक] को यह कहते सुना, "अबू तल्हा वह अंसार था जिसके पास मदीना में खजूर के रूप में सबसे ज़्यादा दौलत थी। उसे सबसे ज़्यादा पसंद आने वाला खज़ाना बैरुहा था जो मस्जिद के सामने था। पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसमें जाते थे और उसका साफ़ पानी पीते थे।" अनस ने कहा; "जब यह आयत आई: '(तुम्हें कभी भी (पूरी) अच्छाई नहीं मिलेगी जब तक तुम अपनी पसंद की दौलत में से कुछ खर्च नहीं करोगे)।' (Qs. अली इमरान: 92) अबू तल्हा रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने खड़े हुए और फिर कहा; 'ऐ अल्लाह के रसूल, अल्लाह तबारक व तआला ने कहा: '(तुम्हें कभी भी अच्छा (परफेक्ट) नहीं मिलेगा जब तक तुम अपनी पसंद की दौलत में से कुछ दे न दो)', सच में जो खज़ाना मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है वह बैरुहा है, मैंने यह बाग अल्लाह के लिए दिया है, मुझे इसकी अच्छाई और अल्लाह के पास इसके जमा होने की उम्मीद है। ऐ अल्लाह के रसूल, इस दौलत का अपनी मर्ज़ी से इस्तेमाल करो।" अनस ने कहा, "फिर रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "बहुत बढ़िया...! यह एक फ़ायदेमंद खज़ाना है, यह एक फ़ायदेमंद खज़ाना है। मैंने सुना है कि तुमने क्या कहा। मुझे लगता है कि तुम्हें इसे किसी करीबी रिश्तेदार को दे देना चाहिए।" तो अबू तल्हा ने कहा, "ऐ अल्लाह के रसूल, मैं यह करूँगा।" फिर उसने इसे अपने चाचा के परिवार और बच्चों में बाँट दिया।"
इमाम मलिक : 1583
و حَدَّثَنِي مَالِك عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ أَعْطُوا السَّائِلَ وَإِنْ جَاءَ عَلَى فَرَسٍ
मलिक ने मुझे [ज़ैद बिन असलम] से बताया कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा: "जो मांगे उसे दो, भले ही वह घोड़े पर सवार होकर आए।"
इमाम मलिक : 1584
و حَدَّثَنِي مَالِك عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ عَنْ عَمْرِو بْنِ مُعَاذٍ الْأَشْهَلِيِّ الْأَنْصَارِيِّ عَنْ جَدَّتِهِ أَنَّهَا قَالَتْقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَا نِسَاءَ الْمُؤْمِنَاتِ لَا تَحْقِرَنَّ إِحْدَاكُنَّ أَنْ تُهْدِيَ لِجَارَتِهَا وَلَوْ كُرَاعَ شَاةٍ مُحْرَقًا
मुझे [ज़ैद बिन असलम] से [अमरू बिन मुअज़्ज़ अल अशली अल अंसारी] से [उनकी दादी] ने बताया है; "अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा: 'ऐ ईमान वाली औरतों, तुम में से कोई भी अपने पड़ोसी को तोहफ़ा देने में कमी न समझे, भले ही वह सिर्फ़ भुने हुए बकरे की टांग ही क्यों न हो।"
इमाम मलिक : 1585
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَزِيدَ اللَّيْثِيِّ عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّأَنَّ نَاسًا مِنْ الْأَنْصَارِ سَأَلُوا رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَأَعْطَاهُمْ ثُمَّ سَأَلُوهُ فَأَعْطَاهُمْ حَتَّى نَفِدَ مَا عِنْدَهُ ثُمَّ قَالَ مَا يَكُونُ عِنْدِي مِنْ خَيْرٍ فَلَنْ أَدَّخِرَهُ عَنْكُمْ وَمَنْ يَسْتَعْفِفْ يُعِفَّهُ اللَّهُ وَمَنْ يَسْتَغْنِ يُغْنِهِ اللَّهُ وَمَنْ يَتَصَبَّرْ يُصَبِّرْهُ اللَّهُ وَمَا أُعْطِيَ أَحَدٌ عَطَاءً هُوَ خَيْرٌ وَأَوْسَعُ مِنْ الصَّبْرِ
मुझे बताया गया है कि [इब्न शिहाब] से ['अथा बिन यज़ीद अल लैतसी] से [अबू सईद अल खुदरी] के मालिक ने कहा, "कुछ अंसार ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मांगा, तो उन्होंने उन्हें दे दिया। फिर उन्होंने फिर मांगा, फिर उन्होंने उन्हें फिर दिया जब तक कि उनके पास जो कुछ भी था वह खत्म नहीं हो गया। फिर उन्होंने कहा: "मेरे पास जो कुछ भी अच्छा है, मैं उसे तुमसे नहीं छिपाऊंगा। जो कोई अपनी इज़्ज़त की रक्षा करता है, अल्लाह ज़रूर उसकी इज़्ज़त की रक्षा करेगा। जो कोई भी काफ़ी माँगता है, अल्लाह ज़रूर उसे देगा। जो कोई भी सब्र करने की कोशिश करता है, अल्लाह ज़रूर उसे सब्र देगा। सब्र से बेहतर और ज़्यादा बड़ा तोहफ़ा किसी को नहीं दिया गया है।"
इमाम मलिक : 1586
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ وَهُوَ عَلَى الْمِنْبَرِ وَهُوَ يَذْكُرُ الصَّدَقَةَ وَالتَّعَفُّفَ عَنْ الْمَسْأَلَةِ الْيَدُ الْعُلْيَا خَيْرٌ مِنْ الْيَدِ السُّفْلَى وَالْيَدُ الْعُلْيَا هِيَ الْمُنْفِقَةُ وَالسُّفْلَى هِيَ السَّائِلَةُ
मुझे मलिक (नफी) से [अब्दुल्ला बिन उमर] ने बताया है कि, “जब वह मिम्बर पर थे, तो उन्होंने दान और भीख मांगकर इज्ज़त बनाए रखने के बारे में बताया, उन्होंने कहा: “ऊपर का हाथ नीचे के हाथ से बेहतर है।” ऊपर का हाथ देने वाला है और नीचे का हाथ मांगने वाला है।”
इमाम मलिक : 1587
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَرْسَلَ إِلَى عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ بِعَطَاءٍ فَرَدَّهُ عُمَرُ فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لِمَ رَدَدْتَهُ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَلَيْسَ أَخْبَرْتَنَا أَنَّ خَيْرًا لِأَحَدِنَا أَنْ لَا يَأْخُذَ مِنْ أَحَدٍ شَيْئًا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِنَّمَا ذَلِكَ عَنْ الْمَسْأَلَةِ فَأَمَّا مَا كَانَ مِنْ غَيْرِ مَسْأَلَةٍ فَإِنَّمَا هُوَ رِزْقٌ يَرْزُقُكَهُ اللَّهُ فَقَالَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ أَمَا وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لَا أَسْأَلُ أَحَدًا شَيْئًا وَلَا يَأْتِينِي شَيْءٌ مِنْ غَيْرِ مَسْأَلَةٍ إِلَّا أَخَذْتُهُ
मुझे मलिक [ज़ैद बिन असलम] से [अथा बिन यासर] से रिवायत है, उन्होंने कहा, "रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उमर बिन खत्ताब को कुछ भेजा, फिर उमर ने उसे लौटा दिया। तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे पूछा: "तुमने उसे क्यों लौटा दिया?" उमर ने जवाब दिया, "ऐ रसूलुल्लाह, क्या आपने हमें नहीं बताया कि इंसान की अच्छाई यह है कि वह किसी दूसरे इंसान से कुछ न ले?" रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "इसका मतलब यह है कि अगर वह मांगे। अगर मांगने से नहीं, तो यह वह रोज़ी है जो अल्लाह तुम्हें देता है।" उमर बिन खत्ताब ने कहा; "जिसके हाथ में मेरी जान है, मैं किसी से कुछ नहीं मांगूंगा, और कोई मुझे वह चीज़ नहीं देगा जो मैंने नहीं मांगी, जब तक कि मैं उसे न ले लूं।"
इमाम मलिक : 1588
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ أَبِي الزِّنَادِ عَنْ الْأَعْرَجِ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لَأَنْ يَأْخُذَ أَحَدُكُمْ حَبْلَهُ فَيَحْتَطِبَ عَلَى ظَهْرِهِ خَيْرٌ لَهُ مِنْ أَنْ يَأْتِيَ رَجُلًا أَعْطَاهُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ فَيَسْأَلَهُ أَعْطَاهُ أَوْ مَنَعَهُ
मलिक ने मुझे [अबू अज़ ज़िनाद] से [अल अराज] से [अबू हुरैरा] से बताया कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा: "उसकी कसम जिसके हाथ में मेरी जान है, अगर तुम में से कोई अपनी रस्सी ले और जलाने की लकड़ी ढूंढे और उसे अपने कंधों पर उठाए, तो यह उसके लिए उस आदमी के पास जाने से बेहतर होगा जिसे भरपूर खाना दिया गया हो और उससे मांगे, चाहे उसे दिया जाए या न दिया जाए।"
इमाम मलिक : 1589
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ عَنْ عَطَاءِ بْنِ يَسَارٍ عَنْ رَجُلٍ مِنْ بَنِي أَسَدٍ أَنَّهُ قَالَنَزَلْتُ أَنَا وَأَهْلِي بِبَقِيعِ الْغَرْقَدِ فَقَالَ لِي أَهْلِي اذْهَبْ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَاسْأَلْهُ لَنَا شَيْئًا نَأْكُلُهُ وَجَعَلُوا يَذْكُرُونَ مِنْ حَاجَتِهِمْ فَذَهَبْتُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَوَجَدْتُ عِنْدَهُ رَجُلًا يَسْأَلُهُ وَرَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ لَا أَجِدُ مَا أُعْطِيكَ فَتَوَلَّى الرَّجُلُ عَنْهُ وَهُوَ مُغْضَبٌ وَهُوَ يَقُولُ لَعَمْرِي إِنَّكَ لَتُعْطِي مَنْ شِئْتَ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِنَّهُ لَيَغْضَبُ عَلَيَّ أَنْ لَا أَجِدَ مَا أُعْطِيهِ مَنْ سَأَلَ مِنْكُمْ وَلَهُ أُوقِيَّةٌ أَوْ عَدْلُهَا فَقَدْ سَأَلَ إِلْحَافًا قَالَ الْأَسَدِيُّ فَقُلْتُ لَلَقْحَةٌ لَنَا خَيْرٌ مِنْ أُوقِيَّةٍ قَالَ مَالِك وَالْأُوقِيَّةُ أَرْبَعُونَ دِرْهَمًا قَالَ فَرَجَعْتُ وَلَمْ أَسْأَلْهُ فَقُدِمَ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بَعْدَ ذَلِكَ بِشَعِيرٍ وَزَبِيبٍ فَقَسَمَ لَنَا مِنْهُ حَتَّى أَغْنَانَا اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ
मुझे मलिक [ज़ैद बिन असलम] से [अथा बिन यासर] से [बनी असद के एक आदमी] ने बताया कि, "मैं और मेरी पत्नी बाक़ी अल ग़रक़द में रुके, फिर मेरे परिवार ने कहा, "रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मिलिए, फिर कुछ ऐसा मांगिए जो हम खा सकें।" फिर उन्होंने अपनी-अपनी ज़रूरतें बताईं, फिर मैं रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मिलने गया, मैंने देखा कि कोई उनसे कुछ मांग रहा है। रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया: "मेरे पास अब तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।" वह आदमी गुस्से में यह कहते हुए चला गया, "हाँ, तुम जिसे चाहो दे सकते हो!" " तो रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "वह मुझसे नाराज़ था, क्योंकि मेरे पास वह नहीं था जो उसने मांगा था। तुम में से जो कोई भी मांगता है, भले ही उसके पास एक उक़ियाह या उसके बराबर हो, उसने ज़रूर ज़बरदस्ती कुछ मांगा है।" अल असदी ने कहा; "हमारा ऊँट जो लगभग बच्चे को जन्म देने वाला है, एक उकियाह से बेहतर है।" मलिक ने कहा; "एक उकियाह चालीस दिरहम के बराबर है।" बनी असद के आदमी ने तब कहा, "मैं बिना पूछे लौट आया।" हमारे लिए काफी है।"
इमाम मलिक : 1590
و عَنْ مَالِك عَنْ الْعَلَاءِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ أَنَّهُ سَمِعَهُ يَقُولُمَا نَقَصَتْ صَدَقَةٌ مِنْ مَالٍ وَمَا زَادَ اللَّهُ عَبْدًا بِعَفْوٍ إِلَّا عِزًّا وَمَا تَوَاضَعَ عَبْدٌ إِلَّا رَفَعَهُ اللَّهُقَالَ مَالِك لَا أَدْرِي أَيُرْفَعُ هَذَا الْحَدِيثُ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَمْ لَا
मलिक से [अल 'अला` बिन अब्दुर्रहमान] कि उसने उसे यह कहते हुए सुना, "खैरात से दौलत कम नहीं होती, और अल्लाह माफ़ करने वाले बंदे को इज़्ज़त के अलावा और कुछ नहीं बढ़ाता। और कोई बंदा तब तक विनम्र नहीं होता जब तक अल्लाह उसका दर्जा न बढ़ा दे।" मलिक ने कहा; "मुझे नहीं पता कि यह हदीस पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए अच्छी है या नहीं।"
इमाम मलिक : 1591
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي بَكْرٍ عَنْ أَبِيهِأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ اسْتَعْمَلَ رَجُلًا مِنْ بَنِي عَبْدِ الْأَشْهَلِ عَلَى الصَّدَقَةِ فَلَمَّا قَدِمَ سَأَلَهُ إِبِلًا مِنْ الصَّدَقَةِ فَغَضِبَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ حَتَّى عُرِفَ الْغَضَبُ فِي وَجْهِهِ وَكَانَ مِمَّا يُعْرَفُ بِهِ الْغَضَبُ فِي وَجْهِهِ أَنْ تَحْمَرَّ عَيْنَاهُ ثُمَّ قَالَ إِنَّ الرَّجُلَ لَيَسْأَلُنِي مَا لَا يَصْلُحُ لِي وَلَا لَهُ فَإِنْ مَنَعْتُهُ كَرِهْتُ الْمَنْعَ وَإِنْ أَعْطَيْتُهُ أَعْطَيْتُهُ مَا لَا يَصْلُحُ لِي وَلَا لَهُ فَقَالَ الرَّجُلُ يَا رَسُولَ اللَّهِ لَا أَسْأَلُكَ مِنْهَا شَيْئًا أَبَدًا
मुझे मालिक [अब्दुल्ला बिन अबू बक्र] से [उनके पिता] से यह बात याद आई कि उन्होंने कहा, "अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने बनी अब्दुल अल अशहाल के एक आदमी को ज़कात इकट्ठा करने वाला बनाया। जब वह पहुँचे, तो उस आदमी ने ज़कात में से एक ऊँट माँगा। तब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) को गुस्सा आ गया, और उनका गुस्सा उनके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था। उनके गुस्से की निशानियों में उनकी आँखें लाल होना भी था। फिर उन्होंने कहा: "वास्तव में, एक आदमी ने मुझसे ऐसी चीज़ माँगी जो न तो मेरे लिए है और न ही उसके लिए। अगर मैं उसे मना करूँ, तो मुझे मना करना (देना) पसंद नहीं है। अगर मैं उसे देता हूँ, तो इसका मतलब है कि मैं उसे ऐसी चीज़ दे रहा हूँ जो न तो मेरे लिए है और न ही उसके लिए।" तब उस आदमी ने कहा: "अल्लाह के रसूल, मैं आपसे कभी कुछ नहीं माँगूँगा।"
इमाम मलिक : 1592
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ عَنْ أَبِيهِ أَنَّهُ قَالَ قَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْأَرْقَمِادْلُلْنِي عَلَى بَعِيرٍ مِنْ الْمَطَايَا أَسْتَحْمِلُ عَلَيْهِ أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ فَقُلْتُ نَعَمْ جَمَلًا مِنْ الصَّدَقَةِ فَقَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْأَرْقَمِ أَتُحِبُّ أَنَّ رَجُلًا بَادِنًا فِي يَوْمٍ حَارٍّ غَسَلَ لَكَ مَا تَحْتَ إِزَارِهِ وَرُفْغَيْهِ ثُمَّ أَعْطَاكَهُ فَشَرِبْتَهُ قَالَ فَغَضِبْتُ وَقُلْتُ يَغْفِرُ اللَّهُ لَكَ أَتَقُولُ لِي مِثْلَ هَذَا فَقَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْأَرْقَمِ إِنَّمَا الصَّدَقَةُ أَوْسَاخُ النَّاسِ يَغْسِلُونَهَا عَنْهُمْ
मुझे मलिक [ज़ैद बिन असलम] से [उनके पिता] की एक कहानी मिली, जिसमें उन्होंने कहा: [अब्दुर्रहमान बिन अल अरकम] ने कहा, "मुझे एक ऊँट दिखाओ जिस पर मैं ईमान वालों के कमांडर को ले जा सकूँ।" तब मैंने कहा, "हाँ, दान देने वाले ऊँटों में से एक नर ऊँट है।" तब अब्दुल्लाह बिन अल अरकम ने पूछा, "क्या तुम चाहोगे कि कोई मोटा आदमी, बहुत गर्मी के दिन, तुम्हारे लिए अपने सरोंग के नीचे का हिस्सा और अपनी जांघें धोए। फिर वह तुम्हें (पानी) दे और तुम उसे पी लो?" असलम ने कहा, "मुझे गुस्सा आया, फिर मैंने कहा, "अल्लाह तुम्हें माफ़ करे, तुम मुझसे ऐसा क्यों कहते हो?" अब्दुल्लाह बिन अरकम ने कहा: "असल में, ज़कात लोगों की गंदगी है जिसे वे खुद से साफ़ करते हैं।"
इमाम मलिक : 1593
حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ عَنْ أَبِيهِ أَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِاسْتَعْمَلَ مَوْلًى لَهُ يُدْعَى هُنَيًّا عَلَى الْحِمَى فَقَالَ يَا هُنَيُّ اضْمُمْ جَنَاحَكَ عَنْ النَّاسِ وَاتَّقِ دَعْوَةَ الْمَظْلُومِ فَإِنَّ دَعْوَةَ الْمَظْلُومِ مُجَابَةٌ وَأَدْخِلْ رَبَّ الصُّرَيْمَةِ وَرَبَّ الْغُنَيْمَةِ وَإِيَّايَ وَنَعَمَ ابْنِ عَفَّانَ وَابْنِ عَوْفٍ فَإِنَّهُمَا إِنْ تَهْلِكْ مَاشِيَتُهُمَا يَرْجِعَانِ إِلَى الْمَدِينَةِ إِلَى زَرْعٍ وَنَخْلٍ وَإِنَّ رَبَّ الصُّرَيْمَةِ وَالْغُنَيْمَةِ إِنْ تَهْلِكْ مَاشِيَتُهُ يَأْتِنِي بِبَنِيهِ فَيَقُولُ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ أَفَتَارِكُهُمْ أَنَا لَا أَبَا لَكَ فَالْمَاءُ وَالْكَلَأُ أَيْسَرُ عَلَيَّ مِنْ الذَّهَبِ وَالْوَرِقِ وَايْمُ اللَّهِ إِنَّهُمْ لَيَرَوْنَ أَنِّي قَدْ ظَلَمْتُهُمْ إِنَّهَا لَبِلَادُهُمْ وَمِيَاهُهُمْ قَاتَلُوا عَلَيْهَا فِي الْجَاهِلِيَّةِ وَأَسْلَمُوا عَلَيْهَا فِي الْإِسْلَامِ وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لَوْلَا الْمَالُ الَّذِي أَحْمِلُ عَلَيْهِ فِي سَبِيلِ اللَّهِ مَا حَمَيْتُ عَلَيْهِمْ مِنْ بِلَادِهِمْ شِبْرًا
मुझे मालिक [ज़ैद बिन असलम] से [उनके पिता] से यह वर्णित हुआ कि [उमर बिन खत्ताब] ने अपने पूर्व दास हुनय्या को सीमाओं की रक्षा के लिए नियुक्त किया था। तब उमर ने कहा; "ऐ हुनय्या! मनुष्यों के विरुद्ध अत्याचार करने से अपने हाथ रोको और सताए गए लोगों की प्रार्थनाओं से डरो। क्योंकि सताए गए लोगों की प्रार्थनाएँ स्वीकार की जाती हैं। कुछ ऊँटों और बकरियों के मालिकों के पास आओ। इब्न अफ़्फ़ान और इब्न औफ़ के पशुओं को छोड़ दो, यदि उन दोनों के पशु समाप्त हो जाएँ, तो वे खेती करने और फ़सल उगाने के लिए मदीना लौट जाएँगे। जिन चरवाहों के पास कुछ ऊँट या बकरियाँ हैं, जब उनके पशु समाप्त हो जाएँगे, तो वे अपने बच्चों को लेकर मेरे पास आएँगे, और कहेंगे 'ऐ अमीरुल मोमिनीन! ऐ अमीरुल मोमिनीन! क्या तुम उन्हें छोड़ दोगे? मैं तुमसे विरक्त नहीं हूँ, पानी और घास मेरे लिए सोने और चाँदी से हल्के हैं। अल्लाह की कसम, वे देखते हैं कि मैंने अल्लाह के मार्ग में उनके साथ ज़ुल्म किया है।
इमाम मलिक : 1594
حَدَّثَنِي مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ جُبَيْرِ بْنِ مُطْعِمٍأَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ لِي خَمْسَةُ أَسْمَاءٍ أَنَا مُحَمَّدٌ وَأَنَا أَحْمَدُ وَأَنَا الْمَاحِي الَّذِي يَمْحُو اللَّهُ بِيَ الْكُفْرَ وَأَنَا الْحَاشِرُ الَّذِي يُحْشَرُ النَّاسُ عَلَى قَدَمِي وَأَنَا الْعَاقِبُ
मलिक (इब्न शिहाब) ने मुझे (मुहम्मद बिन जाबिर बिन मुथिम) बताया है कि पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मुझसे कहा: "मेरे पाँच नाम हैं: मैं मुहम्मद हूँ, अहमद, अल माही जिसके द्वारा अल्लाह ने मेरे साथ से अविश्वास को मिटा दिया है, अल हासिर, जिसके द्वारा सारी इंसानियत मेरे पैरों के तलवों पर इकट्ठा होती है, और अल आकिब।"