इमाम मलिक : 141
و حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ عَمِّهِ أَبِي سُهَيْلِ بْنِ مَالِكٍ عَنْ أَبِيهِ أَنَّهُ قَالَمَا أَعْرِفُ شَيْئًا مِمَّا أَدْرَكْتُ عَلَيْهِ النَّاسَ إِلَّا النِّدَاءَ بِالصَّلَاةِ
याह्या ने मुझे मलिक (उनके चाचा अबू सुहैल बिन मलिक) से उनके पिता के बारे में बताया, जिन्होंने कहा: "मैं लोगों के कामों के बारे में कुछ नहीं जानता, सिवाय नमाज़ के अज़ान देने के।"
इमाम मलिक : 142
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَسَمِعَ الْإِقَامَةَ وَهُوَ بِالْبَقِيعِ فَأَسْرَعَ الْمَشْيَ إِلَى الْمَسْجِدِ
मुझे मलिक [नफी] [अब्दुल्ला बिन उमर] से बताया गया है कि जब वह बाक़ी में थे तो उन्होंने इक़ामत सुनी, फिर वह मस्जिद की ओर दौड़े।
इमाम मलिक : 143
حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَأَذَّنَ بِالصَّلَاةِ فِي لَيْلَةٍ ذَاتِ بَرْدٍ وَرِيحٍ فَقَالَ أَلَا صَلُّوا فِي الرِّحَالِ ثُمَّ قَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَأْمُرُ الْمُؤَذِّنَ إِذَا كَانَتْ لَيْلَةٌ بَارِدَةٌ ذَاتُ مَطَرٍ يَقُولُ أَلَا صَلُّوا فِي الرِّحَالِ
याह्या ने मुझे मलिक (नफी) से बताया कि अब्दुल्लाह बिन उमर ने ठंडी और तेज़ हवा वाली रात में नमाज़ के लिए अज़ान दी। अज़ान देते हुए उन्होंने कहा: "घर पर नमाज़ पढ़ो।" फिर उन्होंने कहा: "अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक बार बहुत ठंडी और बारिश वाली रात में मुअज़्ज़िन को हुक्म दिया, "घर पर नमाज़ पढ़ो।"
इमाम मलिक : 144
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَكَانَ لَا يَزِيدُ عَلَى الْإِقَامَةِ فِي السَّفَرِ إِلَّا فِي الصُّبْحِ فَإِنَّهُ كَانَ يُنَادِي فِيهَا وَيُقِيمُ وَكَانَ يَقُولُ إِنَّمَا الْأَذَانُ لِلْإِمَامِ الَّذِي يَجْتَمِعُ النَّاسُ إِلَيْهِ
मुझे मलिक [नफी] ने बताया कि [अब्दुल्ला बिन उमर] जब सफ़र में होते थे, तो सिर्फ़ सुबह की नमाज़ के अलावा इक़ामत कहते थे। वह नमाज़ में अज़ान और इक़ामत कहते थे। वह कहते हैं; "अज़ान सिर्फ़ इमाम (मस्जिद में) के लिए है जो जमात की नमाज़ पढ़ा रहा हो।"
इमाम मलिक : 145
و حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ أَنَّ أَبَاهُ قَالَ لَهُإِذَا كُنْتَ فِي سَفَرٍ فَإِنْ شِئْتَ أَنْ تُؤَذِّنَ وَتُقِيمَ فَعَلْتَ وَإِنْ شِئْتَ فَأَقِمْ وَلَا تُؤَذِّنْقَالَ يَحْيَى سَمِعْت قَوْله تَعَالَى يَقُولُ لَا بَأْسَ أَنْ يُؤَذِّنَ الرَّجُلُ وَهُوَ رَاكِبٌ
याह्या ने मुझे मलिक [हिस्याम बिन उरवाह] से बताया कि [उनके पिता] ने उनसे कहा, "अगर तुम सफ़र में हो, और तुम्हें अज़ान और इक़ामत चाहिए, तो कर लो। और अगर तुम चाहो, तो तुम बिना अज़ान के भी इक़ामत कर सकते हो।" याह्या ने कहा, "मैंने मलिक को यह कहते सुना, "अगर कोई आदमी अज़ान दे, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है, भले ही वह अपनी गाड़ी में हो।"
इमाम मलिक : 146
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ أَنَّهُ كَانَ يَقُولُمَنْ صَلَّى بِأَرْضٍ فَلَاةٍ صَلَّى عَنْ يَمِينِهِ مَلَكٌ وَعَنْ شِمَالِهِ مَلَكٌ فَإِذَا أَذَّنَ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ أَوْ أَقَامَ صَلَّى وَرَاءَهُ مِنْ الْمَلَائِكَةِ أَمْثَالُ الْجِبَالِ
मलिक (याह्या बिन सईद) ने मुझे बताया है कि (सईद बिन मुसय्यब) ने कहा, "जो कोई ज़मीन के टुकड़े पर नमाज़ पढ़ता है, तो फ़रिश्ते उसके दाएं और बाएं नमाज़ पढ़ते हैं। अगर वह नमाज़ के लिए अज़ान देता है और इक़ामत या सिर्फ़ इक़ामत देता है, तो फ़रिश्ते उसके पीछे पहाड़ की तरह नमाज़ पढ़ते हैं।"
इमाम मलिक : 147
حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِنَّ بِلَالًا يُنَادِي بِلَيْلٍ فَكُلُوا وَاشْرَبُوا حَتَّى يُنَادِيَ ابْنُ أُمِّ مَكْتُومٍ
याह्या ने मुझे मालिक [अब्दुल्ला बिन दीनार] से [अब्दुल्ला बिन उमर] से बताया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "वास्तव में, बिलाल रात में नमाज़ का आह्वान करते हैं, इसलिए तब तक खाएं और पिएं जब तक अब्दुल्ला बिन उम्मी मकतूम नमाज़ का आह्वान न करें।"
इमाम मलिक : 148
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ سَالِمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِنَّ بِلَالًا يُنَادِي بِلَيْلٍ فَكُلُوا وَاشْرَبُوا حَتَّى يُنَادِيَ ابْنُ أُمِّ مَكْتُومٍ قَالَ وَكَانَ ابْنُ أُمِّ مَكْتُومٍ رَجُلًا أَعْمَى لَا يُنَادِي حَتَّى يُقَالَ لَهُ أَصْبَحْتَ أَصْبَحْتَ
मुझे मलिक (इब्न शिहाब) से (सलीम बिन अब्दुल्लाह) ने बताया है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "बेशक, बिलाल रात में अज़ान देते हैं, तब तक खाते-पीते रहो जब तक इब्न उम्मी मकतूम अज़ान न दें।" सलीम बिन अब्दुल्लाह ने कहा, "अब्दुल्ला बिन उम्मी मकतूम अंधे आदमी थे, उन्होंने तब तक अज़ान नहीं दी जब तक उनसे कहा न गया, 'सुबह हो गई, सुबह हो गई'।"
इमाम मलिक : 149
حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ سَالِمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ إِذَا افْتَتَحَ الصَّلَاةَ رَفَعَ يَدَيْهِ حَذْوَ مَنْكِبَيْهِ وَإِذَا رَفَعَ رَأْسَهُ مِنْ الرُّكُوعِ رَفَعَهُمَا كَذَلِكَ أَيْضًا وَقَالَ سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ رَبَّنَا وَلَكَ الْحَمْدُ وَكَانَ لَا يَفْعَلُ ذَلِكَ فِي السُّجُودِ
मुझे याह्या ने मलिक से [इब्न शिहाब] से [सलीम बिन अब्दुल्लाह] से [अब्दुल्ला बिन उमर] से बताया है कि जब रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ शुरू की, तो उन्होंने अपने हाथ कंधों तक ऊपर उठाए। जब वह रुकू से उठे, तो उन्होंने यह नमाज़ पढ़ते हुए भी दोनों हाथ उठाए: "समी'आ अल्लाहु लिमन हमीदा, रब्बाना वालकल हम्दु (अल्लाह उन लोगों की सुनता है जो उसकी तारीफ़ करते हैं। ऐ हमारे रब, सिर्फ़ तेरे लिए सारी तारीफ़ है)।" लेकिन जब उन्होंने सजदा किया तो उन्होंने ऐसा नहीं किया।
इमाम मलिक : 150
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ عَلِيِّ بْنِ حُسَيْنِ بْنِ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ أَنَّهُ قَالَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُكَبِّرُ فِي الصَّلَاةِ كُلَّمَا خَفَضَ وَرَفَعَ فَلَمْ تَزَلْ تِلْكَ صَلَاتَهُ حَتَّى لَقِيَ اللَّهَ
मुझे मलिक [इब्न शिहाब] से [अली बिन हुसैन बिन अली बिन अबू तालिब] ने बताया है कि, "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ में तकबीर कहा जब वह उठने और गिरने वाले थे। उन्होंने हमेशा ऐसा किया जब तक कि उनकी मौत नहीं हो गई।"
इमाम मलिक : 151
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ يَسَارٍأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَرْفَعُ يَدَيْهِ فِي الصَّلَاةِ
मुझे मालिक [याह्या बिन सईद] से [सुलेमान बिन यासर] से वर्णित किया गया है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने नमाज़ में अपने हाथ उठाए।
इमाम मलिक : 152
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ أَبِي سَلَمَةَ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَوْفٍ أَنَّ أَبَا هُرَيْرَةَكَانَ يُصَلِّي لَهُمْ فَيُكَبِّرُ كُلَّمَا خَفَضَ وَرَفَعَ فَإِذَا انْصَرَفَ قَالَ وَاللَّهِ إِنِّي لَأَشْبَهُكُمْ بِصَلَاةِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ
मुझे मलिक [इब्न शिहाब] से [अबू सलामा इब्न अब्दुर्रहमान इब्न औफ] से बताया गया है कि [अबू हुरैरा] उन्हें नमाज़ पढ़ाते थे। वह हर बार उठते और नीचे जाते समय तकबीर कहते थे। जब वह अपनी नमाज़ खत्म करते, तो कहते, "अल्लाह की कसम, मैं वह हूँ जिसकी नमाज़ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) की नमाज़ से सबसे ज़्यादा मिलती-जुलती है।"
इमाम मलिक : 153
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ سَالِمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَكَانَ يُكَبِّرُ فِي الصَّلَاةِ كُلَّمَا خَفَضَ وَرَفَعَ
मुझे मालिक [इब्न सैहाब] से [सलीम बिन अब्दुल्ला] से वर्णित किया गया है, कि [अब्दुल्ला बिन उमर] हर बार अपनी प्रार्थना में तकबीर कहते थे, जब वह नीचे जाते और उठते थे।
इमाम मलिक : 154
و حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَكَانَ إِذَا افْتَتَحَ الصَّلَاةَ رَفَعَ يَدَيْهِ حَذْوَ مَنْكِبَيْهِ وَإِذَا رَفَعَ رَأْسَهُ مِنْ الرُّكُوعِ رَفَعَهُمَا دُونَ ذَلِكَ
याह्या ने मुझे मलिक से [नफी] बताया कि [अब्दुल्ला बिन उमर] जब नमाज़ शुरू करते थे, तो अपने हाथों को अपने कंधों तक ऊपर उठाते थे। और अगर वह रुकू से अपना सिर उठाते हैं, तो वह अपने हाथों को उससे भी नीचे उठाते हैं।
इमाम मलिक : 155
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ أَبِي نُعَيْمٍ وَهْبِ بْنِ كَيْسَانَ عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِأَنَّهُ كَانَ يُعَلِّمُهُمْ التَّكْبِيرَ فِي الصَّلَاةِ قَالَ فَكَانَ يَأْمُرُنَا أَنْ نُكَبِّرَ كُلَّمَا خَفَضْنَا وَرَفَعْنَا
मुझे मलिक [अबू नुआइम वहाब बिन कैसन] से [जाबिर बिन अब्दुल्ला] ने बताया है कि उन्होंने उन्हें नमाज़ में तकबीर कहना सिखाया है।" उन्होंने कहा, "उन्होंने (रसूलुल्लाह) हमसे कहा कि जब भी हम डूबें और उठें तो तकबीर कहें।"
इमाम मलिक : 156
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ أَنَّهُ كَانَ يَقُولُإِذَا أَدْرَكَ الرَّجُلُ الرَّكْعَةَ فَكَبَّرَ تَكْبِيرَةً وَاحِدَةً أَجْزَأَتْ عَنْهُ تِلْكَ التَّكْبِيرَةُقَالَ مَالِك وَذَلِكَ إِذَا نَوَى بِتِلْكَ التَّكْبِيرَةِ افْتِتَاحَ الصَّلَاةِ
मलिक ने मुझे [इब्न शिहाब] से बताया था कि उन्होंने कहा; "अगर कोई आदमी झुके, फिर एक तकबीर पढ़े, तो वह तकबीर उसके लिए काफी है।" मलिक ने कहा, "यह तब है जब वह अपनी तकबीर से नमाज़ शुरू करना चाहता है।"
इमाम मलिक : 157
حَدَّثَنِي يَحْيَى عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ جُبَيْرِ بْنِ مُطْعِمٍ عَنْ أَبِيهِ أَنَّهُ قَالَسَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَرَأَ بِالطُّورِ فِي الْمَغْرِبِ
याह्या ने मुझे मलिक से [इब्न शिहाब] से [मुहम्मद बिन जुबैर बिन मुथिम] से [उनके पिता] से बताया है कि उन्होंने कहा, "मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मग़रिब की नमाज़ में अथ थुर अक्षर पढ़ते सुना।"
इमाम मलिक : 158
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُتْبَةَ بْنِ مَسْعُودٍ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبَّاسٍ أَنَّ أُمَّ الْفَضْلِ بِنْتَ الْحَارِثِسَمِعَتْهُ وَهُوَ يَقْرَأُ وَالْمُرْسَلَاتِ عُرْفًا فَقَالَتْ لَهُ يَا بُنَيَّ لَقَدْ ذَكَّرْتَنِي بِقِرَاءَتِكَ هَذِهِ السُّورَةَ إِنَّهَا لَآخِرُ مَا سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقْرَأُ بِهَا فِي الْمَغْرِبِ
मुझे मलिक [इब्न सैय्यब] से [उबैदुल्लाह बिन अब्दुल्लाह बिन उतबाह बिन मसूद] से [अब्दुल्लाह बिन अब्बास] से बताया गया कि [उम्मुल अल फदल बिन्त अल हारिथ] ने उन्हें "वलमुर्सलाती उरफा" पढ़ते हुए सुना। उम्मुल अल फदल बिन्त अल हारिथ ने कहा, "ऐ मेरे बेटे! यह खत पढ़कर तुमने मुझे याद दिलाया है कि यह आखिरी खत था जो मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से सुना था, उन्होंने इसे मग़रिब की नमाज़ में पढ़ा था।"
इमाम मलिक : 159
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ أَبِي عُبَيْدٍ مَوْلَى سُلَيْمَانَ بْنِ عَبْدِ الْمَلِكِ عَنْ عُبَادَةَ بْنِ نُسَيٍّ عَنْ قَيْسِ بْنِ الْحَارِثِ عَنْ أَبِي عَبْدِ اللَّهِ الصُّنَابِحِيِّ قَالَقَدِمْتُ الْمَدِينَةَ فِي خِلَافَةِ أَبِي بَكْرٍ الصِّدِّيقِ فَصَلَّيْتُ وَرَاءَهُ الْمَغْرِبَ فَقَرَأَ فِي الرَّكْعَتَيْنِ الْأُولَيَيْنِ بِأُمِّ الْقُرْآنِ وَسُورَةٍ سُورَةٍ مِنْ قِصَارِ الْمُفَصَّلِ ثُمَّ قَامَ فِي الثَّالِثَةِ فَدَنَوْتُ مِنْهُ حَتَّى إِنَّ ثِيَابِي لَتَكَادُ أَنْ تَمَسَّ ثِيَابَهُ فَسَمِعْتُهُ قَرَأَ بِأُمِّ الْقُرْآنِ وَبِهَذِهِ الْآيَةِ{ رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِنْ لَدُنْكَ رَحْمَةً إِنَّكَ أَنْتَ الْوَهَّابُ }
मलिक ने मुझे बताया है कि [अबू उबैद] के पुराने गुलाम सुलेमान बिन अब्दुल मलिक से, [उबादा बिन नुसाई] से [क़ैस बिन अल हारिथ] से [अबू अब्दुल्ला अश शुनबिही] से उन्होंने कहा; "मैं [अबू बकर अस सिद्दीक] के खिलाफत के दौरान मदीना आया था। फिर मैंने उनके पीछे मग़रिब की नमाज़ पढ़ी, उन्होंने पहली दो रकअतों में उम्मुल क़ुरान और छोटे अल मुफ़श्शाल अक्षर पढ़े। फिर वह तीसरी रकअत के लिए खड़े हुए, फिर मैं उनके पास गया जब तक कि मेरा कपड़ा लगभग उनके कपड़ों को छू नहीं गया। मैंने उन्हें उम्मुल क़ुरान और यह आयत पढ़ते सुना; '(ऐ हमारे रब, हमें रास्ता दिखाने के बाद हमारे दिलों को गुमराह न कर, और हमें अपनी तरफ़ से नेमत दे; क्योंकि तू ही देने वाला है'।" (क़ुरआन: 8)
इमाम मलिक : 160
و حَدَّثَنِي عَنْ مَالِك عَنْ نَافِعٍ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَكَانَ إِذَا صَلَّى وَحْدَهُ يَقْرَأُ فِي الْأَرْبَعِ جَمِيعًا فِي كُلِّ رَكْعَةٍ بِأُمِّ الْقُرْآنِ وَسُورَةٍ مِنْ الْقُرْآنِ وَكَانَ يَقْرَأُ أَحْيَانًا بِالسُّورَتَيْنِ وَالثَّلَاثِ فِي الرَّكْعَةِ الْوَاحِدَةِ مِنْ صَلَاةِ الْفَرِيضَةِ وَيَقْرَأُ فِي الرَّكْعَتَيْنِ مِنْ الْمَغْرِبِ كَذَلِكَ بِأُمِّ الْقُرْآنِ وَسُورَةٍ سُورَةٍ
मुझे मलिक [नफी] से बताया गया है कि [अब्दुल्ला बिन उमर] जब अकेले नमाज़ पढ़ते हैं, तो वे चारों रकअत पढ़ते हैं। हर रकअत में वे उम्मुल कुरान और कुरान की एक सूरह पढ़ते हैं। और कभी-कभी वे फर्दलू नमाज़ में एक रकअत में दो या तीन सूरह पढ़ते हैं। मग़रिब की नमाज़ की दो रकअतों में वे उम्मुल कुरान और सूरह भी पढ़ते हैं।