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इस्लाम अल-हक़: क़ुरआन और हदीस
(सच्चा इस्लाम)
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इमाम अहमद (الامام احمد) - 26363 हदीस

इस्लाम एक आदर्श धर्म है और अल्लाह द्वारा स्वीकृत है

इमाम अहमद : 261

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ عَنْ قَيْسِ بْنِ مُسْلِمٍ عَنْ طَارِقِ بْنِ شِهَابٍ أَنَّ الْيَهُودَ قَالُوا لِعُمَرَ إِنَّكُمْ تَقْرَءُونَ آيَةً لَوْ أُنْزِلَتْ فِينَا لَاتَّخَذْنَا ذَلِكَ الْيَوْمَ عِيدًا فَقَالَ إِنِّي لَأَعْلَمُ حَيْثُ أُنْزِلَتْ وَأَيَّ يَوْمٍ أُنْزِلَتْ وَأَيْنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ حِينَ أُنْزِلَتْ أُنْزِلَتْ يَوْمَ عَرَفَةَ وَرَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَاقِفٌ بِعَرَفَةَ قَالَ سُفْيَانُ وَأَشُكُّ يَوْمَ جُمُعَةٍ أَوْ لَا يَعْنِي { الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمْ الْإِسْلَامَ دِينًا }

[अब्दुर्रहमान] ने हमें [सुफ़यान] [क़ैस बिन मुस्लिम] से [तहरीक बिन शिहाब] से बताया कि यहूदियों ने उमर से कहा: "ज़रूर, तुम एक आयत पढ़ो, अगर वह हम पर उतरी होती, तो हम ज़रूर उसके उतरने के दिन को दावत बनाते।" तब [उमर] ने जवाब दिया: "ज़रूर, मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि वह कहाँ उतरी थी, किस दिन उतरी थी, और मैं जानता हूँ कि जब वह उतरी थी तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) कहाँ थे, कि वह अराफ़ा के दिन उतरी थी और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अराफ़ा में वकूफ़ कर रहे थे।" सुफ़यान ने कहा: मुझे शक है कि आज शुक्रवार है या नहीं। वह आयत है: "आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन पूरा कर दिया है, तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी है, और तुम्हारे लिए इस्लाम को तुम्हारा दीन माना है।" (QS अल मायदा आयत: 3)।

अबू बकर और उमर के फतवे के अनुसार तवाफ़ और तहल्लुल की प्रथाएँ

इमाम अहमद : 262

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ عَنْ قَيْسِ بْنِ مُسْلِمٍ عَنْ طَارِقِ بْنِ شِهَابٍ عَنْ أَبِي مُوسَى قَالَ قَدِمْتُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَهُوَ بِالْبَطْحَاءِ فَقَالَ بِمَ أَهْلَلْتَ قُلْتُ بِإِهْلَالٍ كَإِهْلَالِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ هَلْ سُقْتَ مِنْ هَدْيٍ قُلْتُ لَا قَالَ طُفْ بِالْبَيْتِ وَبِالصَّفَا وَالْمَرْوَةِ ثُمَّ حِلَّ فَطُفْتُ بِالْبَيْتِ وَبِالصَّفَا وَالْمَرْوَةِ ثُمَّ أَتَيْتُ امْرَأَةً مِنْ قَوْمِي فَمَشَّطَتْنِي وَغَسَلَتْ رَأْسِي فَكُنْتُ أُفْتِي النَّاسَ بِذَلِكَ بِإِمَارَةِ أَبِي بَكْرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ وَإِمَارَةِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ فَإِنِّي لَقَائِمٌ فِي الْمَوْسِمِ إِذْ جَاءَنِي رَجُلٌ فَقَالَ إِنَّكَ لَا تَدْرِي مَا أَحْدَثَ أَمِيرُ الْمُؤْمِنِينَ فِي شَأْنِ النُّسُكِ فَقُلْتُ أَيُّهَا النَّاسُ مَنْ كُنَّا أَفْتَيْنَاهُ فُتْيَا فَهَذَا أَمِيرُ الْمُؤْمِنِينَ قَادِمٌ عَلَيْكُمْ فَبِهِ فَأْتَمُّوا فَلَمَّا قَدِمَ قُلْتُ مَا هَذَا الَّذِي قَدْ أَحْدَثْتَ فِي شَأْنِ النُّسُكِ قَالَ إِنْ نَأْخُذْ بِكِتَابِ اللَّهِ تَعَالَى فَإِنَّ اللَّهَ تَعَالَى قَالَ { وَأَتِمُّوا الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ لِلَّهِ } وَإِنْ نَأْخُذْ بِسُنَّةِ نَبِيِّنَا فَإِنَّهُ لَمْ يَحِلَّ حَتَّى نَحَرَ الْهَدْيَ

हमें [अब्दुर्रहमान] ने बताया है, हमें [सुफ़यान] ने बताया है [क़ैस बिन मुस्लिम] से [तहरीक बिन सैय्यब] से [अबू मूसा] ने कहा; मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास तब आया जब वह बथा में थे, तो उन्होंने पूछा: "तुमने हलाल (हज/उमरा शुरू करने का इरादा) किससे किया?" मैंने जवाब दिया; "जैसा इरादा पैगंबर ने किया था।" उन्होंने पूछा: "क्या तुम ज़बह किए हुए जानवर लाए थे?" मैंने जवाब दिया; "नहीं," उन्होंने कहा: "काबा, सफ़ा और मरवा में तवाफ़ करो फिर तुम तहल्लुल (उमरा/हज पूरा करो)।" तो मैंने काबा में तवाफ़ किया और शफ़ा और मरवा के बीच सई की, फिर मैं अपने लोगों में से अपनी पत्नी के पास आया और उसने मेरे बालों में कंघी की और मेरा सिर धोया। तो मैंने अबू बक्र और उमर के हुक्म पर ऐसे लोगों को फतवा जारी किया, और जब मैं हज के मौसम में ड्यूटी पर था, तो एक आदमी आया और बोला; "असल में, तुम नहीं जानते कि अमीरुल मुकमिनिन हज के कामों के मामले में क्या करते हैं।" मैंने जवाब दिया; "ऐ लोगों, जिसे भी हमने फतवा दिया है, फिर यह [अमीरुल मुकमिनिन] तुम्हारे पास आता है और तुम उसके पीछे चलते हो।" तो जब वह आया तो मैंने उससे पूछा; "तुमने हज के कामों के मामले में क्या किया है?" उसने जवाब दिया; "हम इसे सिर्फ़ अल्लाह तआला की किताब से लेते हैं, क्योंकि अल्लाह तआला ने कहा है: "और अल्लाह के लिए हज और उमराह पूरा करो" (QS अल बक़रा; 196) और अगर हम अपने पैगंबर की सुन्नत लेते हैं, तो वह ज़बह किए गए जानवर को ज़बह करने के बाद ही तहल्लुल में होगा।"

पैगंबर की मांग के अनुसार हजर अस्वद को चूमने की रियासत

इमाम अहमद : 263

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ عَنْ سُفْيَانَ عَنْ إِبْرَاهِيمَ بْنِ عَبْدِ الْأَعْلَى عَنْ سُوَيْدِ بْنِ غَفَلَةَ قَالَ رَأَيْتُ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ يُقَبِّلُ الْحَجَرَ وَيَقُولُ إِنِّي لَأَعْلَمُ أَنَّكَ حَجَرٌ لَا تَضُرُّ وَلَا تَنْفَعُ وَلَكِنِّي رَأَيْتُ أَبَا الْقَاسِمِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِكَ حَفِيًّا

उन्होंने हमें [अब्दुर्रहमान], [सुफ़यान], [इब्राहिम बिन अब्दुल अ'ला], [सुवैद बिन ग़फ़ला] से बताया; मैंने [उमर] को हजर (असवद) को चूमते हुए देखा और कहा; "वास्तव में, मुझे पता है कि तुम सिर्फ़ एक पत्थर हो, जो न तो कोई नुकसान पहुंचा सकता है और न ही फ़ायदा, लेकिन क्योंकि मैंने अबुल कासिम सलल्लाहु अलैहि वसल्लम को तुम्हें ध्यान से चूमते हुए देखा।"

पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सूर्योदय से पहले मुज़दलफ़ा को छोड़कर राजनेताओं की आदतों को विचलित कर दिया

इमाम अहमद : 264

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ عَنْ سُفْيَانَ وَعَبْدُ الرَّزَّاقِ أَنْبَأَنَا سُفْيَانُ عَنِ أَبِي إِسْحَاقَ عَنْ عَمْرِو بْنِ مَيْمُونٍ قَالَ قَالَ عُمَرُ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ عَبْدُ الرَّزَّاقِ سَمِعْتُ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ إِنَّ الْمُشْرِكِينَ كَانُوا لَا يُفِيضُونَ مِنْ جَمْعٍ حَتَّى تُشْرِقَ الشَّمْسُ عَلَى ثَبِيرٍ قَالَ عَبْدُ الرَّزَّاقِ وَكَانُوا يَقُولُونَ أَشْرِقْ ثَبِيرُ كَيْمَا نُغِيرُ يَعْنِي فَخَالَفَهُمْ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَدَفَعَ قَبْلَ أَنْ تَطْلُعَ الشَّمْسُ

उन्होंने कहा, "अब्दुर्रहमान ने हमें [सुफ़यान] से बताया है और अब्दुर्रज्जाक ने हमें [सुफ़यान] ने [अबू इसहाक] से [अमरू बिन मैमुन] से बताया है।" उन्होंने कहा, "उमर ने कहा; -अब्दुर्रज्जाक ने कहा कि मैंने उमर को यह कहते सुना; - "कि मुशरिकों ने मुदज़लिफ़ा तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि त्साबीर पर सूरज नहीं उग आया," अब्दुर्रज्जाक ने कहा; और उन्होंने कहा; "त्साबीर (ऊपर का सूरज) उग आया ताकि हम तुरंत निकल सकें," उनका मतलब था; फिर पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनसे सहमत नहीं हुए और उन्होंने सूरज उगने से पहले ही मुज़दलिफ़ा छोड़ दिया।"

कुरान में बताए गए पत्थर मारने के कानून के बारे में उमर की चेतावनी

इमाम अहमद : 265

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ حَدَّثَنَا مَالِكٌ عَنْ الزُّهْرِيِّ عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ قَالَ قَالَ عُمَرُ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ إِنَّ اللَّهَ تَعَالَى بَعَثَ مُحَمَّدًا صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَأَنْزَلَ عَلَيْهِ الْكِتَابَ فَكَانَ فِيمَا أَنْزَلَ عَلَيْهِ آيَةُ الرَّجْمِ فَقَرَأْنَا بِهَا وَعَقَلْنَاهَا وَوَعَيْنَاهَا فَأَخْشَى أَنْ يَطُولَ بِالنَّاسِ عَهْدٌ فَيَقُولُوا إِنَّا لَا نَجِدُ آيَةَ الرَّجْمِ فَتُتْرَكَ فَرِيضَةٌ أَنْزَلَهَا اللَّهُ تَعَالَى وَإِنَّ الرَّجْمَ فِي كِتَابِ اللَّهِ تَعَالَى حَقٌّ عَلَى مَنْ زَنَى إِذَا أَحْصَنَ مِنْ الرِّجَالِ وَالنِّسَاءِ إِذَا قَامَتْ الْبَيِّنَةُ أَوْ كَانَ الْحَبَلُ أَوْ الِاعْتِرَافُ

हमें [अब्दुर्रहमान] ने बताया है हमें [मलिक] ने [अज़ ज़ुहरी] से ['उबैदिल्लाह बिन अब्दुल्लाह] से [इब्न अब्बास] से बताया है उसने कहा; [उमर] ने कहा; "वास्तव में अल्लाह तआला ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भेजा और उन पर किताब (अल कुरान) उतारी। और उन पर उतारी गई आयतों में पत्थर मारने के कानून के बारे में आयत थी। हमने इसे पढ़ा, समझा और आयत को समझा, इसलिए मुझे डर है कि लंबे समय में लोग कहेंगे: "वास्तव में हमें पत्थर मारने के कानून के बारे में कोई आयत नहीं मिलती है।" फिर एक दायित्व जो अल्लाह तआला ने उतारा है, छोड़ दिया जाता है। वास्तव में पत्थर मारने का कानून अल्लाह तआला की किताब में उस व्यक्ति के लिए एक अधिकार (सच्चा) है जो व्यभिचार करता है, यदि वह मुहशोन है, यदि सबूत है, या गर्भवती है या स्वीकारोक्ति के साथ है।

कुरान को विभिन्न बोलियों और आसानी से पढ़ने योग्य मार्गदर्शन में अवतरित किया गया

इमाम अहमद : 266

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ عَنْ مَالِكٍ عَنِ الزُّهْرِيِّ عَنْ عُرْوَةَ عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَبْدٍ عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ سَمِعْتُ هِشَامَ بْنَ حَكِيمٍ يَقْرَأُ سُورَةَ الْفُرْقَانِ فِي الصَّلَاةِ عَلَى غَيْرِ مَا أَقْرَؤُهَا وَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَقْرَأَنِيهَا فَأَخَذْتُ بِثَوْبِهِ فَذَهَبْتُ بِهِ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي سَمِعْتُهُ يَقْرَأُ سُورَةَ الْفُرْقَانِ عَلَى غَيْرِ مَا أَقْرَأْتَنِيهَا فَقَالَ اقْرَأْ فَقَرَأَ الْقِرَاءَةَ الَّتِي سَمِعْتُهَا مِنْهُ فَقَالَ هَكَذَا أُنْزِلَتْ ثُمَّ قَالَ لِي اقْرَأْ فَقَرَأْتُ فَقَالَ هَكَذَا أُنْزِلَتْ إِنَّ هَذَا الْقُرْآنَ أُنْزِلَ عَلَى سَبْعَةِ أَحْرُفٍ فَاقْرَءُوا مَا تَيَسَّرَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ أَنْبَأَنَا مَعْمَرٌ عَنِ الزُّهْرِيِّ عَنْ عُرْوَةَ عَنِ الْمِسْوَرِ بْنِ مَخْرَمَةَ وَعَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَبْدٍ الْقَارِيِّ أَنَّهُمَا سَمِعَا عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ يَقُولُ مَرَرْتُ بِهِشَامِ بْنِ حَكِيمِ بْنِ حِزَامٍ يَقْرَأُ سُورَةَ الْفُرْقَانِ فَذَكَرَ مَعْنَاهُ

उन्होंने हमें [अब्दुर्रहमान] से [मलिक] से [अज़ ज़ुहरी] से [उरवाह] से [अब्दुर्रहमान बिन अब्द] से [उमर बिन अल ख़त्थाब] से बताया; "मैंने हिसाम बिन हकीम को नमाज़ में सूरह अल फुरकान पढ़ते सुना, जो मैंने पढ़ा था वैसा नहीं था, हालाँकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे इसे पढ़कर सुनाया था, तो मैंने उनके कपड़े खींचे और उन्हें रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास ले गया, फिर मैंने कहा; "ऐ रसूलल्लाह, मैंने उन्हें सूरह अल फुरकान पढ़ते सुना, जो मैंने पढ़ा था वैसा नहीं था।" तो उन्होंने कहा: "पढ़ो (ऐ हिशाम)!" हिशाम ने फिर पढ़ा। मैंने उनसे पढ़ते हुए सुना, फिर उन्होंने कहा: "इस तरह यह खत नाज़िल हुआ।" फिर उन्होंने फिर कहा: "इसे पढ़ो (ऐ उमर)!" [उरवाह] [अल मिस्वर बिन मखराम] और [अब्दुर्रहमान बिन अब्दुल क़ोरी] से कि उन दोनों ने उमर को यह कहते सुना; "मैं हिशाम बिन हकीम बिन हिज़ाम के पास से गुज़रा और वह अल फुरकान खत पढ़ रहे थे," फिर उन्होंने हदीस का मतलब बताया।

पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सिफारिश कि वेतन प्राप्त करें और उसे दें

इमाम अहमद : 267

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْمُبَارَكِ عَنْ مَعْمَرٍ عَنِ الزُّهْرِيِّ عَنِ السَّائِبِ بْنِ يَزِيدَ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ السَّعْدِيِّ قَالَ قَالَ لِي عُمَرُ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَلَمْ أُحَدَّثْ أَنَّكَ تَلِي مِنْ أَعْمَالِ النَّاسِ أَعْمَالًا فَإِذَا أُعْطِيتَ الْعُمَالَةَ لَمْ تَقْبَلْهَا قَالَ نَعَمْ قَالَ فَمَا تُرِيدُ إِلَى ذَاكَ قَالَ أَنَا غَنِيٌّ لِي أَعْبُدٌ وَلِي أَفْرَاسٌ أُرِيدُ أَنْ يَكُونَ عَمَلِي صَدَقَةً عَلَى الْمُسْلِمِينَ قَالَ لَا تَفْعَلْ فَإِنِّي كُنْتُ أَفْعَلُ مِثْلَ الَّذِي تَفْعَلُ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُعْطِينِي الْعَطَاءَ فَأَقُولُ أَعْطِهِ مَنْ هُوَ أَفْقَرُ إِلَيْهِ مِنِّي فَقَالَ خُذْهُ فَإِمَّا أَنْ تَمَوَّلَهُ وَإِمَّا أَنْ تَصَدَّقَ بِهِ وَمَا آتَاكَ اللَّهُ مِنْ هَذَا الْمَالِ وَأَنْتَ غَيْرُ مُشْرِفٍ لَهُ وَلَا سَائِلِهِ فَخُذْهُ وَمَا لَا فَلَا تُتْبِعْهُ نَفْسَكَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ حَدَّثَنَا مَعْمَرٌ عَنِ الزُّهْرِيِّ عَنِ السَّائِبِ بْنِ يَزِيدَ قَالَ لَقِيَ عُمَرُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ السَّعْدِيِّ فَذَكَرَ مَعْنَاهُ إِلَّا أَنَّهُ قَالَ تَصَدَّقْ بِهِ وَقَالَ لَا تُتْبِعْهُ نَفْسَكَ

हमें बताया है [अब्दुर्रहमान] हमें बताया है [अब्दुल्ला बिन अल मुबारक] [ममार] से [अज़ ज़ुहरी] से [अस सायब बिन यज़ीद] से [अब्दुल्ला बिन अस सा'दी] से उन्होंने कहा; [उमर] ने मुझसे कहा; "मुझे (एक बात के बारे में) नहीं बताया गया है कि आप लोगों के काम के प्रभारी हैं, फिर जब आपको मजदूरी दी जाती है तो आप इसे स्वीकार नहीं करते हैं?" अब्दुल्ला बिन सा'दी ने उत्तर दिया; "हां" उमर ने पूछा; "तो फिर आप इससे क्या चाहते हैं?" उन्होंने उत्तर दिया; "मैं अच्छी तरह से हूं, मेरे पास कुछ दास और कुछ घोड़े हैं, इसलिए मैं चाहता हूं कि मेरा यह काम मुसलमानों के लिए दान हो", उमर ने कहा; "ऐसा मत करो, क्योंकि मैंने वही किया जो तुमने किया, पहले अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे (काम की मज़दूरी) दी, फिर मैंने कहा: "यह मज़दूरी किसी ऐसे को दे दो जो मुझसे ज़्यादा गरीब हो" तो उन्होंने कहा: "ले लो, तुम इसे इन्वेस्ट कर सकते हो या दान कर सकते हो, अल्लाह तुम्हें इस दौलत में से जो देता है, अगर तुम इसकी उम्मीद नहीं करते और इसके लिए नहीं कहते, तो इसे ले लो, और अगर यह ऐसा नहीं है तो इसे मत करो। इसे अपना कहो।" हमें [अब्दुर्रज़्ज़ाक] ने बताया है, हमें [ममार] ने [अज़ ज़ुहरी] से [अस सायब बिन यज़ीद] से बताया है, उन्होंने कहा; [उमर] अब्दुल्लाह बिन अस सा'दी से मिले। फिर अस सायब ने हदीस का मतलब बताया, लेकिन उन्होंने कहा, कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "उसे दान दो," और उन्होंने कहा; "तो इसे अपना मत कहो।" तुम्हारा।"

दी गई भिक्षा को वापस खरीदने पर प्रतिबन्ध

इमाम अहमद : 268

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ عَنْ مَالِكٍ عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ حَمَلْتُ عَلَى فَرَسٍ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَأَضَاعَهُ صَاحِبُهُ فَأَرَدْتُ أَنْ أَبْتَاعَهُ وَظَنَنْتُ أَنَّهُ بَائِعُهُ بِرُخْصٍ فَقُلْتُ حَتَّى أَسْأَلَ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ لَا تَبْتَعْهُ وَإِنْ أَعْطَاكَهُ بِدِرْهَمٍ فَإِنَّ الَّذِي يَعُودُ فِي صَدَقَتِهِ فَكَالْكَلْبِ يَعُودُ فِي قَيْئِهِ

हमें [अब्दुर्रहमान] ने [मलिक] से [ज़ैद बिन असलम] से [अपने पिता] से [उमर बिन अल खत्थब] तक बताया, उन्होंने कहा; मैंने एक बार अल्लाह के रास्ते में (जिहाद) के लिए एक घोड़े का इस्तेमाल किया, फिर घोड़े के मालिक ने उसे छोड़ दिया, इसलिए मैं घोड़ा खरीदना चाहता था, और मैंने सोचा कि वह इसे सस्ते दाम पर बेच देगा, मैंने कहा; "रुको जब तक मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछूं," तब उन्होंने कहा: "इसे मत खरीदो भले ही वह तुम्हें दिरहम दें, क्योंकि जो व्यक्ति अपना दान (देना) वापस ले लेता है, वह उस कुत्ते की तरह है जो अपनी उल्टी वापस निगल लेता है।"

ऐदुल फ़ितरी और ऐदुल अज़हा के त्योहारों पर रोज़ा रखने की मनाही

इमाम अहमद : 269

قَالَ قَرَأْتُ عَلَى عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَنْ مَالِكٍ عَنِ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ أَبِي عُبَيْدٍ مَوْلَى ابْنِ أَزْهَرَ أَنَّهُ قَالَ شَهِدْتُ الْعِيدَ مَعَ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ فَجَاءَ فَصَلَّى ثُمَّ انْصَرَفَ فَخَطَبَ النَّاسَ فَقَالَ إِنَّ هَذَيْنِ يَوْمَانِ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَنْ صِيَامِهِمَا يَوْمُ فِطْرِكُمْ مِنْ صِيَامِكُمْ وَالْآخَرُ يَوْمٌ تَأْكُلُونَ فِيهِ مِنْ نُسُكِكُمْ

(अहमद बिन हम्बल) ने कहा; मैंने [अब्दुर्रहमान] को [मलिक] से [इब्न शिहाब] से [अबू उबैद, इब्न अज़हर के पुराने गुलाम] से पढ़कर सुनाया कि उन्होंने कहा; "मैंने [उमर बिन अल खत्थब] के साथ ईद की नमाज़ में हिस्सा लिया, फिर उन्होंने नमाज़ पढ़ी, नमाज़ के बाद वह लोगों को उपदेश देने के लिए दौड़े, और कहा: "बेशक, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन दो दिनों में रोज़ा रखने से मना किया है, क्योंकि (ऐदुल फ़िथरी) वह दिन है जब तुम अपना रोज़ा तोड़ते हो, और दूसरा (ऐदुल अदलहा) इसलिए है क्योंकि जिस दिन तुम अपनी कुर्बानी (कसाई का मांस) खाते हो।"

पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आदेश है कि पत्नियों को नमाज़ पढ़ने से न रोका जाए

इमाम अहमद : 270

حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ عَنْ يَحْيَى بْنِ أَبِي إِسْحَاقَ عَنْ سَالِمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ قَالَ كَانَ عُمَرُ رَجُلًا غَيُورًا فَكَانَ إِذَا خَرَجَ إِلَى الصَّلَاةِ اتَّبَعَتْهُ عَاتِكَةُ ابْنَةُ زَيْدٍ فَكَانَ يَكْرَهُ خُرُوجَهَا وَيَكْرَهُ مَنْعَهَا وَكَانَ يُحَدِّثُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِذَا اسْتَأْذَنَتْكُمْ نِسَاؤُكُمْ إِلَى الصَّلَاةِ فَلَا تَمْنَعُوهُنَّ

हमें [इस्माईल बिन इब्राहीम] ने [याह्या बिन अबू इसहाक] से [सलीम बिन अब्दुल्ला] बताया कि उन्होंने कहा; [उमर] जलन रखने वाले इंसान थे, जब वह 'अतीका' की नमाज़ पढ़ने के लिए बाहर गए, तो ज़ैद की बेटी उनके पीछे चली गई, हालाँकि उन्हें 'अतीका' का बाहर जाना पसंद नहीं था और वह उन्हें मना भी नहीं करना चाहते थे, और उन्होंने मुझे बताया कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा था: "अगर तुम्हारी पत्नियाँ तुमसे नमाज़ पढ़ने की इजाज़त माँगें, तो उन्हें मना मत करो।"

उमर ने पैगंबर द्वारा खैबर की भूमि के वितरण का एक उदाहरण लिया

इमाम अहमद : 271

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ عَنْ مَالِكٍ عَنْ زَيْدِ بْنِ أَسْلَمَ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عُمَرَ قَالَ لَوْلَا آخِرُ الْمُسْلِمِينَ مَا فُتِحَتْ قَرْيَةٌ إِلَّا قَسَمْتُهَا كَمَا قَسَمَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَيْبَرَ

[अब्दुर्रहमान] ने हमें [मलिक] से [ज़ैद बिन असलम] से [अपने पिता] से [उमर] से वर्णित किया, जिन्होंने कहा: "यदि मुसलमानों के अंतिम लोग न होते, तो कोई भी गाँव जीता नहीं जा सकता था, सिवाय इसके कि मैं उसे विभाजित कर देता, जैसा कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने खैबर की भूमि को विभाजित किया था।"

महिलाओं को अत्यधिक दहेज देने पर प्रतिबंध

इमाम अहमद : 272

حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ حَدَّثَنَا سَلَمَةُ بْنُ عَلْقَمَةَ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ سِيرِينَ قَالَ نُبِّئْتُ عَنْ أَبِي الْعَجْفَاءِ السُّلَمِيِّ قَالَ سَمِعْتُ عُمَرَ يَقُولُ أَلَا لَا تُغْلُوا صُدُقَ النِّسَاءِ أَلَا لَا تُغْلُوا صُدُقَ النِّسَاءِ فَإِنَّهَا لَوْ كَانَتْ مَكْرُمَةً فِي الدُّنْيَا أَوْ تَقْوَى عِنْدَ اللَّهِ كَانَ أَوْلَاكُمْ بِهَا النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مَا أَصْدَقَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ امْرَأَةً مِنْ نِسَائِهِ وَلَا أُصْدِقَتْ امْرَأَةٌ مِنْ بَنَاتِهِ أَكْثَرَ مِنْ ثِنْتَيْ عَشْرَةَ أُوقِيَّةً وَإِنَّ الرَّجُلَ لَيُبْتَلَى بِصَدُقَةِ امْرَأَتِهِ وَقَالَ مَرَّةً وَإِنَّ الرَّجُلَ لَيُغْلِي بِصَدُقَةِ امْرَأَتِهِ حَتَّى تَكُونَ لَهَا عَدَاوَةٌ فِي نَفْسِهِ وَحَتَّى يَقُولَ كَلِفْتُ إِلَيْكِ عَلَقَ الْقِرْبَةِ قَالَ وَكُنْتُ غُلَامًا عَرَبِيًّا مُوَلَّدًا لَمْ أَدْرِ مَا عَلَقُ الْقِرْبَةِ قَالَ وَأُخْرَى تَقُولُونَهَا لِمَنْ قُتِلَ فِي مَغَازِيكُمْ وَمَاتَ قُتِلَ فُلَانٌ شَهِيدًا وَمَاتَ فُلَانٌ شَهِيدًا وَلَعَلَّهُ أَنْ يَكُونَ قَدْ أَوْقَرَ عَجُزَ دَابَّتِهِ أَوْ دَفَّ رَاحِلَتِهِ ذَهَبًا أَوْ وَرِقًا يَلْتَمِسُ التِّجَارَةَ لَا تَقُولُوا ذَاكُمْ وَلَكِنْ قُولُوا كَمَا قَالَ النَّبِيُّ أَوْ كَمَا قَالَ مُحَمَّدٌ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مَنْ قُتِلَ أَوْ مَاتَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَهُوَ فِي الْجَنَّةِ

हमें [इस्माईल] ने बताया है कि हमें [सलमा बिन अलकामा] ने [मुहम्मद बिन सिरिन] से बताया है उन्होंने कहा; यह [मुझे] [अबुल अजफा' अस सुलामी] से बताया गया था उन्होंने कहा; मैंने [उमर] को कहते सुना; "जान लो, महिलाओं के दहेज के मामले में अतिशयोक्ति न करो, जान लो, महिलाओं के दहेज के मामले में अतिशयोक्ति न करो, क्योंकि यदि कार्य दुनिया में सम्माननीय है या अल्लाह के प्रति भक्ति है, तो वह व्यक्ति जो उस मामले में अधिक योग्य है वह पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैं, जबकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी पत्नियों को दहेज नहीं दिया और अपनी बेटियों के लिए भी बारह उकिया से अधिक दहेज नहीं मांगा, वास्तव में एक आदमी निश्चित रूप से अपनी पत्नी के दहेज से परीक्षण किया जाएगा।" एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा; "असल में, एक आदमी अपनी पत्नी को तब तक ज़्यादा मेहर देगा जब तक वह उसकी दुश्मन न हो जाए और कहे: 'तुम्हारी वजह से मुझे अपने गले में यह क़िरबा (चमड़े का बर्तन) पहनना पड़ रहा है।" अबुल औजा ने कहा: "उस समय मैं एक बेडौइन बच्चा था जो अभी छोटा था, और मुझे नहीं पता था कि गले में बर्तन पहनना क्या होता है।" उमर ने कहा: "और दूसरा यह है कि जब कोई लड़ाई में मारा जाता है और फिर वह मर जाता है, तो तुम कहते हो: 'फलां शहीद हुआ,' जबकि शायद वह व्यापार के मकसद से अपनी सवारी या घोड़े की काठी में सोना या चांदी भरकर लाया हो, तो ऐसा मत कहो, बल्कि जैसा पैगंबर या मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा था, वैसा कहो: "जो कोई अल्लाह के रास्ते में लड़ते हुए मारा जाएगा वह जन्नत में जाएगा।"

उमर ने याद रखा कि लोगों का मूल्यांकन केवल उनके ज़ाहिर के आधार पर नहीं करना चाहिए

इमाम अहमद : 273

حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ أَنْبَأَنَا الْجُرَيْرِيُّ سَعِيدٌ عَنْ أَبِي نَضْرَةَ عَنْ أَبِي فِرَاسٍ قَالَ خَطَبَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ فَقَالَ يَا أَيُّهَا النَّاسُ أَلَا إِنَّا إِنَّمَا كُنَّا نَعْرِفُكُمْ إِذْ بَيْنَ ظَهْرَيْنَا النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَإِذْ يَنْزِلُ الْوَحْيُ وَإِذْ يُنْبِئُنَا اللَّهُ مِنْ أَخْبَارِكُمْ أَلَا وَإِنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَدْ انْطَلَقَ وَقَدْ انْقَطَعَ الْوَحْيُ وَإِنَّمَا نَعْرِفُكُمْ بِمَا نَقُولُ لَكُمْ مَنْ أَظْهَرَ مِنْكُمْ خَيْرًا ظَنَنَّا بِهِ خَيْرًا وَأَحْبَبْنَاهُ عَلَيْهِ وَمَنْ أَظْهَرَ مِنْكُمْ لَنَا شَرًّا ظَنَنَّا بِهِ شَرًّا وَأَبْغَضْنَاهُ عَلَيْهِ سَرَائِرُكُمْ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَ رَبِّكُمْ أَلَا إِنَّهُ قَدْ أَتَى عَلَيَّ حِينٌ وَأَنَا أَحْسِبُ أَنَّ مَنْ قَرَأَ الْقُرْآنَ يُرِيدُ اللَّهَ وَمَا عِنْدَهُ فَقَدْ خُيِّلَ إِلَيَّ بِآخِرَةٍ أَلَا إِنَّ رِجَالًا قَدْ قَرَءُوهُ يُرِيدُونَ بِهِ مَا عِنْدَ النَّاسِ فَأَرِيدُوا اللَّهَ بِقِرَاءَتِكُمْ وَأَرِيدُوهُ بِأَعْمَالِكُمْ أَلَا إِنِّي وَاللَّهِ مَا أُرْسِلُ عُمَّالِي إِلَيْكُمْ لِيَضْرِبُوا أَبْشَارَكُمْ وَلَا لِيَأْخُذُوا أَمْوَالَكُمْ وَلَكِنْ أُرْسِلُهُمْ إِلَيْكُمْ لِيُعَلِّمُوكُمْ دِينَكُمْ وَسُنَّتَكُمْ فَمَنْ فُعِلَ بِهِ شَيْءٌ سِوَى ذَلِكَ فَلْيَرْفَعْهُ إِلَيَّ فَوَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ إِذَنْ لَأُقِصَّنَّهُ مِنْهُ فَوَثَبَ عَمْرُو بْنُ الْعَاصِ فَقَالَ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ أَوَرَأَيْتَ إِنْ كَانَ رَجُلٌ مِنْ الْمُسْلِمِينَ عَلَى رَعِيَّةٍ فَأَدَّبَ بَعْضَ رَعِيَّتِهِ أَئِنَّكَ لَمُقْتَصُّهُ مِنْهُ قَالَ إِي وَالَّذِي نَفْسُ عُمَرَ بِيَدِهِ إِذَنْ لَأُقِصَّنَّهُ مِنْهُ وَقَدْ رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُقِصُّ مِنْ نَفْسِهِ أَلَا لَا تَضْرِبُوا الْمُسْلِمِينَ فَتُذِلُّوهُمْ وَلَا تُجَمِّرُوهُمْ فَتَفْتِنُوهُمْ وَلَا تَمْنَعُوهُمْ حُقُوقَهُمْ فَتُكَفِّرُوهُمْ وَلَا تُنْزِلُوهُمْ الْغِيَاضَ فَتُضَيِّعُوهُمْ حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ مَرَّةً أُخْرَى أَخْبَرَنَا سَلَمَةُ بْنُ عَلْقَمَةَ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ سِيرِينَ قَالَ نُبِّئْتُ عَنْ أَبِي الْعَجْفَاءِ قَالَ سَمِعْتُ عُمَرَ يَقُولُ أَلَا لَا تُغْلُوا صُدُقَ النِّسَاءِ فَذَكَرَ الْحَدِيثَ قَالَ إِسْمَاعِيلُ وَذَكَرَ أَيُّوبُ وَهِشَامٌ وَابْنُ عَوْنٍ عَنْ مُحَمَّدٍ عَنْ أَبِي الْعَجْفَاءِ عَنْ عُمَرَ نَحْوًا مِنْ حَدِيثِ سَلَمَةَ إِلَّا أَنَّهُمْ قَالُوا لَمْ يَقُلْ مُحَمَّدٌ نُبِّئْتُ عَنْ أَبِي الْعَجْفَاءِ

हमें बताया है [इस्माईल] ने हमें बताया है [अल जुरैरी सईद] [अबू नदल्रा] से [अबू फिरोस] से उन्होंने कहा; [उमर बिन ख़त्थाब] ने उपदेश दिया, उन्होंने कहा; "ऐ लोगों, जान लो कि हम तुम्हें तब से जानते थे जब हमारे बीच पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक खुलासे के साथ आए थे और अल्लाह ने हमें तुम्हारे बारे में बताया था, जान लो कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम गुज़र चुके थे और खुलासे खत्म हो चुके थे, और हमने तुम्हें उससे जाना जो हमने तुमसे कहा था। तुममें से जिसकी रूह अच्छी दिखती थी तो हमने उसे अच्छा इंसान माना और हम उससे प्यार करते थे, और तुममें से जिसकी रूह बुरी दिखती थी तो हमने उसे बुरा माना और हम उससे नफ़रत करेंगे, तुम्हारे राज़ तुम्हारे और तुम्हारे रब के बीच हैं, तुम जानते हो, एक बार मुझे एक मौका मिला और मैंने सोचा कि जो कोई कुरान को अल्लाह की खुशी और उसके पास जो है, उसकी उम्मीद के साथ पढ़ता है, ताकि मैं आख़िरत के बारे में सोचूं, तुम जानते हो, असल में लोगों ने इसे इंसानों में जो है, उसकी उम्मीद के साथ पढ़ा है, तो तुम अपनी पढ़ाई से अल्लाह पर उम्मीद रखो, और अपने कामों से अल्लाह पर उम्मीद रखो, जान लो कि मैंने, अल्लाह की कसम, अपने बंदों को तुम लोगों के पास नहीं भेजा क्योंकि मैंने तुम्हारी खाल नहीं फाड़ी और न ही तुम्हारा सामान लिया, बल्कि मैंने उन्हें तुम्हारे पास भेजा है तब अम्र इब्न अल-अस खड़े हुए और कहा: "ऐ विश्वासियों के कमांडर, क्या होगा यदि मुसलमानों में से एक आदमी अपने लोगों का नेतृत्व करे, और फिर वह उनमें से कुछ को यातना दे, तो क्या आप उसके लिए बदला लेंगे?" उमर ने उत्तर दिया: "हां, जिसके हाथ में उमर की आत्मा है, मैं निश्चित रूप से उसके लिए बदला लूंगा, और मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) को उसके खिलाफ बदला लेते देखा है, इसलिए मुसलमानों को अपमानित करने के बिंदु तक मत मारो, उन्हें पीड़ा देने के बिंदु तक मजबूर न करें, उन्हें काफिर बनाने के उनके अधिकारों को न रोकें, और उन्हें उपेक्षा के बिंदु तक अभाव में न छोड़ें।" इस्माईल ने हमें एक अन्य अवसर पर वर्णित किया है जो उन्होंने कहा: हमें सलमा बिन अलकामा ने मुहम्मद बिन सिरीन से बताया है कि उन्होंने कहा; उन्होंने कहा कि मुझे अबुल 'औजा' से यह बताया गया है; मैंने उमर को यह कहते सुना; "बस जान लो, औरतों के दहेज के मामले में ज़्यादा मत करो।" फिर उन्होंने हदीस का ज़िक्र किया, इस्माइल ने कहा; और उन्होंने अय्यूब, हिशाम और इब्न 'औन का ज़िक्र किया, मुहम्मद से अबुल 'अजफ़ा' से उमर से सलमा हदीस के अनुसार, उन्होंने कहा; "लेकिन मुहम्मद ने नहीं कहा; मुझे अबुल 'अजफ़ा' से यह बताया गया है।

परिवार के विलाप के कारण शव को यातना दी गई

इमाम अहमद : 274

حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ حَدَّثَنَا أَيُّوبُ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي مُلَيْكَةَ قَالَ كُنْتُ عِنْدَ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ وَنَحْنُ نَنْتَظِرُ جَنَازَةَ أُمِّ أَبَانَ ابْنَةِ عُثْمَانَ بْنِ عَفَّانَ وَعِنْدَهُ عَمْرُو بْنُ عُثْمَانَ فَجَاءَ ابْنُ عَبَّاسٍ يَقُودُهُ قَائِدُهُ قَالَ فَأُرَاهُ أَخْبَرَهُ بِمَكَانِ ابْنِ عُمَرَ فَجَاءَ حَتَّى جَلَسَ إِلَى جَنْبِي وَكُنْتُ بَيْنَهُمَا فَإِذَا صَوْتٌ مِنْ الدَّارِ فَقَالَ ابْنُ عُمَرَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ إِنَّ الْمَيِّتَ يُعَذَّبُ بِبُكَاءِ أَهْلِهِ عَلَيْهِ فَأَرْسَلَهَا عَبْدُ اللَّهِ مُرْسَلَةً قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ كُنَّا مَعَ أَمِيرِ الْمُؤْمِنِينَ عُمَرَ حَتَّى إِذَا كُنَّا بِالْبَيْدَاءِ إِذَا هُوَ بِرَجُلٍ نَازِلٍ فِي ظِلِّ شَجَرَةٍ فَقَالَ لِي انْطَلِقْ فَاعْلَمْ مَنْ ذَاكَ فَانْطَلَقْتُ فَإِذَا هُوَ صُهَيْبٌ فَرَجَعْتُ إِلَيْهِ فَقُلْتُ إِنَّكَ أَمَرْتَنِي أَنْ أَعْلَمَ لَكَ مَنْ ذَاكَ وَإِنَّهُ صُهَيْبٌ فَقَالَ مُرُوهُ فَلْيَلْحَقْ بِنَا فَقُلْتُ إِنَّ مَعَهُ أَهْلَهُ قَالَ وَإِنْ كَانَ مَعَهُ أَهْلُهُ وَرُبَّمَا قَالَ أَيُّوبُ مَرَّةً فَلْيَلْحَقْ بِنَا فَلَمَّا بَلَغْنَا الْمَدِينَةَ لَمْ يَلْبَثْ أَمِيرُ الْمُؤْمِنِينَ أَنْ أُصِيبَ فَجَاءَ صُهَيْبٌ فَقَالَ وَا أَخَاهُ وَا صَاحِبَاهُ فَقَالَ عُمَرُ أَلَمْ تَعْلَمْ أَوَلَمْ تَسْمَعْ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِنَّ الْمَيِّتَ لَيُعَذَّبُ بِبَعْضِ بُكَاءِ أَهْلِهِ عَلَيْهِ فَأَمَّا عَبْدُ اللَّهِ فَأَرْسَلَهَا مُرْسَلَةً وَأَمَّا عُمَرُ فَقَالَ بِبَعْضِ بُكَاءِ فَأَتَيْتُ عَائِشَةَ فَذَكَرْتُ لَهَا قَوْلَ عُمَرَ فَقَالَتْ لَا وَاللَّهِ مَا قَالَهُ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّ الْمَيِّتَ يُعَذَّبُ بِبُكَاءِ أَحَدٍ وَلَكِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِنَّ الْكَافِرَ لَيَزِيدُهُ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ بِبُكَاءِ أَهْلِهِ عَذَابًا وَإِنَّ اللَّهَ لَهُوَ أَضْحَكَ وَأَبْكَى { وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى } قَالَ أَيُّوبُ وَقَالَ ابْنُ أَبِي مُلَيْكَةَ حَدَّثَنِي الْقَاسِمُ قَالَ لَمَّا بَلَغَ عَائِشَةَ قَوْلُ عُمَرَ وَابْنِ عُمَرَ قَالَتْ إِنَّكُمْ لَتُحَدِّثُونِي عَنْ غَيْرِ كَاذِبَيْنِ وَلَا مُكَذَّبَيْنِ وَلَكِنَّ السَّمْعَ يُخْطِئُ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ أَنْبَأَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ أَخْبَرَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَبِي مُلَيْكَةَ فَذَكَرَ مَعْنَى حَدِيثِ أَيُّوبَ إِلَّا أَنَّهُ قَالَ فَقَالَ ابْنُ عُمَرَ لِعَمْرِو بْنِ عُثْمَانَ وَهُوَ مُوَاجِهُهُ أَلَا تَنْهَى عَنْ الْبُكَاءِ فَإِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِنَّ الْمَيِّتَ لَيُعَذَّبُ بِبُكَاءِ أَهْلِهِ عَلَيْهِ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ أَنْبَأَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ أَخْبَرَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَبِي مُلَيْكَةَ قَالَ تُوُفِّيَتْ ابْنَةٌ لِعُثْمَانَ بْنِ عَفَّانَ بِمَكَّةَ فَحَضَرَهَا ابْنُ عُمَرَ وَابْنُ عَبَّاسٍ وَإِنِّي لَجَالِسٌ بَيْنَهُمَا فَقَالَ ابْنُ عُمَرَ لِعَمْرِو بْنِ عُثْمَانَ وَهُوَ مُوَاجِهُهُ أَلَا تَنْهَى عَنْ الْبُكَاءِ فَإِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ إِنَّ الْمَيِّتَ لَيُعَذَّبُ بِبُكَاءِ أَهْلِهِ عَلَيْهِ فَذَكَرَ نَحْوَ حَدِيثِ إِسْمَاعِيلَ عَنْ أَيُّوبَ عَنْ ابْنِ أَبِي مُلَيْكَةَ

हमें [इस्माईल] ने बताया है कि हमें [अय्यूब] ने [अब्दुल्ला बिन अबी मुलैका] से बताया है उन्होंने कहा; "जब मैं [अब्दुल्ला बिन उमर] के पास उम्म अबान की बेटी उथमन बिन अफ़्फ़ान के शरीर के आने का इंतज़ार कर रहा था, और अब्दुल्ला बिन उमर के पास 'अमरू बिन उथमन थे, तब इब्न अब्बास एक मार्गदर्शक के मार्गदर्शन में आए," अब्दुल्ला बिन अबी मुलैका ने कहा; "मैंने उस व्यक्ति को देखा जो इब्न अब्बास का मार्गदर्शन कर रहा था, उसे इब्न उमर की स्थिति बता रहा था, फिर इब्न अब्बास आए और मेरे पास बैठ गए, इसलिए मैं उन दोनों के बीच में था, अचानक घर के अंदर से एक आवाज़ आई, तब इब्न उमर ने कहा; "मैंने एक बार अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह कहते हुए सुना था: "वास्तव में मृतक को उसके परिवार के आंसुओं के कारण दंडित किया जाएगा।" तब अब्दुल्ला बिन उमर ने हदीस के शब्दों का सामान्य रूप से (बिना किसी विवरण के) उल्लेख किया। फिर [इब्न अब्बास] ने कहा; "हम अमीरुल मुकमिनीन उमर के साथ थे, जब तक हम खेत में थे, अचानक उन्हें एक आदमी मिला जो एक पेड़ की छाँव में रुक गया, उमर ने मुझसे कहा; "जाओ, और पता लगाओ कि वह कौन है!" मैंने कहा; "सच में वह अपने परिवार के साथ था," उमर ने कहा; "भले ही वह अपने परिवार के साथ था।" फिर अय्यूब ने कहा, "ओह, मेरे दोस्त।" अलैहि वसल्लम ने कभी नहीं कहा: "सच में, मरने वाले को उसके परिवार के कुछ आँसुओं के लिए सज़ा दी जाएगी।" जहाँ तक अब्दुल्ला बिन उमर की बात है, उन्होंने हदीस के शब्दों का आम तौर पर ज़िक्र किया, जबकि उमर ने शब्दों का ज़िक्र किया: "कुछ आँसुओं के कारण।" मैं (इब्न अब्बास) फिर आयशा के पास गया और बताया कि उमर ने उनसे क्या कहा, तो [आयशा] ने जवाब दिया: "नहीं, अल्लाह की कसम, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कभी नहीं कहा कि मरने वाले को किसी के आँसुओं के लिए सज़ा दी जाएगी, लेकिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार कहा था: "वास्तव में, अल्लाह अविश्वासी के अपने परिवार के आँसुओं के लिए सजा को बढ़ा देगा, और वास्तव में, अल्लाह वह है जो लोगों को हंसाता है और रुलाता है; "वास्तव में, एक पापी दूसरों के पापों को सहन नहीं करेगा" (क्यूएस अन नजम आयत: 38)।" [अय्यूब] ने कहा; [इब्न अबीमुलैका] ने कहा; उन्होंने हमें अल कासिम से कहा; उन्होंने कहा; जब उमर और इब्न उमर के शब्द ऐश्या तक पहुंचे, [ऐस्या] ने कहा; "वास्तव में आपने मुझे दो लोगों से बताया है जो झूठे नहीं हैं और जिनसे झूठ नहीं बोला गया है, लेकिन यह सुनना है कि (कभी-कभी) गलत है।" हमें बताया है [अब्दुर्रज्जाक] ने हमें बताया है [इब्न जुराइज] ने मुझे बताया है [अब्दुल्ला बिन अबी कंपुरका] फिर उन्होंने अय्यूब की हदीस का अर्थ उल्लेख किया, लेकिन उन्होंने कहा; फिर इब्न उमर ने 'अमरू बिन उथमन से सामना करते हुए कहा; तुम रोना बंद क्यों नहीं करते, असल में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा है: "ज़रूर मरने वाले को उसके परिवार के रोने की वजह से तकलीफ़ होगी।" हमें बताया है [अब्दुर्रज़्ज़ाक] ने हमें बताया है [इब्न जुराइज़] ने मुझे बताया है [अब्दुल्ला बिन अबीमुलैका], उन्होंने कहा; "उथमन बिन अफ़्फ़ान की बेटी मक्का में मर गई, तो इब्न उमर और इब्न अब्बास उसके जनाज़े में शामिल हुए, और असल में मैं उन दोनों के बीच बैठा था, इब्न उमर ने अमरू बिन उस्मान से कहा, "तुम रोना बंद क्यों नहीं करते? असल में, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा है: "ज़रूर मरने वाले को उसके परिवार के रोने की वजह से तकलीफ़ होगी।" तो उन्होंने अय्यूब से इब्न अबीमुलैका से इस्माइल हदीस का ज़िक्र किया।

माता-पिता के नाम पर गाली देने पर प्रतिबंध

इमाम अहमद : 275

حَدَّثَنَا حُسَيْنُ بْنُ مُحَمَّدٍ حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ عَنْ سِمَاكٍ عَنْ عِكْرِمَةَ عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ قَالَ قَالَ عُمَرُ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ كُنْتُ فِي رَكْبٍ أَسِيرُ فِي غَزَاةٍ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَحَلَفْتُ فَقُلْتُ لَا وَأَبِي فَهَتَفَ بِي رَجُلٌ مِنْ خَلْفِي لَا تَحْلِفُوا بِآبَائِكُمْ فَالْتَفَتُّ فَإِذَا هُوَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ

हमें [हुसैन बिन मुहम्मद] ने बताया है, हमें [इज़राइल] ने [सिमक] से [इकरीमा] से [इब्न अब्बास] से बताया है, उन्होंने कहा; [उमर] ने कहा; मैं एक ऐसे ग्रुप के साथ था जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से जंग करने जा रहा था, फिर मैंने कसम खाई: "नहीं, अपने पिता की।" अचानक किसी ने पीछे से मेरे कान में फुसफुसाया: "अपने पिता के नाम की कसम मत खाओ।" फिर मैं मुड़ा और पता चला कि वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम थे।

उमर ने इस्लाम में कुर्बानी के आधार पर संपत्ति के बंटवारे के बारे में बताया

इमाम अहमद : 276

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ مُيَسَّرٍ أَبُو سَعْدٍ الصَّاغَانِيُّ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْحَاقَ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرِو بْنِ عَطَاءٍ عَنْ مَالِكِ بْنِ أَوْسِ بْنِ الْحَدَثَانِ قَالَ كَانَ عُمَرُ يَحْلِفُ عَلَى أَيْمَانٍ ثَلَاثٍ يَقُولُ وَاللَّهِ مَا أَحَدٌ أَحَقَّ بِهَذَا الْمَالِ مِنْ أَحَدٍ وَمَا أَنَا بِأَحَقَّ بِهِ مِنْ أَحَدٍ وَاللَّهِ مَا مِنْ الْمُسْلِمِينَ أَحَدٌ إِلَّا وَلَهُ فِي هَذَا الْمَالِ نَصِيبٌ إِلَّا عَبْدًا مَمْلُوكًا وَلَكِنَّا عَلَى مَنَازِلِنَا مِنْ كِتَابِ اللَّهِ تَعَالَى وَقَسْمِنَا مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَالرَّجُلُ وَبَلَاؤُهُ فِي الْإِسْلَامِ وَالرَّجُلُ وَقَدَمُهُ فِي الْإِسْلَامِ وَالرَّجُلُ وَغَنَاؤُهُ فِي الْإِسْلَامِ وَالرَّجُلُ وَحَاجَتُهُ وَ وَاللَّهِ لَئِنْ بَقِيتُ لَهُمْ لَيَأْتِيَنَّ الرَّاعِيَ بِجَبَلِ صَنْعَاءَ حَظُّهُ مِنْ هَذَا الْمَالِ وَهُوَ يَرْعَى مَكَانَهُ

[मुहम्मद बिन मुयस्सर अबू सईद अश शघानी] ने हमें [मुहम्मद बिन इसहाक] को [मुहम्मद बिन अम्र बिन अथो] से [मलिक बिन औस बिन अल हदत्सन] से बताया है; [उमर] ने एक बार तीन कसमें खाईं, उन्होंने कहा: "अल्लाह की कसम, इस संपत्ति पर मुझ समेत किसी का भी किसी दूसरे पर अधिकार नहीं है। अल्लाह की कसम, कोई भी मुसलमान इस संपत्ति में हिस्सा न रखता हो, सिवाय एक गुलाम के, लेकिन हमारे घर में अल्लाह तआला की किताब और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ से हमारा बंटवारा है, तो एक आदमी इस्लाम के लिए अपनी कुर्बानी के हिसाब से, एक आदमी इस्लाम में अपने पहले वाले के हिसाब से, एक आदमी इस्लाम में अपने माल के हिसाब से और एक आदमी अपनी ज़रूरतों के हिसाब से, और अल्लाह की कसम, अगर मैंने उनके लिए कुछ छोड़ा, तो वह ज़रूर माउंट सना के एक चरवाहे के पास आएगा, जब वह उसकी जगह चर रहा होगा।"

उमर ने काअब से पूछा कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत सबसे ज़्यादा क्या करती थी?

इमाम अहमद : 277

حَدَّثَنَا عَبْدُ الْقُدُّوسِ بْنُ الْحَجَّاجِ حَدَّثَنَا صَفْوَانُ حَدَّثَنِي أَبُو الْمُخَارِقِ زُهَيْرُ بْنُ سَالِمٍ أَنَّ عُمَيْرَ بْنَ سَعْدٍ الْأَنْصَارِيَّ كَانَ وَلَّاهُ عُمَرُ حِمْصَ فَذَكَرَ الْحَدِيثَ قَالَ عُمَرُ يَعْنِي لِكَعْبٍ إِنِّي أَسْأَلُكَ عَنْ أَمْرٍ فَلَا تَكْتُمْنِي قَالَ وَاللَّهِ لَا أَكْتُمُكَ شَيْئًا أَعْلَمُهُ قَالَ مَا أَخْوَفُ شَيْءٍ تَخَوَّفُهُ عَلَى أُمَّةِ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ أَئِمَّةً مُضِلِّينَ قَالَ عُمَرُ صَدَقْتَ قَدْ أَسَرَّ ذَلِكَ إِلَيَّ وَأَعْلَمَنِيهِ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ

हमें [अब्दुल कुद्दुस बिन अल हज्जाज] ने बताया है, हमें [शफवान] ने मुझे [अबुल मुखारिक ज़ुहैर बिन सलीम] बताया है कि उमर बिन साद अल अंसारी को [उमर] ने हिमशा इलाके का लीडर अपॉइंट किया था, फिर उन्होंने हदीस का ज़िक्र किया। उमर ने कअब से कहा; "असल में, मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, तो इसे मुझसे मत छिपाओ।" कअब ने जवाब दिया; "अल्लाह की कसम, मैं वह बात नहीं छिपाऊँगा जो मैं जानता हूँ।" उमर ने पूछा; "मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत के बारे में तुम्हें सबसे ज़्यादा किस बात का डर है?" कअब ने जवाब दिया; "लीडर गुमराह कर रहे हैं" उमर ने कहा; "तुम सही हो, मैंने इसे खुद से छिपाया है, और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे इसके बारे में बताया है।"

पैगम्बर ने कुरान को सात बोलियों में समझाया

इमाम अहमद : 278

حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ حَدَّثَنَا أَبِي عَنْ صَالِحٍ قَالَ ابْنُ شِهَابٍ فَقَالَ سَالِمٌ فَسَمِعْتُ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ يَقُولُ قَالَ عُمَرُ أَرْسِلُوا إِلَيَّ طَبِيبًا يَنْظُرُ إِلَى جُرْحِي هَذَا قَالَ فَأَرْسَلُوا إِلَى طَبِيبٍ مِنْ الْعَرَبِ فَسَقَى عُمَرَ نَبِيذًا فَشُبِّهَ النَّبِيذُ بِالدَّمِ حِينَ خَرَجَ مِنْ الطَّعْنَةِ الَّتِي تَحْتَ السُّرَّةِ قَالَ فَدَعَوْتُ طَبِيبًا آخَرَ مِنْ الْأَنْصَارِ مِنْ بَنِي مُعَاوِيَةَ فَسَقَاهُ لَبَنًا فَخَرَجَ اللَّبَنُ مِنْ الطَّعْنَةِ صَلْدًا أَبْيَضَ فَقَالَ لَهُ الطَّبِيبُ يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ اعْهَدْ فَقَالَ عُمَرُ صَدَقَنِي أَخُو بَنِي مُعَاوِيَةَ وَلَوْ قُلْتَ غَيْرَ ذَلِكَ كَذَّبْتُكَ قَالَ فَبَكَى عَلَيْهِ الْقَوْمُ حِينَ سَمِعُوا ذَلِكَ فَقَالَ لَا تَبْكُوا عَلَيْنَا مَنْ كَانَ بَاكِيًا فَلْيَخْرُجْ أَلَمْ تَسْمَعُوا مَا قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ يُعَذَّبُ الْمَيِّتُ بِبُكَاءِ أَهْلِهِ عَلَيْهِ فَمِنْ أَجْلِ ذَلِكَ كَانَ عَبْدُ اللَّهِ لَا يُقِرُّ أَنْ يُبْكَى عِنْدَهُ عَلَى هَالِكٍ مِنْ وَلَدِهِ وَلَا غَيْرِهِمْ

हमें [याकूब] ने बताया है कि हमें [मेरे पिता] ने [सालेह] से बताया है [इब्न शिहाब] ने कहा है; [सलीम] ने कहा; मैंने [अब्दुल्ला बिन उमर] को कहते सुना; [उमर] ने कहा; "मुझे एक डॉक्टर के पास भेजो ताकि वह मेरे घाव की जांच कर सके।" अब्दुल्ला बिन उमर ने कहा; फिर उन्होंने उमर को अरबों में से एक हकीम के पास भेजा, और हकीम ने उसे अंगूर का रस पिलाया, फिर अंगूर का रस जब नाभि के नीचे के छेद से निकला तो खून जैसा लग रहा था।" अब्दुल्लाह बिन उमर ने कहा; फिर मैंने बनी मुअविया से अंसार के एक और हकीम को बुलाया। फिर हकीम ने उमर को दूध पिलाया, और दूध छेद से साफ़ सफ़ेद निकला। हकीम ने उमर से कहा; "ऐ अमीरुल ईमान वालों, मुझसे वादा करो!" उमर ने जवाब दिया; "मेरे भाई बनी उमैया ने मेरी बात पक्की की है, अगर तुम इसके अलावा कुछ और कहते, तो मैं तुमसे झूठ बोलता।" अब्दुल्लाह बिन उमर ने कहा; "फिर जब लोगों ने ये बातें सुनीं तो उमर के लिए रो पड़े।" तो उमर ने कहा; "मेरे लिए मत रोओ, जो कोई रोए वह बाहर आ जाए! क्या तुमने नहीं सुना जो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा था, उन्होंने कहा: "एक लाश को इसलिए तड़पाया जाएगा क्योंकि उसका परिवार उसके लिए रोता है।" "इसीलिए अब्दुल्ला किसी मरे हुए व्यक्ति के लिए शोक मनाने को सही नहीं मानते, चाहे वह उनके बच्चों में से हो या किसी और में।"

पैगंबर शल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सूरज उगने से पहले जामुन छोड़कर जाहिलिया को विवादित कर दिया

इमाम अहमद : 279

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ أَنْبَأَنَا الثَّوْرِيُّ عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ عَنْ عَمْرِو بْنِ مَيْمُونٍ قَالَ سَمِعْتُ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ يَقُولُ كَانَ أَهْلُ الْجَاهِلِيَّةِ لَا يُفِيضُونَ مِنْ جَمْعٍ حَتَّى يَرَوْا الشَّمْسَ عَلَى ثَبِيرٍ وَكَانُوا يَقُولُونَ أَشْرِقْ ثَبِيرُ كَيْمَا نُغِيرُ فَأَفَاضَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ

हमें [अब्दुर्रज्जाक] ने बताया है, हमें [अत्स त्सौरी] ने [अबू इसहाक] से [अमरू बिन मैमुन] से बताया है, उन्होंने कहा; मैंने [उमर बिन अल खत्थब] को यह कहते सुना; पहले जाहिलिया लोग जमून (मुजदलिफा) को तब तक नहीं छोड़ते थे जब तक कि वे त्साबीर के ऊपर सूरज को न देख लें और कहें; 'सूरज त्साबीर के ऊपर उग आया है इसलिए हम तुरंत निकल सकते हैं।' फिर रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सूरज उगने से पहले जमून (मुजदलिफा) को छोड़ दिया।

पैगम्बर ने कुरान को सात बोलियों में समझाया

इमाम अहमद : 280

حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ أَنْبَأَنَا مَعْمَرٌ عَنِ الزُّهْرِيِّ عَنْ عُرْوَةَ عَنِ الْمِسْوَرِ بْنِ مَخْرَمَةَ وَعَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَبْدٍ الْقَارِيِّ أَنَّهُمَا سَمِعَا عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ يَقُولُ مَرَرْتُ بِهِشَامِ بْنِ حَكِيمِ بْنِ حِزَامٍ يَقْرَأُ سُورَةَ الْفُرْقَانِ فِي حَيَاةِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَاسْتَمَعْتُ قِرَاءَتَهُ فَإِذَا هُوَ يَقْرَأُ عَلَى حُرُوفٍ كَثِيرَةٍ لَمْ يُقْرِئْنِيهَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَكِدْتُ أَنْ أُسَاوِرَهُ فِي الصَّلَاةِ فَنَظَرْتُ حَتَّى سَلَّمَ فَلَمَّا سَلَّمَ لَبَّبْتُهُ بِرِدَائِهِ فَقُلْتُ مَنْ أَقْرَأَكَ هَذِهِ السُّورَةَ الَّتِي تَقْرَؤُهَا قَالَ أَقْرَأَنِيهَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ قُلْتُ لَهُ كَذَبْتَ فَوَاللَّهِ إِنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَهُوَ أَقْرَأَنِي هَذِهِ السُّورَةَ الَّتِي تَقْرَؤُهَا قَالَ فَانْطَلَقْتُ أَقُودُهُ إِلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنِّي سَمِعْتُ هَذَا يَقْرَأُ سُورَةَ الْفُرْقَانِ عَلَى حُرُوفٍ لَمْ تُقْرِئْنِيهَا وَأَنْتَ أَقْرَأْتَنِي سُورَةَ الْفُرْقَانِ فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَرْسِلْهُ يَا عُمَرُ اقْرَأْ يَا هِشَامُ فَقَرَأَ عَلَيْهِ الْقِرَاءَةَ الَّتِي سَمِعْتُهُ فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ هَكَذَا أُنْزِلَتْ ثُمَّ قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ اقْرَأْ يَا عُمَرُ فَقَرَأْتُ الْقِرَاءَةَ الَّتِي أَقْرَأَنِي رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ هَكَذَا أُنْزِلَتْ ثُمَّ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِنَّ الْقُرْآنَ أُنْزِلَ عَلَى سَبْعَةِ أَحْرُفٍ فَاقْرَءُوا مِنْهُ مَا تَيَسَّرَ حَدَّثَنَا الْحَكَمُ بْنُ نَافِعٍ أَنْبَأَنَا شُعَيْبٌ عَنِ الزُّهْرِيِّ حَدَّثَنِي عُرْوَةُ عَنْ حَدِيثِ الْمِسْوَرِ بْنِ مَخْرَمَةَ وَعَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ عَبْدٍ الْقَارِيِّ أَنَّهُمَا سَمِعَا عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ يَقُولُ سَمِعْتُ هِشَامَ بْنَ حَكِيمِ بْنِ حِزَامٍ يَقْرَأُ سُورَةَ الْفُرْقَانِ فِي حَيَاةِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَاسْتَمَعْتُ لِقِرَاءَتِهِ فَإِذَا هُوَ يَقْرَأُ عَلَى حُرُوفٍ كَثِيرَةٍ لَمْ يُقْرِئْنِيهَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَكِدْتُ أُسَاوِرُهُ فِي الصَّلَاةِ فَنَظَرْتُ حَتَّى سَلَّمَ فَلَمَّا سَلَّمَ فَذَكَرَ مَعْنَاهُ

हमें [अब्दुर्रज्जाक] ने बताया है कि [ममार] ने [अज़ ज़ुहरी] से [उरवाह] से [अल मिस्वर बिन मखराम] और [अब्दुर्रहमान बिन अब्दुल कारी] से बताया है कि उन दोनों ने [उमर] को कहते सुना; मैं हिसाम बिन हकीम के पास से गुजरा जो अल फुरकोण पत्र पढ़ रहा था जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जीवित थे, फिर मैंने उसका पढ़ना सुना, और यह पता चला कि वह कई अक्षरों (बोली) में पढ़ रहा था जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे कभी नहीं पढ़कर सुनाया था। "जो पत्र तुमने पढ़ा, उसे किसने पढ़ा?" उसने उत्तर दिया; "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इसे मुझे पढ़कर सुनाया।" मैंने उससे कहा; "तुम झूठ बोल रहे हो, अल्लाह की कसम, वास्तव में पैगंबर ने एक बार वह पत्र पढ़ा था जो तुमने मुझे पढ़कर सुनाया।" फिर मैं उसे पैगंबर के पास ले गया, मैंने कहा; "ऐ अल्लाह के रसूल, मैंने असल में इस आदमी को अल फुरकून का खत कई खत के साथ पढ़ते सुना है, जो आपने मुझे कभी नहीं पढ़कर सुनाए, हालांकि आपने एक बार मुझे अल फुरकून का खत पढ़कर सुनाया था।" फिर पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "उसे जाने दो, ऐ उमर! इसे पढ़ो, ऐ हिशाम! फिर हिशाम ने उसे वह पढ़कर सुनाया जो मैंने उससे सुना था। फिर पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "इस तरह यह खत नाज़िल हुआ," फिर उन्होंने कहा: "पढ़ो (ऐ उमर)!" फिर मैंने उस खत के साथ पढ़ा जो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे दिया था, फिर उन्होंने कहा: "इस तरह यह खत नाज़िल हुआ।" फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "बेशक कुरान सात अक्षरों में नाज़िल हुआ था, इसलिए इसे आसानी से पढ़ो।" [अब्दुर्रहमान बिन अब्दुल क़ोरी] ने कहा कि उन दोनों ने [उमर बिन अल खत्थब] को यह कहते सुना था; "मैंने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के समय में हिसाम बिन हकीम बिन हिज़ाम को अल फुरकॉन खत पढ़ते सुना था, तो मैंने उनका पढ़ना देखा, और यह बदल गया। पता चला कि वह कई ऐसे अक्षर (बोली) पढ़ रहे थे जो रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे कभी नहीं पढ़कर सुनाए थे, इसलिए मैंने नमाज़ के दौरान (उनकी पढ़ाई) लगभग रोक ही दी थी, लेकिन जब तक उन्होंने नमाज़ खत्म नहीं कर ली, तब तक मैंने ध्यान दिया, जब तक उन्होंने उन्हें सलाम नहीं कर लिया," फिर उन्होंने उसी हदीस का ज़िक्र किया।