इमाम तिर्मिदज़ी : 141
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ عَنْ مَالِكِ بْنِ أَنَسٍ قَالَ و حَدَّثَنَا الْأَنْصَارِيُّ حَدَّثَنَا مَعْنٌ حَدَّثَنَا مَالِكٌ عَنْ يَحْيَى بْنِ سَعِيدٍ عَنْ عَمْرَةَ عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْإِنْ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَيُصَلِّي الصُّبْحَ فَيَنْصَرِفُ النِّسَاءُ قَالَ الْأَنْصَارِيُّ فَيَمُرُّ النِّسَاءُ مُتَلَفِّفَاتٍ بِمُرُوطِهِنَّ مَا يُعْرَفْنَ مِنْ الْغَلَسِو قَالَ قُتَيْبَةُ مُتَلَفِّعَاتٍ قَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ ابْنِ عُمَرَ وَأَنَسٍ وَقَيْلَةَ بِنْتِ مَخْرَمَةَ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ عَائِشَةَ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَقَدْ رَوَاهُ الزُّهْرِيُّ عَنْ عُرْوَةَ عَنْ عَائِشَةَ نَحْوَهُ وَهُوَ الَّذِي اخْتَارَهُ غَيْرُ وَاحِدٍ مِنْ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مِنْهُمْ أَبُو بَكْرٍ وَعُمَرُ وَمَنْ بَعْدَهُمْ مِنْ التَّابِعِينَ وَبِهِ يَقُولُ الشَّافِعِيُّ وَأَحْمَدُ وَإِسْحَقُ يَسْتَحِبُّونَ التَّغْلِيسَ بِصَلَاةِ الْفَجْرِ
हमें [कुतैबा] ने [मलिक बिन अनस] से बताया है; और हमें [अल अंसारी] ने कहा है; हमें [मा'न] ने कहा है; हमें [मलिक] ने [याह्या बिन सईद] से [अमरा] से ['ऐस्या] से बताया है उन्होंने कहा; "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सुबह की नमाज़ पढ़ी, फिर औरतें (घर को) चली गईं।" अल अंसारी ने कहा; "औरतें बिना सिलवट वाले कपड़े से ढकी हुई गुज़रीं ताकि उन्हें पहचाना न जा सके।" और कुतैबा ने इसका ज़िक्र लफ़ज़ मुतलफ़िफ़त (कपड़े से ढकी हुई) के साथ किया है।" उन्होंने कहा; "इस अध्याय में इब्न उमर, अनस और कैला बिन्त मखरामह की भी एक रिवायत है।" अबू ईसा ने कहा; "'ऐस्या' की यह हदीस हसन असली है। [अज़ ज़ुहरी] ने भी इसे [उरवाह] से ['ऐस्या] से इसी तरह रिवायत किया है। पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथियों में से कई विद्वानों ने यही राय रखी, जैसे अबू बक्र, उमर और उनके बाद ताबीन में से आए लोग। यही राय सयाफी, अहमद और इसहाक की भी है। वे सुबह की नमाज़ तब पढ़ना पसंद करते हैं जब अभी अंधेरा हो।
इमाम तिर्मिदज़ी : 142
حَدَّثَنَا هَنَّادٌ حَدَّثَنَا عَبْدَةُ هُوَ ابْنُ سُلَيْمَانَ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَقَ عَنْ عَاصِمِ بْنِ عُمَرَ بْنِ قَتَادَةَ عَنْ مَحْمُودِ بْنِ لَبِيدٍ عَنْ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ قَالَسَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ أَسْفِرُوا بِالْفَجْرِ فَإِنَّهُ أَعْظَمُ لِلْأَجْرِقَالَ وَقَدْ رَوَى شُعْبَةُ وَالثَّوْرِيُّ هَذَا الْحَدِيثَ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَقَ قَالَ وَرَوَاهُ مُحَمَّدُ بْنُ عَجْلَانَ أَيْضًا عَنْ عَاصِمِ بْنِ عُمَرَ بْنِ قَتَادَةَ قَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ أَبِي بَرْزَةَ الْأَسْلَمِيِّ وَجَابِرٍ وَبِلَالٍ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَقَدْ رَأَى غَيْرُ وَاحِدٍ مِنْ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَالتَّابِعِينَ الْإِسْفَارَ بِصَلَاةِ الْفَجْرِ وَبِهِ يَقُولُ سُفْيَانُ الثَّوْرِيُّ و قَالَ الشَّافِعِيُّ وَأَحْمَدُ وَإِسْحَقُ مَعْنَى الْإِسْفَارِ أَنْ يَضِحَ الْفَجْرُ فَلَا يُشَكَّ فِيهِ وَلَمْ يَرَوْا أَنَّ مَعْنَى الْإِسْفَارِ تَأْخِيرُ الصَّلَاةِ
हन्नाद ने हमें बताया है; अब्दह ने हमें बताया है - यानी इब्न सुलेमान - मुहम्मद बिन इसहाक से, अशिम बिन उमर बिन क़तादाह से, महमूद बिन लाबिद से, रफ़ी बिन ख़दीज से, उन्होंने कहा; "मैंने रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को कहते सुना: "सुबह की नमाज़ तब पढ़ो जब दिन में काफ़ी देर हो चुकी हो, क्योंकि यह ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा।" उन्होंने कहा; "स्यूबा और अत्स त्सौरी ने मुहम्मद बिन इसहाक से यह हदीस सुनाई है।" उन्होंने कहा; "यह हदीस मुहम्मद बिन अजलान ने भी अशिम बिन उमर बिन क़तादाह से सुनाई है।" उन्होंने कहा; "इस चैप्टर में अबू बरज़ाह अल असलमी और जाबिर और बिलाल का भी इतिहास है।" अबू ईसा ने कहा; "रफ़ी बिन ख़दीज की हदीस एक हसन असली हदीस है। और यह सिर्फ़ पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथियों और ताबीन में से एक विद्वान ही नहीं है जो यह मानते हैं कि सुबह की नमाज़ तब पढ़ी जाती है जब थोड़ी रोशनी हो। यह राय सुफ़यान अत्स त्सौरी की भी है। सयाफ़ी, अहमद और इसहाक ने कहा कि इस्फ़ार का मतलब है जब सुबह रोशनी हो। इसमें कोई शक नहीं कि वे यह नहीं कहते कि इस्फ़ार खाना नमाज़ का अंत है।
इमाम तिर्मिदज़ी : 143
حَدَّثَنَا هَنَّادُ بْنُ السَّرِيِّ حَدَّثَنَا وَكِيعٌ عَنْ سُفْيَانَ عَنْ حَكِيمِ بْنِ جُبَيْرٍ عَنْ إِبْرَاهِيمَ عَنْ الْأَسْوَدِ عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْمَا رَأَيْتُ أَحَدًا كَانَ أَشَدَّ تَعْجِيلًا لِلظُّهْرِ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَلَا مِنْ أَبِي بَكْرٍ وَلَا مِنْ عُمَرَقَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ وَخَبَّابٍ وَأَبِي بَرْزَةَ وَابْنِ مَسْعُودٍ وَزَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ وَأَنَسٍ وَجَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ عَائِشَةَ حَدِيثٌ حَسَنٌ وَهُوَ الَّذِي اخْتَارَهُ أَهْلُ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَمَنْ بَعْدَهُمْ قَالَ عَلِيُّ بْنُ الْمَدِينِيِّ قَالَ يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ وَقَدْ تَكَلَّمَ شُعْبَةُ فِي حَكِيمِ بْنِ جُبَيْرٍ مِنْ أَجْلِ حَدِيثِهِ الَّذِي رَوَى عَنْ ابْنِ مَسْعُودٍ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مَنْ سَأَلَ النَّاسَ وَلَهُ مَا يُغْنِيهِ قَالَ يَحْيَى وَرَوَى لَهُ سُفْيَانُ وَزَائِدَةُ وَلَمْ يَرَ يَحْيَى بِحَدِيثِهِ بَأْسًا قَالَ مُحَمَّدٌ وَقَدْ رُوِيَ عَنْ حَكِيمِ بْنِ جُبَيْرٍ عَنْ سَعِيدِ بْنِ جُبَيْرٍ عَنْ عَائِشَةَ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي تَعْجِيلِ الظُّهْرِ
हमें बताया है [हन्नाद बिन अस सरी] ने कहा; हमें बताया है [वाकी] [सुफियान] से [हाकिम बिन जुबैर] से [इब्राहिम] से [अल असवद] से ['ऐस्या] ने कहा; "मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अलावा कभी किसी को दोपहर की नमाज़ पढ़ने में जल्दबाजी करते नहीं देखा, न अबू बकर को और न ही उमर को।" उन्होंने कहा; "इस अध्याय में जाबिर बिन अब्दुल्लाह, खब्बाब, अबू बरज़ाह, इब्नु मसऊद, ज़ैद बिन साबित, अनस और जाबिर बिन सम्रा से भी रिवायतें हैं।" अबू ईसा ने कहा; "'ऐस्या' की यह हदीस हसन स्तर की है। यह पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथियों और उनके बाद के विद्वानों द्वारा लिया गया मत है। अली अल मदीनी ने कहा; "याह्या बिन सईद ने कहा; "स्यूबा ने हकीम बिन जुबैर के बारे में इसलिए बात की है क्योंकि उन्होंने इब्न मसूद से पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक हदीस सुनाई थी, उन्होंने कहा: "जो कोई किसी से तब पूछता है जब उसे ज़रूरत न हो…….." याह्या ने कहा; सोफ़यान ने भी यह हदीस सुनाई और ज़ैदा ने भी सुनाई, याह्या को इस हदीस में कोई दिक्कत नहीं दिखी, मुहम्मद ने कहा: यह हकीम बिन जुबैर से ऐश्या से पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दोपहर की नमाज़ जल्दी करने के मामले में सुनाई गई है।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 144
حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ الْحُلْوَانِيُّ أَخْبَرَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ عَنْ الزُّهْرِيِّ قَالَ أَخْبَرَنِي أَنَسُ بْنُ مَالِكٍأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَلَّى الظُّهْرَ حِينَ زَالَتْ الشَّمْسُقَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحٌ وَهُوَ أَحْسَنُ حَدِيثٍ فِي هَذَا الْبَابِ وَفِي الْبَاب عَنْ جَابِرٍ
हमें बताया है [अल हसन बिन अली अल हुलवानी] ने कहा; हमें बताया है [अब्दुर्रज़ाक] ने कहा; हमें बताया है [ममार] ने [अज़ ज़ुहरी] से उन्होंने कहा; मुझे बताया है [अनस बिन मलिक] ने कहा; "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दोपहर की नमाज़ तब पढ़ी जब सूरज डूब चुका था।" अबू ईसा ने कहा; "यह हदीस हसन असली है, और यह हदीस इस चैप्टर की सबसे अच्छी हदीस है। और इस चैप्टर में जाबिर का एक इतिहास भी है।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 145
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ وَأَبِي سَلَمَةَ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِذَا اشْتَدَّ الْحَرُّ فَأَبْرِدُوا عَنْ الصَّلَاةِ فَإِنَّ شِدَّةَ الْحَرِّ مِنْ فَيْحِ جَهَنَّمَقَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ أَبِي سَعِيدٍ وَأَبِي ذَرٍّ وَابْنِ عُمَرَ وَالْمُغِيرَةِ وَالْقَاسِمِ بْنِ صَفْوَانَ عَنْ أَبِيهِ وَأَبِي مُوسَى وَابْنِ عَبَّاسٍ وَأَنَسٍ قَالَ وَرُوِيَ عَنْ عُمَرَ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي هَذَا وَلَا يَصِحُّ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ أَبِي هُرَيْرَةَ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَقَدْ اخْتَارَ قَوْمٌ مِنْ أَهْلِ الْعِلْمِ تَأْخِيرَ صَلَاةِ الظُّهْرِ فِي شِدَّةِ الْحَرِّ وَهُوَ قَوْلُ ابْنِ الْمُبَارَكِ وَأَحْمَدَ وَإِسْحَقَ قَالَ الشَّافِعِيُّ إِنَّمَا الْإِبْرَادُ بِصَلَاةِ الظُّهْرِ إِذَا كَانَ مَسْجِدًا يَنْتَابُ أَهْلُهُ مِنْ الْبُعْدِ فَأَمَّا الْمُصَلِّي وَحْدَهُ وَالَّذِي يُصَلِّي فِي مَسْجِدِ قَوْمِهِ فَالَّذِي أُحِبُّ لَهُ أَنْ لَا يُؤَخِّرَ الصَّلَاةَ فِي شِدَّةِ الْحَرِّ قَالَ أَبُو عِيسَى وَمَعْنَى مَنْ ذَهَبَ إِلَى تَأْخِيرِ الظُّهْرِ فِي شِدَّةِ الْحَرِّ هُوَ أَوْلَى وَأَشْبَهُ بِالِاتِّبَاعِ وَأَمَّا مَا ذَهَبَ إِلَيْهِ الشَّافِعِيُّ أَنَّ الرُّخْصَةَ لِمَنْ يَنْتَابُ مِنْ الْبُعْدِ وَالْمَشَقَّةِ عَلَى النَّاسِ فَإِنَّ فِي حَدِيثِ أَبِي ذَرٍّ مَا يَدُلُّ عَلَى خِلَافِ مَا قَالَ الشَّافِعِيُّ قَالَ أَبُو ذَرٍّ كُنَّا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي سَفَرٍ فَأَذَّنَ بِلَالٌ بِصَلَاةِ الظُّهْرِ فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَا بِلَالُ أَبْرِدْ ثُمَّ أَبْرِدْ فَلَوْ كَانَ الْأَمْرُ عَلَى مَا ذَهَبَ إِلَيْهِ الشَّافِعِيُّ لَمْ يَكُنْ لِلْإِبْرَادِ فِي ذَلِكَ الْوَقْتِ مَعْنًى لِاجْتِمَاعِهِمْ فِي السَّفَرِ وَكَانُوا لَا يَحْتَاجُونَ أَنْ يَنْتَابُوا مِنْ الْبُعْدِ
हमें बताया है [कुतैबा] ने कहा; हमें [अल लैट्स] ने [इब्न शिहाब] से [सईद बिन अल मुसय्यब] और [अबू सलामा] से [अबू हुरैरा] से बताया है उन्होंने कहा; "रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "यदि दिन बहुत गर्म है तो नमाज़ के लिए उसके ठंडा होने तक प्रतीक्षा करें, क्योंकि गर्म गर्मी नरक की सांस से है।" उन्होंने कहा; "इस अध्याय में अबू सईद, अबू दज़ार, इब्नु उमर, अल मुगीरा, अल कासिम बिन शोफवान से उनके पिता, अबू मूसा, इब्नु अब्बास और अनस से भी एक कथा है। उन्होंने कहा; "इस बारे में उमर से पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से भी वर्णित किया गया था, लेकिन यह कथा भी प्रामाणिक नहीं है।" अबू ईसा ने कहा; "अबू हुरैरा की हदीस हसन असली है। और विद्वानों के एक ग्रुप ने दोपहर की नमाज़ तब खत्म करने का फैसला किया जब सूरज बहुत गर्म था। यह राय बिन अल मुबारक, अहमद और इसहाक की थी।" शफीई ने कहा; "दोपहर की नमाज़ के लिए माहौल ठंडा होने तक इंतज़ार करने की इजाज़त तब है जब मस्जिद दूरी की वजह से लोगों को (मस्जिद जाते समय) गर्मी देती हो। जहाँ तक अकेले नमाज़ पढ़ने वालों या अपने लोगों की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वालों की बात है, तो मैं चाहता हूँ कि वह सूरज बहुत गर्म होने पर भी नमाज़ पढ़ता रहे।" अबू ईसा ने कहा; "जो लोग दोपहर की नमाज़ तब खत्म करते हैं जब सूरज गर्म होता है, तो यह ज़्यादा ज़रूरी है और सुन्नत के मुताबिक है।" जहाँ तक सयाफीई की इस राय का सवाल है कि राहत उन लोगों के लिए है जिनका घर दूर और मुश्किल है, तो अबू ज़ार की हदीस में एक तर्क है जो सयाफीई की कही बात के उलट दिखाता है। अबू धर ने कहा; "एक बार हम पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ सफ़र पर थे, तभी बिलाल ने ज़ुहर की नमाज़ के लिए अज़ान दी, तो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "ऐ बिलाल, थोड़ा ठंडा होने तक इंतज़ार करो।" अगर हम शफ़ीई की राय मानें, तो पहले इंतज़ार करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि वे सफ़र पर जमा हुए हैं और उन्हें परेशानी उठाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वे दूर जगह से आए हैं।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 146
حَدَّثَنَا مَحْمُودُ بْنُ غَيْلَانَ حَدَّثَنَا أَبُو دَاوُدَ الطَّيَالِسِيُّ قَالَ أَنْبَأَنَا شُعْبَةُ عَنْ مُهَاجِرٍ أَبِي الْحَسَنِ عَنْ زَيْدِ بْنِ وَهْبٍ عَنْ أَبِي ذَرٍّأَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ فِي سَفَرٍ وَمَعَهُ بِلَالٌ فَأَرَادَ أَنْ يُقِيمَ فَقَالَ أَبْرِدْ ثُمَّ أَرَادَ أَنْ يُقِيمَ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَبْرِدْ فِي الظُّهْرِ قَالَ حَتَّى رَأَيْنَا فَيْءَ التُّلُولِ ثُمَّ أَقَامَ فَصَلَّى فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِنَّ شِدَّةَ الْحَرِّ مِنْ فَيْحِ جَهَنَّمَ فَأَبْرِدُوا عَنْ الصَّلَاةِقَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ
हमें बताया है [महमूद बिन घैलन] ने कहा; हमें बताया है [अबू दाऊद अथ थायलिसी] ने कहा; हमें [स्यूबा] ने [मुहाजिर अबू अल हसन] से [ज़ैद बिन वहब] से [अबू ज़ार] ने बताया है; "पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक बार सफ़र पर थे, उस समय वह बिलाल के साथ थे, तब बिलाल ने इकामा पढ़ना चाहा, तो उन्होंने कहा: "ठंड होने तक इंतज़ार करो," तब बिलाल ने फिर से इकामा पढ़ना चाहा, तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: दोपहर की नमाज़ पढ़ने के लिए ठंड होने तक इंतज़ार करो।" अबू धर ने कहा; "जब तक हम परछाईं न देख सकें," आखिर में बिलाल ने इकामा पढ़ा और उसने नमाज़ पढ़ी। उसके बाद पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "बेशक, चिलचिलाती गर्मी जहन्नम की मार से है, इसलिए नमाज़ पढ़ने के लिए इसे ठंडा कर लो।" अबू ईसा ने कहा; "यह हदीस हसन असली है।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 147
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ عَنْ ابْنِ شِهَابٍ عَنْ عُرْوَةَ عَنْ عَائِشَةَ أَنَّهَا قَالَتْصَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْعَصْرَ وَالشَّمْسُ فِي حُجْرَتِهَا وَلَمْ يَظْهَرْ الْفَيْءُ مِنْ حُجْرَتِهَاقَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ أَنَسٍ وَأَبِي أَرْوَى وَجَابِرٍ وَرَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ قَالَ وَيُرْوَى عَنْ رَافِعٍ أَيْضًا عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي تَأْخِيرِ الْعَصْرِ وَلَا يَصِحُّ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ عَائِشَةَ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَهُوَ الَّذِي اخْتَارَهُ بَعْضُ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مِنْهُمْ عُمَرُ وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْعُودٍ وَعَائِشَةُ وَأَنَسٌ وَغَيْرُ وَاحِدٍ مِنْ التَّابِعِينَ تَعْجِيلَ صَلَاةِ الْعَصْرِ وَكَرِهُوا تَأْخِيرَهَا وَبِهِ يَقُولُ عَبْدُ اللَّهِ ابْنُ الْمُبَارَكِ وَالشَّافِعِيُّ وَأَحْمَدُ وَإِسْحَقُ
हमें [कुतैबा] ने बताया है; हमें [अल लैट्स] ने [इब्न शिहाब] से [उरवाह] से ['ऐस्या] से बताया है कि उन्होंने कहा; "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार दोपहर की नमाज़ पढ़ी, जबकि सूरज की रोशनी उनके कमरे में आ रही थी, और उनके कमरे में कोई परछाई नहीं थी।" उन्होंने कहा; "इस अध्याय में अनस, अबू अरवा, जाबिर और रफ़ी बिन ख़दीज से भी रिवायत हैं।" उन्होंने कहा; "पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अस्र की नमाज़ खत्म करने के बारे में रफ़ी से भी रिवायत किया गया था, लेकिन यह रिवायत सही नहीं है।" अबू ईसा ने कहा; "'ऐस्या' की हदीस हदीस हसन शाहिह के दर्जे में है।" यह राय पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथियों में से कुछ वैज्ञानिक अहलुल ने चुनी थी। उनमें उमर, अब्दुल्लाह बिन मसूद, ऐश्या, अनस और ताबीन ग्रुप के कई लोग थे, जो अस्र की नमाज़ जल्दी करने के बारे में थे, और उन्होंने अस्र की नमाज़ खत्म करने के लिए मकरूह किया। यह राय अब्दुल्लाह बिन मुबारक, सयाफ़ी, अहमद और इसहाक ने भी ली थी।
इमाम तिर्मिदज़ी : 148
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ حُجْرٍ حَدَّثَنَا إِسْمَعِيلُ بْنُ جَعْفَرٍ عَنْ الْعَلَاءِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِأَنَّهُ دَخَلَ عَلَى أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ فِي دَارِهِ بِالْبَصْرَةِ حِينَ انْصَرَفَ مِنْ الظُّهْرِ وَدَارُهُ بِجَنْبِ الْمَسْجِدِ فَقَالَ قُومُوا فَصَلُّوا الْعَصْرَ قَالَ فَقُمْنَا فَصَلَّيْنَا فَلَمَّا انْصَرَفْنَا قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ تِلْكَ صَلَاةُ الْمُنَافِقِ يَجْلِسُ يَرْقُبُ الشَّمْسَ حَتَّى إِذَا كَانَتْ بَيْنَ قَرْنَيْ الشَّيْطَانِ قَامَ فَنَقَرَ أَرْبَعًا لَا يَذْكُرُ اللَّهَ فِيهَا إِلَّا قَلِيلًاقَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ
हमें बताया है [अली बिन हुज्र] ने कहा; [इस्माईल बिन जाफर] ने हमें [अला बिन अब्दुर्रहमान] से बताया कि दोपहर की नमाज़ के बाद वह बसरा में [अनस बिन मलिक] से मिलने उनके घर गए, जबकि उस समय उनका घर मस्जिद की तरफ था। उन्होंने कहा; "खड़े हो जाओ और दोपहर की नमाज़ पढ़ो।" अल 'अला बिन अब्दुर्रहमान ने कहा; "तो हम खड़े हुए और नमाज़ पढ़ी, नमाज़ पढ़ने के बाद हम चले गए। फिर उन्होंने कहा: "मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह कहते सुना: "यह एक पाखंडी नमाज़ है, सूरज का इंतज़ार करते हुए बैठना जब तक कि सूरज शैतान के दो सींगों के बीच न हो जाए, वह खड़ा हो जाता है और चार बार चोंच मारता है, और वह अल्लाह का ज़िक्र थोड़ा ही करता है।" अबू ईसा ने कहा; "यह हदीस हसन असली है।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 149
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ حُجْرٍ حَدَّثَنَا إِسْمَعِيلُ ابْنُ عُلَيَّةَ عَنْ أَيُّوبَ عَنْ ابْنِ أَبِي مُلَيْكَةَ عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ أَنَّهَا قَالَتْكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَشَدَّ تَعْجِيلًا لِلظُّهْرِ مِنْكُمْ وَأَنْتُمْ أَشَدُّ تَعْجِيلًا لِلْعَصْرِ مِنْهُقَالَ أَبُو عِيسَى وَقَدْ رُوِيَ هَذَا الْحَدِيثُ عَنْ إِسْمَعِيلَ ابْنِ عُلَيَّةَ عَنْ ابْنِ جُرَيْجٍ عَنْ ابْنِ أَبِي مُلَيْكَةَ عَنْ أُمِّ سَلَمَةَ نَحْوَهُ وَوَجَدْتُ فِي كِتَابِي أَخْبَرَنِي عَلِيُّ بْنُ حُجْرٍ عَنْ إِسْمَعِيلَ بْنِ إِبْرَاهِيمَ عَنْ ابْنِ جُرَيْجٍ و حَدَّثَنَا بِشْرُ بْنُ مُعَاذٍ الْبَصْرِيُّ قَالَ حَدَّثَنَا إِسْمَعِيلُ ابْنُ عُلَيَّةَ عَنْ ابْنِ جُرَيْجٍ بِهَذَا الْإِسْنَادِ نَحْوَهُ وَهَذَا أَصَحُّ
हमसे [अली बिन हुज्र] ने कहा; हमसे [इस्माईल इब्न उलय्या] ने [अय्यूब] से [इब्न अबू अवलका] से [उम्मु सलमा] से बताया है कि उन्होंने कहा; "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दोपहर की नमाज़ पढ़ने में तुमसे ज़्यादा जल्दबाज़ी की। और तुमने दोपहर की नमाज़ पढ़ने में उनसे ज़्यादा जल्दबाज़ी की।" अबू ईसा ने कहा; "यह हदीस [इस्माईल बिन उलय्या] से [इब्नु जुरैज] से [इब्नु अबू अवलका] से [उम्मु सलमा] से भी इसी तरह वर्णित की गई है। और मैंने अपने पिता की किताब में पाया, "मुझे [अली बिन हुज्र] ने [इस्माईल बिन इब्राहीम] से [इब्नु जुरैज] से इसकी सूचना दी गई है, और हमें [बिसिर बिन मुअज़ अल बशरी] ने बताया है, उन्होंने कहा; इस्माईल बिन उलैय्या ने हमें इब्न जुरैज से इस सनद के साथ बताया है, जैसा कि हदीस में है। और यह ज़्यादा सही है।
इमाम तिर्मिदज़ी : 150
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا حَاتِمُ بْنُ إِسْمَعِيلَ عَنْ يَزِيدَ بْنِ أَبِي عُبَيْدٍ عَنْ سَلَمَةَ بْنِ الْأَكْوَعِ قَالَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُصَلِّي الْمَغْرِبَ إِذَا غَرَبَتْ الشَّمْسُ وَتَوَارَتْ بِالْحِجَابِقَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ جَابِرٍ وَالصُّنَابِحِيِّ وَزَيْدِ بْنِ خَالِدٍ وَأَنَسٍ وَرَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ وَأَبِي أَيُّوبَ وَأُمِّ حَبِيبَةَ وَعَبَّاسِ بْنِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ وَابْنِ عَبَّاسٍ وَحَدِيثُ الْعَبَّاسِ قَدْ رُوِيَ مَوْقُوفًا عَنْهُ وَهُوَ أَصَحُّ وَالصُّنَابِحِيُّ لَمْ يَسْمَعْ مِنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَهُوَ صَاحِبُ أَبِي بَكْرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ سَلَمَةَ بْنِ الْأَكْوَعِ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَهُوَ قَوْلُ أَكْثَرِ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَمَنْ بَعْدَهُمْ مِنْ التَّابِعِينَ اخْتَارُوا تَعْجِيلَ صَلَاةِ الْمَغْرِبِ وَكَرِهُوا تَأْخِيرَهَا حَتَّى قَالَ بَعْضُ أَهْلِ الْعِلْمِ لَيْسَ لِصَلَاةِ الْمَغْرِبِ إِلَّا وَقْتٌ وَاحِدٌ وَذَهَبُوا إِلَى حَدِيثِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ حَيْثُ صَلَّى بِهِ جِبْرِيلُ وَهُوَ قَوْلُ ابْنِ الْمُبَارَكِ وَالشَّافِعِيِّ
हमें बताया है [कुतैबा] ने कहा; हमें बताया है [हातिम बिन इस्माइल] [यज़ीद बिन अबू उबैद] से [सलमा बिन अल अकवा] ने कहा; "पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मग़रिब की नमाज़ तब पढ़ी जब सूरज डूब गया था और दिखाई नहीं दे रहा था।" उन्होंने कहा; "इस चैप्टर में जाबिर अश शुनबिही, यज़ीद बिन खालिद, अनस, रफ़ी बिन ख़दीज, अबू अय्यूब, उम्म हबीबा, अब्बास बिन अब्दुल मुथलिब और इब्न अब्बास की भी रिवायतें हैं। अल अब्बास की हदीस उनसे अच्छे तरीके से रिवायत की गई है, और यह ज़्यादा असली है। वहीं, अश शुनबिही ने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इसके बारे में कभी नहीं सुना था, और वह अबू बकर रदलिअल्लाहु अन्हु के दोस्त थे। अबू ईसा ने कहा; "सलमा बिन अल अकवा की हदीस हसन असली है, यह पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथियों और उनके बाद ताबीन में से ज़्यादातर विद्वानों की राय है। उन्होंने मग़रिब की नमाज़ जल्दी करने और उसे खत्म करने के लिए एक नमाज़ पढ़ने का फैसला किया। जब तक कि कुछ विद्वान यह नहीं कहते, "मग़रिब की नमाज़ सिर्फ़ एक बार होती है।" वे पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीस को मानते हैं, जब उन्हें जिब्रील ने लीड किया था। और यही राय इब्न अल मुबारक और शफीई ने भी ली है।
इमाम तिर्मिदज़ी : 151
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ الْمَلِكِ بْنِ أَبِي الشَّوَارِبِ حَدَّثَنَا أَبُو عَوَانَةَ عَنْ أَبِي بِشْرٍ عَنْ بَشِيرِ بْنِ ثَابِتٍ عَنْ حَبِيبِ بْنِ سَالِمٍ عَنْ النُّعْمَانِ بْنِ بَشِيرٍ قَالَأَنَا أَعْلَمُ النَّاسِ بِوَقْتِ هَذِهِ الصَّلَاةِ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُصَلِّيهَا لِسُقُوطِ الْقَمَرِ لِثَالِثَةٍحَدَّثَنَا أَبُو بَكْرٍ مُحَمَّدُ بْنُ أَبَانَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ مَهْدِيٍّ عَنْ أَبِي عَوَانَةَ بِهَذَا الْإِسْنَادِ نَحْوَهُ قَالَ أَبُو عِيسَى رَوَى هَذَا الْحَدِيثَ هُشَيْمٌ عَنْ أَبِي بِشْرٍ عَنْ حَبِيبِ بْنِ سَالِمٍ عَنْ النُّعْمَانِ بْنِ بَشِيرٍ وَلَمْ يَذْكُرْ فِيهِ هُشَيْمٌ عَنْ بَشِيرِ بْنِ ثَابِتٍ وَحَدِيثُ أَبِي عَوَانَةَ أَصَحُّ عِنْدَنَا لِأَنَّ يَزِيدَ بْنَ هَارُونَ رَوَى عَنْ شُعْبَةَ عَنْ أَبِي بِشْرٍ نَحْوَ رِوَايَةِ أَبِي عَوَانَةَ
हमें बताया है [मुहम्मद बिन अब्दुल मलिक बिन अबू असी सयावरिब] ने कहा; हमें बताया है [अबू अवाना] [अबू बिसीर] से [बसीर बिन साबित] से [हबीब बिन सलीम] से [अन नुमान बिन बसीर] ने कहा; "मैं वह व्यक्ति हूं जो इस प्रार्थना के समय के बारे में सबसे अच्छा जानता हूं, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह प्रार्थना तब की जब तीसरी रात को चांद डूब गया था।" यह हमें बताया गया है [अबू बक्र मुहम्मद बिन अबान] ने कहा; हमें [अब्दुर्रहमान बिन महदी] ने [अबू अवाना] से इस सनद के साथ हदीस के रूप में बताया है। अबू ईसा ने कहा; "[हुसैय्यम] ने यह हदीस [अबू बिसीर] से [हबीब बिन सलीम] से [अन नुमान बिन बसीर] से सुनाई है। हालाँकि, हुसैय्यम ने उस इतिहास में बसीर बिन साबित का नाम नहीं लिया। और हमें लगता है कि अबू अवाना की हदीस ज़्यादा असली है, क्योंकि [यज़ीद बिन हारून] ने इसे [स्यूबा] से [अबू बिसीर] से अबू अवाना के इतिहास की तरह सुनाया है।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 152
حَدَّثَنَا هَنَّادٌ حَدَّثَنَا عَبْدَةُ عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ عَنْ سَعِيدٍ الْمَقْبُرِيِّ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لَوْلَا أَنْ أَشُقَّ عَلَى أُمَّتِي لَأَمَرْتُهُمْ أَنْ يُؤَخِّرُوا الْعِشَاءَ إِلَى ثُلُثِ اللَّيْلِ أَوْ نِصْفِهِقَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ جَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ وَجَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ وَأَبِي بَرْزَةَ وَابْنِ عَبَّاسٍ وَأَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ وَزَيْدِ بْنِ خَالِدٍ وَابْنِ عُمَرَ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ أَبِي هُرَيْرَةَ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَهُوَ الَّذِي اخْتَارَهُ أَكْثَرُ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَالتَّابِعِينَ وَغَيْرِهِمْ رَأَوْا تَأْخِيرَ صَلَاةِ الْعِشَاءِ الْآخِرَةِ وَبِهِ يَقُولُ أَحْمَدُ وَإِسْحَقُ
हन्नाद ने हमें बताया है; हन्नाद ने हमें बताया है [अब्दुल्लाह बिन उमर] ने [सईद अल मकबूरी] से [अबू हुरैरा] ने कहा; "पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: "अगर यह मेरे लोगों के लिए बोझ नहीं है, तो मैं निश्चित रूप से उन्हें शाम की प्रार्थना को तीसरे या आधी रात तक समाप्त करने का आदेश दूंगा।" उन्होंने कहा; "इस अध्याय में जाबिर बिन सम्रा, जाबिर बिन अब्दुल्ला, अबू बरज़ाह, इब्न अब्बास, अबू सईद अल खुदरी, ज़ैद बिन खालिद और इब्न उमर से भी एक रिवायत है।" अबू ईसा ने कहा; "अबू हुरैरा की हदीस यह हसन सहिह की डिग्री है। यह राय पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, ताबीन और उनके अलावा अधिकांश विद्वानों द्वारा चुनी गई है। उनका मानना है कि शाम की प्रार्थना को समाप्त करना अंतिम (आदेशित) है। यही राय अहमद और इसहाक ने भी ली थी।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 153
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مَنِيعٍ حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ أَخْبَرَنَا عَوْفٌ قَالَ أَحْمَدُ وَحَدَّثَنَا عَبَّادُ بْنُ عَبَّادٍ هُوَ الْمُهَلَّبِيُّ وَإِسْمَعِيلُ ابْنُ عُلَيَّةَ جَمِيعًا عَنْ عَوْفٍ عَنْ سَيَّارِ بْنِ سَلَامَةَ هُوَ أَبُو الْمِنْهَالِ الرِّيَاحِيُّ عَنْ أَبِي بَرْزَةَ قَالَكَانَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَكْرَهُ النَّوْمَ قَبْلَ الْعِشَاءِ وَالْحَدِيثَ بَعْدَهَاقَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ عَائِشَةَ وَعَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ وَأَنَسٍ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ أَبِي بَرْزَةَ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَقَدْ كَرِهَ أَكْثَرُ أَهْلِ الْعِلْمِ النَّوْمَ قَبْلَ صَلَاةِ الْعِشَاءِ وَالْحَدِيثَ بَعْدَهَا وَرَخَّصَ فِي ذَلِكَ بَعْضُهُمْ و قَالَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْمُبَارَكِ أَكْثَرُ الْأَحَادِيثِ عَلَى الْكَرَاهِيَةِ وَرَخَّصَ بَعْضُهُمْ فِي النَّوْمِ قَبْلَ صَلَاةِ الْعِشَاءِ فِي رَمَضَانَ وَسَيَّارُ بْنُ سَلَامَةَ هُوَ أَبُو الْمِنْهَالِ الرِّيَاحِيُّ
हमसे कहा है [अहमद बिन मानी'] ने कहा; हमसे कहा है [हुसय्यम] ने कहा; हमें सूचित किया है [औफ]। [अहमद] ने कहा; और हमसे कहा है [अब्बाद बिन अब्बद] -अर्थात् अल मुहल्लबी- और [इस्माईल बिन उलय्या] ने हमें [औफ] से बताया [सय्यर बिन सलामा] से -वह अबू अल मिन्हाल अर रियाही हैं-, [अबू बरज़ाह] से, उन्होंने कहा; "पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ईशा से पहले और उसके बाद सोना पसंद नहीं था।" उन्होंने कहा; "इस अध्याय में 'आइस्या, अब्दुल्लाह बिन मसऊद और अनस का इतिहास भी है।" अबू ईसा ने कहा; "अबू बरज़ाह की हदीस हसन सहीह है। अधिकांश विद्वान ईशा से पहले सोने और उसके बाद बात करने के खिलाफ शासन करते हैं, जबकि अन्य राहत देते हैं।" और अब्दुल्लाह बिन अल मुबारक ने कहा; "ज़्यादातर हदीसों से पता चलता है कि इसे नापसंद किया जाता है। हालांकि, उनमें से कुछ रमज़ान के दौरान नमाज़ से पहले सोने की इजाज़त देने में नरमी देते हैं।" और सय्यर बिन सलामह अबू अल मिन्हाल अर रियाही थे।
इमाम तिर्मिदज़ी : 154
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مَنِيعٍ حَدَّثَنَا أَبُو مُعَاوِيَةَ عَنْ الْأَعْمَشِ عَنْ إِبْرَاهِيمَ عَنْ عَلْقَمَةَ عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ قَالَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَسْمُرُ مَعَ أَبِي بَكْرٍ فِي الْأَمْرِ مِنْ أَمْرِ الْمُسْلِمِينَ وَأَنَا مَعَهُمَاوَفِي الْبَاب عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو وَأَوْسِ بْنِ حُذَيْفَةَ وَعِمْرَانَ بْنِ حُصَيْنٍ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ عُمَرَ حَدِيثٌ حَسَنٌ وَقَدْ رَوَى هَذَا الْحَدِيثَ الْحَسَنُ بْنُ عُبَيْدِ اللَّهِ عَنْ إِبْرَاهِيمَ عَنْ عَلْقَمَةَ عَنْ رَجُلٍ مِنْ جُعْفِيٍّ يُقَالُ لَهُ قَيْسٌ أَوْ ابْنُ قَيْسٍ عَنْ عُمَرَ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ هَذَا الْحَدِيثَ فِي قِصَّةٍ طَوِيلَةٍ وَقَدْ اخْتَلَفَ أَهْلُ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَالتَّابِعِينَ وَمَنْ بَعْدَهُمْ فِي السَّمَرِ بَعْدَ صَلَاةِ الْعِشَاءِ الْآخِرَةِ فَكَرِهَ قَوْمٌ مِنْهُمْ السَّمَرَ بَعْدَ صَلَاةِ الْعِشَاءِ وَرَخَّصَ بَعْضُهُمْ إِذَا كَانَ فِي مَعْنَى الْعِلْمِ وَمَا لَا بُدَّ مِنْهُ مِنْ الْحَوَائِجِ وَأَكْثَرُ الْحَدِيثِ عَلَى الرُّخْصَةِ قَدْ رُوِيَ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ لَا سَمَرَ إِلَّا لِمُصَلٍّ أَوْ مُسَافِرٍ
हमें बताया है [अहमद बिन मानी] ने कहा; हमें बताया है [अबू मुअविया] [अल अमासी] से [इब्राहिम] से [अलकामा] से [उमर बिन अल खत्थब] से उन्होंने कहा; "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार अबू बकर से मुसलमानों की समस्याओं के बारे में बात की थी, जबकि मैं उन दोनों के साथ था।" उन्होंने कहा; "इस अध्याय में अब्दुल्लाह बिन अमरू, अमरू बिन हुदज़ैफा और इमरान बिन हुसैन का इतिहास भी है।" अबू ईसा ने कहा; "उमर की हदीस हसन के दर्जे की है। [अल हसन बिन उबैदुल्लाह] ने यह हदीस [इब्राहिम] से [अलकामा] के एक आदमी से सुनाई है, जिसे [कैस या इब्न कैस] कहा जाता है, [उमर] से पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से, और यह हदीस एक लंबी कहानी है। पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथियों में से विद्वान, ताबीन और उनके बाद के लोग आखिरी शाम की नमाज़ के बाद बात करने के नियम पर सहमत नहीं थे। उनमें से कुछ ने शाम की नमाज़ के बाद बातचीत बंद कर दी, जबकि दूसरों ने राहत दी अगर यह ज्ञान के दायरे में था, या एक ज़रूरी ज़रूरत थी। और ज़्यादातर हदीसें यह राहत देती हैं।" पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से यह रिवायत है, उन्होंने कहा: "नमाज़ पढ़ने वाले या मुसाफ़िरों के अलावा बात करना जायज़ नहीं है।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 155
حَدَّثَنَا أَبُو عَمَّارٍ الْحُسَيْنُ بْنُ حُرَيْثٍ حَدَّثَنَا الْفَضْلُ بْنُ مُوسَى عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ الْعُمَرِيِّ عَنْ الْقَاسِمِ بْنِ غَنَّامٍ عَنْ عَمَّتِهِ أُمِّ فَرْوَةَ وَكَانَتْ مِمَّنْ بَايَعَتْ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَتْسُئِلَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَيُّ الْأَعْمَالِ أَفْضَلُ قَالَ الصَّلَاةُ لِأَوَّلِ وَقْتِهَا
हमें बताया है [अबू अम्मार अल हुसैन बिन हुरैत] ने कहा; हमें बताया है [अल फदल बिन मूसा] ने [अब्दुल्ला बिन उमर अल उमरी] से [अल कासिम बिन घन्नम] से उनकी चाची [उम्मू फरवाह] से - और वह उन लोगों में से एक थीं जिन्होंने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्रति निष्ठा ली - कि उन्होंने कहा; "पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से एक बार पूछा गया था, "सबसे महत्वपूर्ण अभ्यास क्या है?" उन्होंने उत्तर दिया: "समय की शुरुआत में प्रार्थना करना।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 156
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ وَهْبٍ عَنْ سَعِيدِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ الْجُهَنِيِّ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عُمَرَ بْنِ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ عَنْ أَبِيهِ عَنْ عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍأَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ لَهُ يَا عَلِيُّ ثَلَاثٌ لَا تُؤَخِّرْهَا الصَّلَاةُ إِذَا آنَتْ وَالْجَنَازَةُ إِذَا حَضَرَتْ وَالْأَيِّمُ إِذَا وَجَدْتَ لَهَا كُفْئًاقَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ غَرِيبٌ حَسَنٌ
हमें [कुतैबा] ने बताया है; हमें [अब्दुल्ला बिन वहब] ने [सईद बिन अब्दुल्ला अलजुहानी] से [मुहम्मद बिन उमर बिन अली बिन अबू तालिब] से [उनके पिता] से [अली बिन अबू तालिब] से बताया है कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार उनसे कहा: "तीन बातों पर ध्यान दो, जब समय आ जाए तो नमाज़ खत्म मत करो, जब लाश आ जाए तो उसे खत्म मत करो और अगर तुम्हें लगे कि यह ठीक है तो विधवा से शादी कर लो।" अबू ईसा ने कहा; "यह हदीस गरीब हसन के लेवल की है।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 157
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ مَنِيعٍ حَدَّثَنَا يَعْقُوبُ بْنُ الْوَلِيدِ الْمَدَنِيُّ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ عَنْ نَافِعٍ عَنْ ابْنِ عُمَرَ قَالَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْوَقْتُ الْأَوَّلُ مِنْ الصَّلَاةِ رِضْوَانُ اللَّهِ وَالْوَقْتُ الْآخِرُ عَفْوُ اللَّهِقَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ غَرِيبٌ وَقَدْ رَوَى ابْنُ عَبَّاسٍ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَحْوَهُ قَالَ وَفِي الْبَاب عَنْ عَلِيٍّ وَابْنِ عُمَرَ وَعَائِشَةَ وَابْنِ مَسْعُودٍ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ أُمِّ فَرْوَةَ لَا يُرْوَى إِلَّا مِنْ حَدِيثِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ الْعُمَرِيِّ وَلَيْسَ هُوَ بِالْقَوِيِّ عِنْدَ أَهْلِ الْحَدِيثِ وَاضْطَرَبُوا عَنْهُ فِي هَذَا الْحَدِيثِ وَهُوَ صَدُوقٌ وَقَدْ تَكَلَّمَ فِيهِ يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ مِنْ قِبَلِ حِفْظِهِ
हमसे कहा है [अहमद बिन मानी] ने कहा; हमसे कहा है [याकूब बिन अल वालिद अल मदनी] ने [अब्दुल्ला बिन उमर] से [नफी] से [इब्न उमर] ने कहा; "रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा; "अल्लाह की रहमत नमाज़ के शुरू में होती है, और अल्लाह की माफ़ी आखिर में होती है।" अबू ईसा ने कहा; "यह हदीस ग़रीब लेवल की है, और इब्न अब्बास के दोस्त ने भी इसे पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से ऐसे ही सुनाया है।" अबू ईसा ने कहा; "इस चैप्टर में अली, इब्न उमर, आइशिया और इब्न मसूद की भी हदीसें हैं।" अबू ईसा ने कहा; "उम्म फ़रवाह की हदीस अब्दुल्लाह बिन उमर अल उमरी की हदीस के अलावा किसी और से नहीं सुनाई गई, जबकि हदीस के जानकारों के मुताबिक वह (अब्दुल्ला बिन उमर अल उमरी) एक कमज़ोर इंसान थे, और जिन नैरेटर ने उनसे हदीस सुनाई, उन्हें इदल-तिराब (एक-दूसरे से बहुत ज़्यादा झगड़ा) का सामना करना पड़ा, जबकि वह शदुक़ (ईमानदार) थे। इमाम याह्या बिन सईद ने उनके याद करने के बारे में कहा है।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 158
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا مَرْوَانُ بْنُ مُعَاوِيَةَ الْفَزَارِيُّ عَنْ أَبِي يَعْفُورٍ عَنْ الْوَلِيدِ بْنِ الْعَيْزَارِ عَنْ أَبِي عَمْرٍو الشَّيْبَانِيِّأَنَّ رَجُلًا قَالَ لِابْنِ مَسْعُودٍ أَيُّ الْعَمَلِ أَفْضَلُ قَالَ سَأَلْتُ عَنْهُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ الصَّلَاةُ عَلَى مَوَاقِيتِهَا قُلْتُ وَمَاذَا يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ وَبِرُّ الْوَالِدَيْنِ قُلْتُ وَمَاذَا يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ وَالْجِهَادُ فِي سَبِيلِ اللَّهِقَالَ أَبُو عِيسَى وَهَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَقَدْ رَوَى الْمَسْعُودِيُّ وَشُعْبَةُ وَسُلَيْمَانُ هُوَ أَبُو إِسْحَقَ الشَّيْبَانِيُّ وَغَيْرُ وَاحِدٍ عَنْ الْوَلِيدِ بْنِ الْعَيْزَارِ هَذَا الْحَدِيثَ
हमें [कुतैबा] ने बताया है; हमें [मरवान बिन मुअविया अल फजारी] ने [अबू याफूर] से [अल वालिद बिन अल ऐज़र] से [अबू अमरू असी सैयबानी] से बताया है कि एक आदमी ने [इब्न मसूद] से कहा, "सबसे ज़रूरी काम क्या है?" उन्होंने कहा; "मैंने एक बार अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया: "समय के हिसाब से नमाज़ पढ़ो," मैंने फिर पूछा, "ऐ अल्लाह के रसूल, फिर और क्या?" उन्होंने जवाब दिया: "अपने माँ-बाप के साथ अच्छा करो," मैंने फिर पूछा, "ऐ अल्लाह के रसूल, फिर और क्या?" उन्होंने जवाब दिया: "अल्लाह के रास्ते में जिहाद करो।" अबू ईसा ने कहा; "यह हदीस हसन के दर्जे की असली है। और यह हदीस [अल मसूदी] और [स्यूबा] और [सुलेमान] - अर्थात् अबू इसहाक असी सायबानी - और अन्य लोगों ने [अल वालिद बिन अल 'अज़ार] से वर्णित की है।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 159
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ عَنْ خَالِدِ بْنِ يَزِيدَ عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي هِلَالٍ عَنْ إِسْحَقَ بْنِ عُمَرَ عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْمَا صَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَلَاةً لِوَقْتِهَا الْآخِرِ مَرَّتَيْنِ حَتَّى قَبَضَهُ اللَّهُقَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ غَرِيبٌ وَلَيْسَ إِسْنَادُهُ بِمُتَّصِلٍ قَالَ الشَّافِعِيُّ وَالْوَقْتُ الْأَوَّلُ مِنْ الصَّلَاةِ أَفْضَلُ وَمِمَّا يَدُلُّ عَلَى فَضْلِ أَوَّلِ الْوَقْتِ عَلَى آخِرِهِ اخْتِيَارُ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَأَبِي بَكْرٍ وَعُمَرَ فَلَمْ يَكُونُوا يَخْتَارُونَ إِلَّا مَا هُوَ أَفْضَلُ وَلَمْ يَكُونُوا يَدَعُونَ الْفَضْلَ وَكَانُوا يُصَلُّونَ فِي أَوَّلِ الْوَقْتِ قَالَ حَدَّثَنَا بِذَلِكَ أَبُو الْوَلِيدِ الْمَكِّيُّ عَنْ الشَّافِعِيِّ
हमें बताया है [कुतैबा] ने कहा; हमें [अल लैट्स] ने [खालिद बिन यज़ीद] से [सईद बिन अबू बिलाल] से [इसहाक बिन उमर] से ['ऐस्या] से बताया है उन्होंने कहा; "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने समय के अंत में लगातार दो बार प्रार्थना नहीं की जब तक कि अल्लाह ने उन्हें मार डाला।" अबू ईसा ने कहा; "यह एक हदीस है जिसकी हसन गरीब और सनद की डिग्री निरंतर नहीं हैं।" शफीई ने कहा; "समय की शुरुआत में प्रार्थना करना मुख्य बात है। और कुछ ऐसा जो अंत पर समय की शुरुआत में प्रार्थना करने की श्रेष्ठता को दर्शाता है वह यह है कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, अबू बक्र और उमर ने इसे चुना, उन्होंने हमेशा समय की शुरुआत में ऐसा किया, और उन्होंने मुख्य चीज के अलावा कुछ भी नहीं चुना। उन्होंने कभी भी मुख्य चीज को नहीं छोड़ा, और उन्होंने हमेशा समय की शुरुआत में प्रार्थना की।" उन्होंने कहा; "अबू अल वालिद अल मक्की ने हमें शफीई से ऐसा बताया।"
इमाम तिर्मिदज़ी : 160
حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا اللَّيْثُ بْنُ سَعْدٍ عَنْ نَافِعٍ عَنْ ابْنِ عُمَرَعَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ الَّذِي تَفُوتُهُ صَلَاةُ الْعَصْرِ فَكَأَنَّمَا وُتِرَ أَهْلَهُ وَمَالَهُوَفِي الْبَاب عَنْ بُرَيْدَةَ وَنَوْفَلِ بْنِ مُعَاوِيَةَ قَالَ أَبُو عِيسَى حَدِيثُ ابْنِ عُمَرَ حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ وَقَدْ رَوَاهُ الزُّهْرِيُّ أَيْضًا عَنْ سَالِمٍ عَنْ أَبِيهِ ابْنِ عُمَرَ عَنْ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ
हमें [कुतैबा] ने बताया है; हमें [अल लैट्स बिन साद] ने [नफी] से [इब्न उमर] से पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बताया है, उन्होंने कहा: "जो लोग दोपहर की नमाज़ (जमात) खो देते हैं, वे उन लोगों की तरह हैं जो अपना परिवार और संपत्ति खो देते हैं।" अबू ईसा ने कहा; "इब्न उमर की यह हदीस हसन असली है। यह हदीस [अज़ ज़ुहरी] ने [सलीम] से उनके पिता [इब्न उमर] से, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से भी सुनाई थी।"