इमाम दरिमी : 1519
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ يَزِيدَ حَدَّثَنَا الْمَسْعُودِيُّ عَنْ أَبِي حَازِمٍ عَنْ سَهْلِ بْنِ سَعْدٍ قَالَ لَمَّا كَثُرَ النَّاسُ بِالْمَدِينَةِ جَعَلَ الرَّجُلُ يَجِيءُ وَالْقَوْمُ يَجِيئُونَ فَلَا يَكَادُونَ أَنْ يَسْمَعُوا كَلَامَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ حَتَّى يَرْجِعُوا مِنْ عِنْدِهِ فَقَالَ لَهُ النَّاسُ يَا رَسُولَ اللَّهِ إِنَّ النَّاسَ قَدْ كَثُرُوا وَإِنَّ الْجَائِيَ يَجِيءُ فَلَا يَكَادُ يَسْمَعُ كَلَامَكَ قَالَ فَمَا شِئْتُمْ فَأَرْسِلْ إِلَى غُلَامٍ لِامْرَأَةٍ مِنْ الْأَنْصَارِ نَجَّارٍ وَإِلَى طَرْفَاءِ الْغَابَةِ فَجَعَلُوا لَهُ مِرْقَاتَيْنِ أَوْ ثَلَاثَةً فَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَجْلِسُ عَلَيْهِ وَيَخْطُبُ عَلَيْهِ فَلَمَّا فَعَلُوا ذَلِكَ حَنَّتْ الْخَشَبَةُ الَّتِي كَانَ يَقُومُ عِنْدَهَا فَقَامَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِلَيْهَا فَوَضَعَ يَدَهُ عَلَيْهَا فَسَكَنَتْ
हमें [अब्दुल्ला बिन यज़ीद] ने [अल मसूदी] से [अबू हाज़िम] से [साहल बिन साद] तक बताया है, उन्होंने कहा, "जब मदीना में बहुत सारे लोग थे, तो वे अकेले और ग्रुप में आते थे, इसलिए उन्हें अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की बातें मुश्किल से सुनाई देती थीं, जब तक कि वे उनके पास से वापस नहीं आ जाते थे। तब लोगों ने उनसे कहा, "अल्लाह के रसूल, सच में लोग बहुत सारे थे और हमेशा ऐसे लोग आते रहते हैं, जो शायद ही आपकी बातें सुन पाते हैं।" उन्होंने कहा: "तुम क्या चाहते हो?" उन्होंने कहा, "एक अंसार औरत के गुलाम के पास एक रसूल भेजो जो बढ़ई का काम करती है, और थरफ़ा अल ग़बाह के पास।" फिर उन्होंने उनके लिए दो या तीन सीढ़ियाँ बनाईं। फिर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बैठ गए और उन पर उपदेश दिया। फिर जब उन्होंने ऐसा किया तो लकड़ी के एक टुकड़े पर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) खड़े हो गए। कराहते हुए, रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फिर लकड़ी के पास खड़े हुए और उस पर हाथ रखे जब तक कि वह शांत नहीं हो गई।